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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—५९ देवता—मित्र

रथो ह वां भूरि वर्पः करिक्रत्सुतावतो निष्कृतमागमिष्ठः.. (९) हे अश्विनीकुमारो! मधुर-रस से युक्त सोमरस को पिओ एवं हमारे घर आओ. तुम्हारा अतिशय धन देने वाला रथ सोम निचोड़ने वाले यजमान के शुद्ध घर में बार-बार आता है. (९) सूक्त—५९ देवता—मित्र मित्रो जनान्यातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवीमुत द्याम्. मित्रः कृष्टीरनिमिषाभि चष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत.. (१) स्तुति किए जाने पर मित्र देव सभी लोगों को खेती आदि कामों में लगा देते हैं. वे धरती और आकाश दोनों को धारण करते हैं एवं यज्ञकर्म करने वालों को भली प्रकार देखते हैं. घी मिला हुआ हव्य मित्र के लिए हवन करो. (१) प्र स मित्र मर्तो अस्तु प्रयस्वान्यस्त आदित्य शिक्षति व्रतेन. न हन्यते न जीयते त्वोतो नैनमंहो अश्नोत्यन्तितो न दूरात्.. (२) हे आदित्य देव! जो गाय का घृत लेकर तुम्हें हव्य देता है, वह मनुष्य अन्न का स्वामी बने. तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे न कोई नष्ट कर सकता है और न हरा सकता है. उसे पास से या दूर से पाप भी नहीं छू सकता. (२) अनमीवास इळया मदन्तो मितज्ञवो वरिमन्ना पृथिव्याः. आदित्यस्य व्रतमुपक्षियन्तो वयं मित्रस्य सुमतौ स्याम.. (३) हे मित्र! निरोग एवं अन्न के कारण प्रसन्न हम धरती के विस्तृत भाग में घुटने टेककर इच्छानुसार चलते हुए आदित्य के यज्ञ के समीप निवास करते हैं. हम लोग आदित्य की कृपादृष्टि में रहें. (३) अयं मित्रो नमस्यः सुशेवो राजा सुक्षत्रो अजनिष्ट वेधाः. तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (४) सबके नमस्कार करने योग्य, सुख से सेव्य, सर्व जगत् के स्वामी, शोभन बलयुक्त एवं सबके विधाता सूर्य उत्पन्न हुए हैं. उन यज्ञपात्र सूर्य की अनुग्रह बुद्धि तथा कल्याण करने वाली मित्रता का हम पावें. (४) महाँ आदित्यो नमसोपसद्यो यातयज्जनो गृणते सुशेवः. तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविरा जुहोत.. (५) महान् आदित्य लोगों को अपने-अपने कर्म में लगाने वाले एवं नमस्कार द्वारा सेवा करने ebook converter DEMO Watermarks*

योग्य हैं। वे स्तुति करने वालों के प्रति प्रसन्न होते हैं। उन अत्यंत स्तुति योग्य मित्र के निमित्त अग्नि में हव्य डालो। (५) मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि. द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्.. (६) वर्षा द्वारा मनुष्यों का पालन करने वाले मित्र का अन्न सबके द्वारा भोगयोग्य एवं उनका धन अतिशय कीर्तियुक्त है. (६) अभि यो महिना दिवं मित्रो बभूव सप्रथा:. अभि श्रवोभिः पृथिवीम्.. (७) जिस मित्र ने अपनी महिमा से अंतरिक्ष को हरा दिया है, उसी कीर्तिशाली ने धरती को अन्न से भली प्रकार पूर्ण किया है. (७) मित्राय पञ्च येमिरे जना अभिष्टिशवसे. स देवान्विश्वान्बिभर्ति.. (८) ब्राह्मण आदि पांच जन शत्रुओं को हराने वाले बल से युक्त मित्र के लिए हवि देते हैं. वे मित्र सभी देवों को धारण करते हैं. (८) मित्रो देवेष्वायुषु जनाय वृक्तबर्हिषे. इष इष्टव्रता अकः.. (९) दिव्य गुण वाले मनुष्यों में जो व्यक्ति कुश छेदन करता है, उसे मित्र देव कल्याणकारी अन्न देते हैं. (९) सूक्त—६० देवता—ऋभुगण इहेह वो मनसा बन्धुता नर उशिजो जग्मुरभि तानि वेदसा. याभिर्मायाभिः प्रतिजूतिवपर्सः सौधन्वना यज्ञियं भागमानश.. (१) हे ऋभुओ! तुम्हारे कर्मों को सब लोग मन से जानते हैं. हे नेताओ एवं सुधन्वा के पुत्रो! तुम अपने ज्ञान से उन कर्मों को जान लेते हो, जिन कर्मों द्वारा तुम शत्रु को हराने वाला तेज पाने के लिए यज्ञ के भाग की अभिलाषा करते हो. (१) याभिः शचीभिश्चमसाँ अपिंशत यया धिया गामरिणीत चर्मणः. येन हरी मनसा निरतक्षत तेन देवत्वमृभवः समानश.. (२) हे ऋभुओ! जिस शक्ति द्वारा तुमने चमस के चार भाग किए थे, जिस बुद्धि से तुमने गाय को चर्मयुक्त किया था एवं जिस ज्ञान से तुमने इंद्र के हरि नामक घोड़ों को बनाया, उन्हीं कर्मों द्वारा तुमने देवत्व पाया है. (२) इन्द्रस्य सख्यमृभवः समानशुर्मनोर्नपातो अपसो दधन्विरे. ebook converter DEMO Watermarks*

सौधन्वनासो अमृतत्वमेरिरे विष्ट्वी शमीभिः सुकृतः सुकृत्यया.. (३) अंगिरा के पुत्र ऋभुओं ने यज्ञकर्म द्वारा इंद्र की मित्रता भली प्रकार प्राप्त करके प्राण धारण किए हैं. सुधन्वा के पुत्र एवं पवित्र कर्म करने वाले ऋभुगण देवत्व प्राप्ति के हेतु एवं शोभन कर्मों से युक्त होकर अमृत पद को प्राप्त कर चुके हैं. (३) इन्द्रेण याथ सरथं सुते सचाँ अथो वशानां भवथा सह श्रिया. न वः प्रतिमै सुकृतानि वाघतः सौधन्वना ऋभवो वीर्याणि च.. (४) हे ऋभुआे! तुम इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर सोम निचोड़ने के स्थान यज्ञ में जाओ एवं यजमानों की स्तुतियां स्वीकार करो. हे सुधन्वा के पुत्रो एवं मेधावी ऋभुआे! तुम्हारे शोभन कर्मों की सीमा जानना संभव नहीं है और न तुम्हारी शक्ति की. (४) इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितं सुतं सोममा वृषस्वा गभस्त्योः. धियेषितो मघवन्दाशुषो गृहे सौधन्वनेभिः सह मत्स्वा नृभिः.. (५) हे इंद्र! तुम अन्न वाले ऋभुओं के साथ मिलकर जल द्वारा भली प्रकार गीले एवं पत्थरों द्वारा निचोड़े हुए सोम को दोनों हाथों से पकड़कर पिओ. हे मघवा! तुम स्तुति से प्रेरणा पाकर यजमान के घर में सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं के साथ सोम पीकर प्रसन्न बनो. (५) इन्द्र ऋभुमान्वाजवान्मत्स्वेह नोऽस्मिन्त्सवने शच्या पुरुष्टुत. इमानि तुभ्यं स्वसराणि येमिरे व्रता देवानां मनुषश्च धर्मभिः.. (६) हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम ऋभुओं तथा अन्न से युक्त होकर एवं इंद्राणी को साथ लेकर हमारे इस तृतीय सवन में प्रसन्न बनो. तुम्हारे सोमपान के लिए ये दिन एवं अग्नि आदि देवों तथा मनुष्यों के कर्म निश्चित हैं. (६) इन्द्र ऋभुभिर्वाजिभिर्वाजयन्निह स्तोमं जरितुरुप याहि यज्ञियम्. शतं केतेभिरिषिरेभिरायवे सहस्रणीथो अध्वरस्य होमनि.. (७) हे इंद्र! तुम अन्नयुक्त ऋभुओं के साथ स्तोता को अन्न देते हुए इस यज्ञ में स्तोता का स्तोत्र सुनने के लिए आओ. सौ मरुतों एवं चलने में कुशल घोड़ों के साथ तुम यजमान द्वारा हजार प्रकार से तैयार किए गए सोम वाले यज्ञ में आओ. (७) सूक्त—६१ देवता—उषा उषो वाजेन वाजिनि प्रचेताः स्तोमं जुषस्व गृणतो मघोनि. पुराणी देवि युवतिः पुरन्धिरनु व्रतं चरसि विश्ववारे.. (१) हे अन्न एवं धनयुक्त उषा! तुम उत्तम ज्ञानसंपन्न होकर स्तोता के स्तोत्रों को स्वीकार ebook converter DEMO Watermarks*

करो. हे सबके द्वारा वरण करने योग्य, पुरातन, युवती एवं बहुतों द्वारा स्तुत उषा! तुम यज्ञकर्म के अनुसार चलती हो. (१) उषो देव्यमर्त्या वि भाहि चन्द्ररथा सूनृता ईरयन्ती. आ त्वा वहन्तु सुयमासो अश्वा हिरण्यवर्णां पृथुपाजसो ये.. (२) हे मरणरहित, सोने के रथ वाली, प्रिय एवं सत्य वाणी बोलती हुई उषा! तुम सूर्यकिरणों से प्रकाशित बनो. महान् बलशाली, लाल रंग वाले एवं रथ में सरलता से जोड़ने योग्य घोड़े तुझ सुनहरे रंग वाली को बुलावें. (२) उषः प्रतीची भुवनानि विश्वोर्ध्वा तिष्ठस्यमृतस्य केतुः. समानमर्थं चरणीयमाना चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्व.. (३) हे समस्त प्राणियों के सामने आनेवाली एवं मरणरहित सूर्य का ज्ञान कराने वाली उषा! तुम आकाश में ऊंची ठहरती हो. हे अति नवीन उषा! एक ही मार्ग में चलने की इच्छुक तुम बार-बार उसी मार्ग में इस तरह चलो जैसे आकाश में सूर्य का पहिया एक ही मार्ग पर चलता है. (३) अव स्यूमेव चिन्वती मघोन्युषा याति स्वसरस्य पत्नी. स्वर्जनन्ती सुभगा सुदंसा आन्ताद्दिवः पप्रथ आ पृथिव्याः.. (४) धन की स्वामिनी उषा कपड़े के समान फैले अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य की पत्नी बनकर चलती है. अपना तेज उत्पन्न करती हुई, शोभन-धन वाली एवं अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों से युक्त उषा आकाश ओर धरती के अंत तक प्रकाशित होती है. (४) अच्छा वो देवीमुषसं विभातीं प्र वो भरध्वं नमसा सुवृक्तिम्. ऊर्ध्वं मधुधा दिवि पाजो अश्रेत्प्र रोचना रुरुचे रण्वसन्दृक्.. (५) हे स्तोताओ! तुम अपने सामने शोभन पाती हुई उषा की सुंदर स्तुति नमस्कार सहित करो. स्तुति धारण वाली उषा आकाश में ऊपर जाने वाला तेज धारण करती है. तेजस्विनी एवं देखने में सुंदर उषा अच्छी तरह चमकती है. (५) ऋतावरी दिवो अर्कैर्बोध्या रेवती रोदसी चित्रमस्थात्. आयतीमग्न उषसं विभातीं वाममेषि द्रविणं भिक्षमाणः.. (६) सत्ययुक्त उषा को दिव्य तेज के कारण सब जानते हैं. धनवाली उषा अपने विविध रूपों से धरती-आकाश को भर देती है. हे अग्नि! तुम्हारे सामने आती हुई एवं प्रकाशयुक्त उषा से मांगते हुए तुम सुंदर धन पाते हो. (६) ऋतस्य बुध्न उषसामिषण्यन्वृषा मही रोदसी आ विवेश. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६२ देवता—इंद्र, वरुण आदि

मही मित्रस्य वरुणस्य माया चन्द्रेव भानुं वि दधे पुरुत्रा.. (७) जल बरसाने वाले सूर्य सत्यरूप दिन के आरंभ में उषा को प्रेरित करते हुए विशाल धरती-आकाश के बीच में प्रवेश करते हैं. महती उषा मित्र एवं वरुण की प्रभा बनकर इस प्रकार अपना प्रकाश सब जगह फैलाती है, जैसे सोना अपनी चमक फैलाता है. (७) सूक्त—६२ देवता—इंद्र, वरुण आदि इमा उ वां भृमयो मन्यमाना युवावते न तुज्या अभूवन्. क्व१ त्यादिन्द्रावरुणा यशो वां येन स्मा सिनं भरथः सखिभ्यः.. (१) हे इंद्र व वरुण! शत्रुओं द्वारा सताई हुई एवं घूमती हुई तुम्हारी प्रजाएं बलवान् शत्रुओं द्वारा नष्ट न हो जावें. तुम्हारा वह यश कहां है, जिससे तुम हम मित्रों को अन्न देते हो? (१) अयुम वां पुरतमो रयीयञ्छश्वत्तममवसे जोहवीति. सजोष़ाविन्द्रावरुणा मरुद्भिर्दिवा पृथिव्या शृणुतं हवं मे.. (२) हे इंद्र व वरुण! धन का इच्छुक एवं महान् यजमान अपनी रक्षा के लिए तुम दोनों को सदा बुलाता है. तुम दोनों मरुतों, द्युलोक एवं धरती के साथ मिलकर मेरी स्तुति सुनो. (२) अस्मे तदिन्द्रावरुणा वसु ष्यादस्मे रयिर्मरुतः सर्ववीरः. अस्मान्वरूत्रीः शरणैरवन्त्वस्मान्होत्रा भारती दक्षिणाभिः.. (३) हे इंद्र व वरुण! हमारे पास मनचाहा उत्तम धन हो. हे मरुतो! हमारे पास सब काम में कुशल एवं वीर पुत्र हों एवं देवपत्नियां वर देकर हमारी रक्षा करें. अग्निपत्नी होत्रा एवं सूर्यपत्नी भारती दक्षिणा के रूप में गाएं देकर हमारी रक्षा करें. (३) बृहस्पते जुषस्व नो हव्यानि विश्वदेव्य. रास्व रत्नानि दाशुषे.. (४) हे सब देवों के हितकारी बृहस्पति! इन लोगों के हव्य का सेवन करो एवं यजमान को उत्तम धन दो. (४) शुचिमर्कैर्बृहस्पतिमध्वरेषु नमस्यत. अनाम्योज आ चके.. (५) हे ऋत्विजो! तुम यज्ञ में स्तुतियों द्वारा पवित्र बृहस्पति की सेवा करो. मैं उनसे वह बल मांगता हूं, जिसे शत्रु न हरा सकें. (५) वृषभं चर्षणीनां विश्वरूपमदाभ्यम्. बृहस्पतिं वरेण्यम्.. (६) कामवर्षी, विश्वरूप नामक बैल की सवारी वाले, तिरस्कार न करने योग्य एवं सबके ebook converter DEMO Watermarks*

सेवा योग्य बृहस्पति से मैं मनचाहा फल मांगता हूं. (६) इयं ते पूषन्नाघृणे सुष्टुतिर्देव नव्यसी. अस्माभिस्तुभ्यं शस्यते.. (७) हे पूषादेव! यह अतिशय नवीन एवं शोभन स्तुति तुम्हारे लिए है. इसे हम तुम्हारे निमित्त बोलते हैं. (७) तां जुषस्व गिरं मम वाजयन्तीमवा धियम्. वध्यूरिव योषणाम्.. (८) हे पूषा! तुम मेरी स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार करो. कामी पुरुष जिस प्रकार नारी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तुति के सामने आओ. (८) यो विश्वाभि विपश्यति भुवनां सं च पश्यति. स नः पूषाविता भुवत्.. (९) जो सूर्य सब लोकों को विशेष रूप से देखते हैं एवं सभी वस्तुओं को वास्तव में जानते हैं, वे हमारे रक्षक हैं. (९) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (१०) हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जिन्होंने हमारी बुद्धि को प्रेरित किया. (१०) देवस्य सवितुर्वयं वाजयन्तः पुरंध्या. भगस्य रातीमीमहे.. (११) अन्न की अभिलाषा करते हुए हम लोग तेजस्वी सविता देव के धन का दान उनकी स्तुति द्वारा चाहते हैं. (११) देवं नरः सवितारं विप्रा यज्ञैः सुवृक्तिभिः. नमस्यन्ति धियेषिताः.. (१२) यज्ञकर्मकुशल एवं मेधावी अध्वर्यु आदि यज्ञ करने की भावना से प्रेरित होकर हव्य एवं स्तुतियों द्वारा सविता देव की सेवा करते हैं. (१२) सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम्. ऋतस्य योनिमासदम्.. (१३) मार्ग को जानने वाला सोमरस गंतव्य स्थान दिखाता है एवं देवों के बैठने योग्य यज्ञस्थल में जाता है. (१३) सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे. अनमीवा इषस्करत्.. (१४) सोम हम मानवों तथा दो पैर और चार पैर वाले पशुओं को रोगरहित अन्न दे. (१४) अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः. सोमः सधस्थमासदत्.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

सोमदेव हमारी आयु बढ़ाते हुए एवं यज्ञ में विघ्न डालने वाले शत्रुओं को हराते हुए हमारे यज्ञ में बैठें. (१५) आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजांसि सुक्रतू.. (१६) हे शोभन कर्म वाले मित्र व वरुण! हमारी गोशाला को दूध से सींच दो एवं हमारे घरों को मधुर रस से भर दो. (१६) उरुशंसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथ:. द्राघिष्ठाभि: शुचिव्रता.. (१७) हे पवित्र कर्म वाले मित्र व वरुण! तुम बहुतों द्वारा स्तुत एवं हव्य अन्न से वृद्धि को प्राप्त हो. तुम विशाल स्तुतियों द्वारा धन का महत्त्व पाकर सुशोभित बनो. (१७) गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्. पातं सोममृतावृधा.. (१८) हे मित्र व वरुण! तुम जमदग्नि ऋषि द्वारा स्तुत होकर यज्ञ में बैठो. यज्ञकर्म का फल बढ़ाने वाले तुम दोनों सोम पिओ. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१ देवता—अग्नि, वरुण

चतुर्थ मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि, वरुण त्वां ह्यग्ने सदमित्समन्यवो देवासो देवमरतिं न्येरिरे इति क्रत्वा न्येरिरे. अमर्त्य यजत मर्त्येष्वा देवमादेवं प्रचेतसं विश्वमादेवं जनत प्रचेतसम्.. (१) हे शीघ्रगामी अग्नि देव! बराबर वालों से स्पर्धा करते हुए इंद्रादि देव तुम्हें युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं एवं यजमान यज्ञ में देवों को बुलाने के लिए प्रेरणा देते हैं. हे यज्ञ योग्य, मरणरहित, तेजस्वी एवं उत्तम-ज्ञान वाले अग्नि! देवों ने तुम्हें यज्ञकर्त्ता मानवों में आने एवं विभिन्न यज्ञों में उपस्थित रहने के लिए जन्म दिया है. (१) स भ्रातरं वरुणमग्न आ ववृत्स्व देवाँ अच्छा सुमती यज्ञवनसं ज्येष्ठं यज्ञवनसम्. ऋतावानमादित्यं चर्षणीधृतं राजानं चर्षणीधृतम्.. (२) हे अग्नि! तुम अपने भाई, हवि द्वारा सेवा योग्य, यज्ञ का भाग करने वाले, अतिशय प्रशंसनीय, जलों के स्वामी, अदिति के पुत्र, जल देकर मनुष्यों को धारण करने वाले, शोभनबुद्धि संपन्न एवं राजमान वरुणदेव को स्तोताओं के प्रति अभिमुख करो. (२) सखे सखायमभ्या ववृत्स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं दस्म रंह्या. अग्ने मृळीकं वरुणे सचा विदो मरुत्सु विश्वभानुषु. तोकाय तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि.. (३) हे दर्शनीय एवं सखा अग्नि! तुम अपने मित्र वरुण को उसी प्रकार हमारी ओर अभिमुख करो, जैसे चलने में कुशल एवं रथ में जुते हुए घोड़े तेज चलने वाले पहिए को लक्ष्य की ओर ले जाते हैं. तुमने वरुण एवं मरुतों की सहायता से सुखकारक हव्य पाया है. हे तेजस्वी अग्नि! हमारे पुत्र-पौत्रों को सुखी करो एवं हमारा कल्याण करो. (३) त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेळोऽवयासिसीष्ठाः. यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषांसि प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (४) हे उपायों को जानने वाले अग्नि! तुम हमारे ऊपर होने वाला वरुणदेव का क्रोध दूर करो. हे सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता, हव्य के अतिशय वहन करने वाले एवं दीप्तिशाली अग्नि! सभी पापों को हमसे दूर करो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ. अव यक्ष्व नो वरुणं रराणो वीहि मृळीकं सुहवो न एधि.. (५) हे अग्नि! तुम रक्षा करने के लिए एवं उषा की समाप्ति पर यज्ञकर्म के निमित्त हमारे अत्यंत समीप आओ. हे हमारे दिए हुए हव्य से प्रसन्न अग्नि! तुम वरुण द्वारा किए जाने वाले रोगों का नाश करो एवं यह सुखदायक हवि खाओ. हे हमारे द्वारा भली प्रकार बुलाए गए अग्नि! हमारे पास आओ. (५) अस्य श्रेष्ठा सुभगस्य सन्दृग्देवस्य चित्रतमा मर्त्येषु. शुचि घृतं न तप्तमघ्न्यायाः स्पार्हा देवस्य मंहनेव धेनोः.. (६) परम सेवनीय अग्नि की उत्तम कृपा मनुष्यों में उसी प्रकार नितांत पूज्य है, जिस प्रकार दूध की कामना करने वाले देवों के लिए गाय का शुद्ध, तरल एवं गरम दूध अथवा गाय मांगने वाले मनुष्य के लिए दुधारू गाय. (६) त्रिरस्य ता परमा सन्ति सत्या स्पार्हा देवस्य जनिमान्यग्नेः. अनन्ते अन्तः परिवीत आगाच्छुचिः शुक्नो अर्यो रोरुचानः.. (७) अग्नि देव के तीन प्रसिद्ध एवं वास्तविक जन्मों (अग्नि, वायु, सूर्य) की सभी अभिलाषा करते हैं. आकाश में अपने तेज से घिरे हुए सबके शोधक, तेजस्वी, अनंत दीप्ति से युक्त एवं सबके स्वामी अग्नि हमारे यज्ञ में आवें. (७) स दूतो विश्वेदभि वष्टि सद्मा होता हिरण्यरथो रंसुजिह्वः. रोहिदश्वो वपुष्यो विभावा सदा रण्वः पितुमतीव संसत्.. (८) देवों के दूत, सुनहरे रथ वाले एवं सुंदर ज्वालाओं से युक्त अग्नि सभी यज्ञस्थलों में जाने की अभिलाषा करते हैं. लाल घोड़ों वाले, परम सुंदर एवं कांतिशाली अन्न से पूर्ण वे घर के समान सदा रमणीय लगते हैं. (८) स चेतयन्मनुषो यज्ञबन्धुः प्र तं मह्या रशनया नयन्ति. स क्षेत्यस्य दुर्यासु साधन्देवो मर्तस्य सधनित्वमाप.. (९) यज्ञ के बंधु अग्नि यज्ञकार्य में लगे हुए मनुष्यों को जानते हैं. अध्वर्युगण स्तुति रूपी विशाल रस्सी से अग्नि को उत्तर-वेदी में लाते हैं. वे अभिलाषाएं पूरी करते हुए यजमान के घर में रहते हैं एवं उसके साथ एकरूपता धारण कर लेते हैं. (९) स तू नो अग्निरनयतु प्रजानन्नच्छा रत्नं देवभक्तं यदस्य. धिया यद्विश्वे अमृता अकृण्वन्द्यौष्पिता जनिता सत्यमुक्षन्.. (१०) सब जानते हुए अग्नि अपने उत्तम रत्न को शीघ्र हमारे सामने लावें. मरणरहित सब देवों ebook converter DEMO Watermarks*

ने यज्ञकर्म के हेतु अग्नि को बनाया है. आकाश उसका जनक तथा पालनकर्त्ता है एवं अध्वर्यु घी की आहुतियों से उसे सींचते हैं. (१०) स जायत प्रथमः पस्त्यासु महो बुध्ने रजसो अस्य योनौ. अपादशीर्षा गुहमानो अन्तायोयुवानो वृषभस्य नीळे.. (११) श्रेष्ठ अग्नि यजमानों के घरों एवं विशाल आकाश की मूलरूपी पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं. बिना पैर और सिर वाले अग्नि अपने शरीर को छिपाकर बादल के घर अर्थात् आकाश में धुएं का रूप धारण करते हैं. (११) प्र शर्ध आर्त प्रथमं विपन्याँ ऋतस्य योना वृषभस्य नीळे. स्पार्हो युवा वपुष्यो विभावा सप्त प्रियासोऽजनयन्त वृष्णे.. (१२) हे अग्नि! स्तुतिसंपन्न जल के उत्पत्ति स्थान एवं बादलों के घोंसले के तुल्य आकाश में बिजली के रूप में वर्तमान तुम्हारे पास तेज सबसे पहले पहुंचता है. सात प्रिय होता अभिलाषा करने योग्य, अत्यंत सुंदर एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि को लक्ष्य करके स्तुति करते हैं. (१२) अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुर्ऋतमाशूषाणः. अश्मव्रजाः सुदुघा वव्रे अन्तरुदुस्रा आजन्नुषसो हुवानाः.. (१३) इस लोक में हमारे पूर्वज अंगिरा यज्ञ करते हुए अग्नि के सामने गए थे. उन्होंने उषाओं का आह्वान करते हुए पर्वत की गुफा में वर्तमान, अंधकार में स्थित एवं पणियों द्वारा चुराई गई दुधारू गायों को प्राप्त किया था. (१३) ते मर्मृजत दद्वांसो अद्रिं तदेषामन्ये अभितो वि वोचन्. पश्वयन्त्रासो अभि कारमर्चन्विदन्त ज्योतिश्चकृपन्त धीभिः.. (१४) उन अंगिराओं ने गायों को छिपाने वाले पर्वत को तोड़ते हुए अग्नि की सेवा की. अन्य ऋषियों ने उनका यह कार्य सभी जगह कहा. पशुओं के निकलने के उपाय जानने हेतु अंगिराओं ने अभिमत फल देने वाले अग्नि की स्तुति करते हुए प्रकाश पाया एवं अपने बुद्धिबल से यज्ञ किया. (१४) ते गव्यता मनसा दृध्रमुब्धं गा येमानं परि षन्तमद्रिम्. दृळ्हं नरो वचसा दैव्येन व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (१५) यज्ञकर्मों के नेता एवं अग्नि की कामना करने वाले अंगिराओं ने गायों को पाने के विचार से दृढ़बंद, गायों को रोकने वाले, चारों ओर फैले हुए, कठोर, गायों से युक्त एवं गोशाला के समान पर्वत को अग्नि संबंधी स्तुतियों से उद्घाटित कर दिया था. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

ते मन्वत प्रथमं नाम धेनोस्त्रिः सप्त मातुः परमाणि विन्दन्. तज्जानतीरभ्यनूषत व्रा आविर्भूवदरुणीर्यशसा गोः.. (१६) हे अग्नि! स्तुति करने वाले अंगिराओं ने माता वाणी से संबंधित एवं स्तुति में सहायक शब्दों को पहले जाना. बाद में स्तुतिसंबंधी इक्कीस छंदों का ज्ञान प्राप्त किया. इसके पश्चात् सबको जानती हुई उषा की स्तुति की. फिर सूर्य के तेज से अरुण वर्ण की उषा उत्पन्न हुई. (१६) नेशत्तमो दुधितं रोचत द्यौरुद्देव्या उषसौ भानुरर्त. आ सूर्यो बृहतस्तिष्ठदज्राँ ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्.. (१७) उषा की प्रेरणा से रात का अंधकार नष्ट हुआ एवं आकाश चमकने लगा. इसके बाद उषा का प्रकाश उत्पन्न हुआ. मनुष्यों के सत् एवं असत् कर्मों को देखते हुए सूर्य महान् पर्वत के ऊपर पहुंच गए. (१७) आदित्पश्चा बुबुधाना व्यख्यन्नादिद्रत्नं धारयन्त द्युभक्तम्. विश्वे विश्वास्तु दुर्यासु देवा मित्र धिये वरुण सत्यमस्तु.. (१८) अंगिराओं ने सूर्योदय के बाद पणियों द्वारा चुराई गई गायों को जानते हुए पीछे से उन गायों को भली-भांति देखा एवं देवों द्वारा दिए गए गोरूप धन को पाया. अंगिराओं के सभी घरों में सभी देव पधारे. हे मित्रतुल्य एवं वरुण के रोगों का नाश करने वाले अग्नि! यजमान को सत्य फल प्राप्त हो. (१८) अच्छा वोचेय शुशुचानमग्निं होतारं विश्वभरसं यजिष्ठम्. शुच्यूधो अतृणन्न गवामन्धो न पूतं परिषिक्तमंशोः.. (१९) अत्यंत दीप्तिशाली, देवों को बुलाने वाले, विश्व के पोषक एवं सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता अग्नि को लक्ष्य करके हम स्तुतियां बोलते हैं. यजमान तुम्हारी आहुति के निमित्त गायों के थनों से पवित्र दूध का दोहन एवं सोमरसरूपी अन्न को पवित्र करते हुए घर में क्षेपण न करके केवल स्तुति ही बोलते हैं. (१९) विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्. अग्निद्देवानांमव आवृणानः सुमृळीको भवतु जातवेदाः.. (२०) अग्नि सभी यज्ञ योग्य देवों की माता के समान पोषक एवं सभी मनुष्यों के लिए अतिथि के समान पूज्य हैं. स्तोताओं का अन्न भक्षण करने वाले एवं सर्वज्ञ अग्नि सुखदाता हों. (२०) सूक्त-२ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि. होता यजिष्ठो महा शुचध्यै हव्यैरग्निर्मनुष ईरयध्यै.. (१) जो मरणरहित एवं दिव्य अग्नि मनुष्यों में सत्ययुक्त, इंद्रादि देवों के शत्रुओं को हराने वाले, देवों को बुलाने वाले एवं सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता हैं, वे अपने महान् तेज से दीप्त होने एवं यजमानों को स्वर्ग भेजने के लिए उत्तर वेदी पर स्थापित किए गए हैं. (१) इह त्वं सूनो सहसो नो अद्य जातो जाताँ उभयाँ अन्तरग्ने. दूत ईयसे युयुजान ऋष्व ऋजुमुष्कान्वृषणः शुक्रांश्च.. (२) हे बल के पुत्र एवं दर्शनीय अग्नि! तुम आज हमारे यज्ञ में उत्पन्न हुए हो एवं अपने सीधे, मोटे, तेजस्वी तथा शक्तिशाली घोड़ों को रथ में जोतकर नभ से भिन्न देवों और मनुष्यों के बीच हव्य वहन के लिए दूत बनते हो. (२) अत्या वृधस्नू रोहिता घृतस्नू ऋतस्य मन्ये मनसा जविष्ठा. अन्तरीयसे अरुषा युजानो युष्मांश्च देवान्विश आ च मर्तान्.. (३) हे सत्यरूप अग्नि! मैं तुम्हारे लाल रंग वाले, मन से भी अधिक वेगशाली एवं अन्न तथा जल बरसाने वाले घोड़ों की स्तुति करता हूं. उन तेजस्वी घोड़ों को रथ में जोतकर यज्ञ के पात्र देवों एवं सेवा करने वाले मनुष्यों के बीच भली-भांति जाते हो. (३) अर्यमणं वरुणं मित्रमेषामिन्द्राविष्णू मरुतो अश्विनोत. स्वश्वो अग्ने सुरथः सुराधा एदु वह सुहविषे जनाय.. (४) हे उत्तम अश्वों, उत्तम रथ एवं उत्तम धन वाले अग्नि! तुम उत्तम हवि वाले यजमान के लिए अर्यमा, वरुण, मित्र, इंद्र विष्णु, मरुद्गण एवं अश्विनीकुमारों को बुलाओ. (४) गोमाँ अग्नेऽविमाँ अश्वी यज्ञो नृवत्सखा सदमिदप्रमृष्यः. इळावाँ एषो असुर प्रजावान्दीर्घो रयिः पृथुबुध्नः सभावान्.. (५) हे शक्तिशाली अग्नि! हमारा यह यज्ञ गाय, भेड़ एवं घोड़ों से युक्त हो. अध्वर्यु एवं यजमान वाला यज्ञ सदैव नष्ट न करने योग्य, हव्य अन्न से युक्त, पुत्र-पौत्र आदि सहित, लगातार चलने वाला, धनपूर्ण, अनेक संपत्तियों का कारण तथा उपदेशकत्र्ताओं से भरा हो. (५) यस्त इध्मं जभरत्सिष्विदानो मूर्धानं वा ततपते त्वाया. भुवस्तस्य स्वतवाँः पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमघायत उरुष्य.. (६) हे अग्नि! जो मनुष्य पसीना बहाकर तुम्हारे लिए लकड़ियां ढोकर लाता है एवं तुम्हें पाने की अभिलाषा से अपना सर लकड़ी के बोझे से दुःखी करता है, उसे तुम धनशाली

बनाते हो, पालन करते हो एवं अनिष्ट कामना करने वालों से उसकी रक्षा करते हो. (६) यस्ते भरादग्नियेत चिदन्नं निशिषन्मन्द्रमतिथिमुदीरत्. आ देवयुरिनधते दुरोणे तस्मिन्न्रायिर्ध्रुवो अस्तु दास्वान्.. (७) हे अग्नि! जो अन्न की अभिलाषा करने वाले तुम्हारे लिए हव्य अन्न धारण करता है, नशा करने वाला सोम अधिक मात्रा में देता है, पूज्य अतिथि के समान तुम्हें उत्तर वेदी पर स्थापित करता है एवं देव बनने की अभिलाषा से तुम्हें अपने घर में प्रज्वलित करता है, उसका पुत्र पक्का आस्तिक एवं विशिष्ट दानी हो. (७) यस्त्व दोषा य उषसि प्रशंसात्प्रियं वा त्वा कृणवते हविष्मान्. अश्वो न स्वे दम आ हेम्यावान्तमंहसः पीपरो दाश्वांसम्.. (८) हे अग्नि! जो पुरुष रात में या प्रातःकाल तुम्हारी स्तुति करता है अथवा हाथ में प्रिय हव्य लेकर तुम्हें प्रसन्न करता है, यज्ञशाला में सुनहरी काठी वाले घोड़े के समान घूमते हुए तुम दरिद्रता से उसे बचाओ. (८) यस्तुभ्यमग्ने अमृताय दाशद् दुवस्त्वे कृणवते यतस्रुक्. न स राया शशमानो वि योषन्नैनमंहः परि वरदघायोः.. (९) हे मरणरहित अग्नि! जो यजमान तुम्हें हव्य देता है, अथवा माला हाथ में लेकर तुम्हारी सेवा करता है, वह स्तोत्र को बोलने वाला यजमान धनहीन न हो तथा हिंसकों का कष्ट उसे न छू सके. (९) यस्य त्वमग्ने अध्वरं जुजोषो देवो मर्तस्य सुधितं रराणः. प्रीतेदसद्धोत्रा सा यविष्ठासाम यस्य विधतो वृधासः.. (१०) हे प्रसन्न, युवक एवं दीप्तिशाली अग्नि! तुम जिस यजमान का भली प्रकार अर्पित एवं हिंसारहित अन्न खाते हो, वह होता अवश्य प्रसन्न होता है. अग्नि की सेवा करने वाले जिस यजमान का यज्ञ होता आदि बढ़ाते हैं, हम उसीसे संबंध रखेंगे. (१०) चित्तिमचित्तिं चिनवद्वि विद्वान्पृष्ठेव वीता वृजिना च मर्तान्. राये च नः स्वपत्याय देव दितिं च रास्वादितिमुरुष्य.. (११) विद्वान् अग्नि मनुष्यों के पुण्य एवं पाप को उसी प्रकार अलग कर दें. जिस प्रकार घोड़ों को पालने वाला कोमल और कठोर पीठ वाले घोड़ों को अलग-अलग छांट देता है. हे अग्नि देव! हमें सुंदर संतान के साथ धन दो. तुम दान करने वाले को धन दो और दानहीन से धन को बचाओ. (११) कविं शशासुः कवयोऽदब्धा निधारयन्तो दुर्यास्वायोः. ebook converter DEMO Watermarks*

अतस्त्वं दृश्याँ अग्न एतान्यङ्ग्भिः पश्येरद्भुताँ अर्य एवैः.. (१२) हे अग्नि! मनुष्यों के घरों में रहने वाले तिरस्कारशून्य एवं क्रांतदर्शी देवों ने तुझ मेधावी से होता बनने के लिए कहा है. हे यज्ञस्वामी! तुम अपने गतिशील तेजों से इन दर्शनीय एवं आश्चर्ययुक्त देवों को देखो. (१२) त्वमग्ने वाघते सुप्रणीतिः सुतसोमाय विधते यविष्ठ. रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथुश्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः.. (१३) हे अतिशय युवा, दीप्तियुक्त, मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं उत्तर वेदी पर स्थापित करने योग्य अग्नि! सोम निचोड़ने वाले व तुम्हारी सेवा तथा स्तुति करने वाले यजमान की रक्षा के लिए उसे अधिक मात्रा में आनंददायक एवं उत्तम धन दो. (१३) अधा ह यद्द्यमग्ने त्वाया पड्भिर्हस्तेभिश्चकृमा तनूभिः. रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोर्ऋतं येमुः सुध्य आशुषाणाः.. (१४) हे अग्नि! हम हाथों, पैरों एवं शरीर के अन्य अवयवों द्वारा जिस प्रयोजन के लिए तुम्हें उत्पन्न करते हैं, उत्तम कर्मों वाले एवं यज्ञादि कर्मों में तल्लीन अंगिरा भी अपनी भुजाओं से अरणिमंथन करके तुम्हें उसी कर्म के लिए इस प्रकार उत्पन्न करते हैं, जिस प्रकार कारीगर रथ तैयार करता है. (१४) अधा मातुरुषसः सप्त विप्रा जायेमहि प्रथमा वेधसो नॄन्. दिवस्पुत्रा अङ्गिरसो भवेमाद्रिं रुजेम धनिनं शुचन्तः.. (१५) हम आठ श्रेष्ठ मेधावी (छः अंगिरा एवं सातवें वामदेव) जनों ने उषा माता से अग्नि की किरणों को लिया है. तेजस्वी सूर्य के पुत्र हम अंगिरा दीप्तियुक्त होते हुए गोधन को रोकने वाले एवं जलपूर्ण पर्वत को भेदेंगे. (१५) अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशूषाणाः. शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (१६) हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ, पुरातन एवं सच्चे यज्ञ के करने में संलग्न पूर्वजों ने तेजस्वी स्थान तथा दीप्ति प्राप्त की थी, उक्थमंत्र बोलकर अंधकार को नष्ट किया था तथा पणियों द्वारा चुराई गई लाल रंग वाली गायों को बाहर निकाला था. (१६) सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः. शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अगमन्.. (१७) यागादि शोभन कार्य करने वाले, उत्तम-दीप्तिसंपन्न एवं देवों की अभिलाषा करने वाले स्तोतागण यज्ञादि द्वारा अपना मनुष्यजन्म इस प्रकार निर्मल कर रहे हैं, जिस प्रकार लोहार ebook converter DEMO Watermarks*

धौंकनी के द्वारा लोहे को साफ करता है. अग्नि को दीप्तिशाली करते एवं इंद्र को बढ़ाते हुए उन लोगों ने यज्ञ के चारों ओर बैठकर महान् गोधन को प्राप्त किया था. (१७) आ यूथेव क्षुमति पश्वो अख्यद्देवानां यज्जन्निमान्त्युग्र. मर्तानां चिदुर्वशीरकृप्रन्वृधे चिदर्य उपरस्यायोः.. (१८) हे तेजस्वी अग्नि! अंगिराओं के पर्वत में बंद गोसमूह को इंद्र ने उसी प्रकार देखा, जिस प्रकार लोग अन्न वाले घर में पशुसमूह को देखते हैं. अंगिराओं द्वारा लाई गईं गायों से प्रजाएं संपन्न बनी थीं. स्वामी संतान के पालन एवं दास अपने पालन में समर्थ हुए थे. (१८) अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवस्त्रनुषसो विभातिः. अनूनमग्निं पुरुधा सुश्चन्द्रं देवस्य मर्मृजतश्चारु चक्षुः.. (१९) हे अग्नि! हम तुम्हारी सेवा करते हुए शोभन कर्मों वाले बनें. प्रकाश वाली उषाएं सबको तेज से ढक देती हैं तथा प्रसन्नताकारक अग्नि को अनेक बार पूर्ण रूप से धारण करती हैं. हे तेजस्वी अग्नि! हम तुम्हारे मनोहर तेज की सेवा करके शोभनकर्मयुक्त बनें. (१९) एता ते अग्न उचथानि वेधोऽवोचाम कवये ता जुषस्व. उच्छोचस्व कृणुहि वस्यसो नो महो रायः पुरुवार प्र यन्धि.. (२०) हे विधाता एवं मेधावी अग्नि! अपने उद्देश्य से बोले गए इस मंत्रसमूह को स्वीकार करो एवं उद्दीप्त होकर हमें परमसंपत्तिशाली बनाओ. हे बहुतों द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! हमें महान् धन दो. (२०) सूक्त-३ देवता—अग्नि आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः. अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्.. (१) हे यजमानो! वज्र के समान ध्रुवमृत्यु से पहले ही यज्ञ के स्वामी, देवों को बुलाने वाले, शत्रुओं को रुलाने वाले, धरती-आकाश को अन्न देने वाले एवं सुनहरी प्रभा से युक्त अग्नि की अपनी रक्षा के निमित्त हवि से सेवा करो. (१) अयं योनिश्चकृमा यं वयं ते जायेव पत्य उशती सुवासाः. अर्वाचीनः परिवीतो नि षीदेमा उ ते स्वपाक प्रतीचीः.. (२) हे अग्नि! जिस प्रकार पति की अभिलाषा करती हुई एवं शोभन वस्त्रों वाली पत्नी अपने समीप पति को स्थान देती है, उसी प्रकार हम तुम्हारे लिए उत्तर वेदी रूप स्थान निश्चित करते हैं. हे उत्तम कर्मों वाले अग्नि! तुम देवों से घिरे हुए हमारे सामने बैठो. समस्त ebook converter DEMO Watermarks*

स्तुतियां तुम्हारे सम्मुख होंगी. (२) आशृण्वते अदृपिताय मन्म नृचक्षसे सुमृळीकाय वेधः. देवाय शस्तिममृताय शंस ग्रावेव सोता मधुषुद्यमीळे.. (३) हे स्तुतिकर्त्ताओं! स्तोत्र सुनने वाले, प्रमादरहित, मनुष्यों को देखने वाले, शोभन सुखदाता एवं मरणरहित अग्नि देव के लिए स्तोत्र बोलो. पत्थरों के समान सोमरस निचोड़ने वाले यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. (३) त्वं चिन्नः शम्या अग्ने अस्या ऋतस्य बोध्युतचित्स्वाधीः. कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते.. (४) हे अग्नि! तुम हमारे इस यज्ञकर्म के देव बनो. हे सत्ययज्ञ वाले एवं शोभनकर्मयुक्त अग्नि! तुम हमारे स्तोत्र को जानो. हमें प्रसन्न करने वाले तुम्हारे स्तोत्र हमारे घरों में कब बोले जावेंगे एवं तुम्हारे साथ मित्रता हमारे घर में कब बनेगी? (४) कथा ह तद्वरुणाय त्वमग्ने कथा दिवे गर्हसे कन्न आगः. कथा मित्राय मीळहुषे पृथिव्यै ब्रवः कदर्यम्णे कद्भग़ाय.. (५) हे अग्नि! तुम वरुण एवं सविता के समीप हमारी निंदा क्यों करते हो? हमसे क्या अपराध हुआ है? तुमने कामवर्षी मित्र, पृथ्वी, अर्यमा एवं भग को हमारा पाप क्यों बताया? (५) कद्धिष्ण्यासु वृधानो अग्ने कद्धाताय प्रतवसे शुभंये. परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदर्ग्ने रुद्राय नृघ्ने.. (६) हे अग्नि! यज्ञ में बढ़ते हुए तुम अतिशय बलशाली, शुभ फलदाता एवं सर्वत्र गमनशील अश्विनीकुमारों, वायु, धरती एवं पापियों का नाश करने वाले इंद्र से हमारे पाप के विषय में क्यों कहते हो? (६) कथा महे पुष्टिम्भराय पूष्णे कद्रुद्राय सुमखाय हविर्दे. कद्विष्णव उरुगायाय रेतो ब्रवः कद्ग्ने शरवे बृहत्यै.. (७) हे अग्नि! हमारे पाप की वह कहानी महान् एवं पुष्टिकारक पूषा, पूजनीय एवं हविदाता रुद्र, बहुतों द्वारा प्रशंसित विष्णु अथवा महान् संवत्सर से क्यों कहते हो? (७) कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः. प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान्.. (८) हे अग्नि! सत्यरूप, मरुद्गण, महान् सूर्य, देवी अदिति एवं वेगशाली वायु द्वारा पूछे

जाने पर हमारे पाप की बात उन्हें क्यों बताते हो? हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम सब कुछ जानते हुए देवों के पास जाओ. (८) ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत्पक्वमग्ने. कृष्णा सती रुशता धासिनैषा जामर्येण पयसा पीपाय.. (९) हे अग्नि! हम गायों से उस दूध की याचना करते हैं जो यज्ञ से नित्य संबंधित है. वे गाएं स्वयं सच्ची होते हुए भी मधुर दूध देती हैं. वे गाएं स्वयं काली हैं, पर श्वेत-वर्ण, प्राणधारक एवं प्रजाओं को अमर बनाने वाले दूध से पुष्ट करती हैं. (९) ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन. अस्पन्दमानो अचरद्वयोधा वृषा शुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः.. (१०) कामवर्षी एवं श्रेष्ठ अग्नि सत्यरूप एवं पालन करने वाले दूध से भरे रहते हैं. अन्न देने वाले वे अग्नि एक जगह रहकर भी सब जगह चलते हैं. जलवर्षक सूर्य बादलों से जल दुहते हैं. (१०) ऋतेनाद्रिं व्यसन्भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः. शुनं नरः परि षदनुषसमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ.. (११) मेधातिथि आदि अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने यज्ञ के द्वारा गायों को रोकने वाले पहाड़ को उखाड़ फेंका था एवं वे अपनी गायों के पास पहुंच गए थे. उन यज्ञनेताओं ने सुख से उषा को पाया था. अरणिमंथन द्वारा अग्नि उत्पन्न होने पर सूर्य देव प्रकट हुए. (११) ऋतेन देवीरमृता अमृक्ता अर्णोभिरापो मधुमद्भििरग्ने. वाजी न सर्गेषु प्रस्तुभानः प्र सदमित्स्रवितवे दधन्युः.. (१२) हे अग्नि! अमृत का कारण, बाधारहित एवं मधुर जल से भरी हुई दिव्य नदियां यज्ञ की प्रेरणा से सदा इस प्रकार बहती रहती हैं, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित घोड़ा बढ़ता है. (१२) मा कस्य यक्षं सदमिद्धुरो गा मा वेशस्य प्रमिनतो मापेः. मा भ्रातुरग्ने अनृजोर्ऋणं वेर्मा सख्युर्दक्षं रिपोर्भुजेम.. (१३) हे अग्नि! हमारे हिंसक, दुष्टबुद्धि पड़ोसी अथवा हमारे अतिरिक्त किसी भी बंधु के यज्ञ में मत जाना तथा कुटिलबुद्धि वाले हमारे भ्राता का हव्य धारण मत करना. हम शत्रु अथवा मित्र का दिया अन्न भोग में न लाकर केवल तुम्हारे द्वारा दिए गए अन्न का ही उपभोग करेंगे. (१३) रक्षा णो अग्ने तव रक्षणेभी रारक्षाणः सुमख प्रीणानः. ebook converter DEMO Watermarks*

प्रति ष्फुर वि रुज वीड्वंहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम्.. (१४) हे उत्तम धन वाले, हम लोगों के महान् रक्षक एवं हव्य द्वारा प्रसन्न अग्नि! तुम अपनी रक्षा द्वारा प्रसन्न हमें उन्नत बनाओ, शक्तिशाली पाप का नाश करो एवं महान् तथा वृद्धि-प्राप्त विघ्न का नाश करो. (१४) एभिर्भव सुमना अग्ने अर्कैरिमन्त्सपृश मन्मभिः शूर वाजान्. उत ब्रह्माण्यङ्गिरो जुषस्व सं ते शस्तिर्देववाता जरेत.. (१५) हे अग्नि! मेरी इन पूज्य स्तुतियों द्वारा प्रसन्नमन बनो. हे शूर! स्तोत्रों के साथ हमारे अन्न को स्वीकार करो. हे हव्यप्राप्तकर्त्ता अग्नि! हमारे मंत्रों को स्वीकार करो. देवों की स्तुति के निमित्त बने मंत्र तुम्हें बढ़ावें. (१५) एता विश्वा विदुषे तुभ्यं वेधो नीथान्यग्ने निण्या वचांसि. निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः.. (१६) हे विधाता, यज्ञकर्म के ज्ञानी एवं क्रांतदर्शी! हम बुद्धिमान् लोग तुम्हें लक्ष्य करके फल प्राप्त कराने वाली, गूढ़, सभी प्रकार कहने योग्य एवं विद्वानों द्वारा बनाई हुई समस्त स्तुतियों को एक साथ बोलते हैं. (१६) सूक्त-४ देवता—अग्नि कृणुष्व पाजः प्रसितिं याहि राजेवामवाँ इभेन. तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः.. (१) हे अग्नि! बहेलिया जिस प्रकार जाल फैलाता है, उसी प्रकार तुम अपने भयनाशक तेजसमूह को फैलाओ. राजा जिस प्रकार अपने मंत्री के साथ चलता है, उसी प्रकार तुम भी अपने तेजों के साथ आगे बढ़ो. तेज चलने वाली शत्रुसेना के पीछे चलते हुए तुम उसका नाश करो एवं अपने अत्यंत तप्त तेजों से राक्षसों का हनन करो. (१) तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः. तपूंष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसेन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः.. (२) हे अग्नि! तुम्हारी घूमने वाली एवं शीघ्रगामिनी किरणें सब जगह फैलती हैं. तुम अत्यंत दीप्त होकर हराने वाले तेज से शत्रुओं को जलाओ. हे शत्रु द्वारा निरुद्ध न होने वाले अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं द्वारा तेज चिनगारियों तथा उल्काओं को चारों ओर फैलाओ. (२) प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः. यो नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्.. (३)

हे अतिशय वेगशाली अग्नि! शत्रुओं को बाधा पहुंचाने वाली किरणों को विशेष रूप से फैलाओ. हे हिंसारहित अग्नि! जो दूर रहकर हमारा बुरा चाहता है अथवा पास रहकर हमारे अनिष्ट की इच्छा करता है, तुम उससे हम लोगों की रक्षा करो. हम तुम्हारे हैं. कोई हमें हरा न सके. (३) उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्य१मित्राँ ओषतात्तिग्महेते. यो नो अरातिं समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्.. (४) हे तेज ज्वालाओं वाले अग्नि! उठो एवं राक्षसों के नाश में लगो, शत्रुओं के विरुद्ध अपनी ज्वालाएं फैलाओ एवं तेज-समूह द्वारा शत्रुओं को जलाओ. हे भली प्रकार प्रज्वलित अग्नि! जो व्यक्ति हमसे शत्रुता रखता हो उस नीच को सूखी लकड़ी के समान जला दो. (४) ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने. अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्.. (५) हे अग्नि! तुम तैयार हो जाओ और हमसे अधिक बलशाली राक्षसों को एक-एक करके मारो, अपने दिव्य तेज का आविष्कार करो, प्राणियों को क्लेश देने वाले राक्षसों के धनुषों को डोरी से हीन बनाओ तथा हमारे द्वारा पराजित अथवा अपराजित सभी शत्रुओं को समाप्त करो. (५) स ते जानाति सुमतिं यविष्ठ य ईवते ब्रह्मणे गातुमैरत्. विश्वान्यस्मै सुदिनानि रायो द्युम्नान्यर्यो वि दुरो अभि द्यौत्.. (६) हे अतिशय युवा, गमनशील एवं श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाला व्यक्ति तुम्हारा अनुग्रह प्राप्त करता है. हे यज्ञस्वामी अग्नि! तुम उसके लिए संपूर्ण रूप से उत्तम दिवस, धन एवं रत्नों को लेकर उसके घर के सामने प्रकाशित बनो. (६) सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः. पिप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना सासदिष्टिः.. (७) हे अग्नि! जो व्यक्ति तुम्हें नित्य हव्य एवं मंत्रों से प्रसन्न करना चाहता है, वह शोभन-धन वाला एवं दानशील हो, कठिनता से मिलने वाली सौ वर्ष की आयु प्राप्त करे, उसके सभी दिन उत्तम हों एवं उसका यज्ञ फल देने वाला हो. (७) अर्चामि ते सुमतिं घोष्यर्वाक्सं ते वावाता जरतामियं गीः. स्वश्वास्त्वा सुरथा मर्जयेमास्मे क्षत्राणि धारयेरनु द्यून.. (८) हे अग्नि! हम तुम्हारी शोभन-बुद्धि की उपासना करते हैं. बार-बार तुम्हें प्राप्त होने के विचार से बोली गई वाणी गूंजती हुई तुम्हारी स्तुति करे. हम सुंदर घोड़ों एवं शोभन रथों से युक्त होकर तुम्हें अलंकृत करें. तुम प्रतिदिन हम लोगों को धनसंपन्न बनाओ. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन्दोषावस्तर्दीदिवांसमनु द्यून्. क्रीळन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम्.. (९) हे रात-दिन दीप्ति होने वाले अग्नि! बहुत से लोग इस संसार में प्रतिदिन तुम्हारी सेवा करते हैं. हम भी शत्रुजनों की संपत्तियां तुम्हारी कृपा से अपने अधिकार में करते हुए तथा अपने घरों में पुत्र-पौत्रों के साथ क्रीड़ा करते हुए प्रसन्न मन से तुम्हारी सेवा करें. (९) यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन. तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमानुषग्जुजोषत्.. (१०) हे अग्नि! सुंदर घोड़ों वाला एवं यज्ञ के योग्य संपत्तियों का स्वामी जो पुरुष अन्नयुक्त रथ के द्वारा तुम्हारे पास आता है, तुम उसकी रक्षा करते हो, जो पुरुष क्रम से तुम्हारा अतिथि सत्कार करता है, उसके तुम मित्र बनते हो. (१०) महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय. त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतोदमूनाः.. (११) हे होता, अतिशय युवा एवं शोभन-बुद्धि अग्नि! स्तोत्रों द्वारा हमने तुम्हारी मित्रता प्राप्त की है. उससे हम अपने शत्रु राक्षसों का नाश करें. यह स्तोत्र हमें अपने पिता गौतम से प्राप्त हुआ है. हे शत्रुनाशक अग्नि! हमारे इन स्तुतिवचनों को जानो. (११) अस्वप्नजस्तरशयः सुशेवा अतन्द्रासोऽवृका अश्रमिष्ठाः. ते पायवः सध्र्यञ्चो निषद्याग्ने तव नः पान्त्वमूर.. (१२) हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम्हारी जागरूक, नित्य गतिशील, उत्तम-सुख देने वाली, आलस्यहीन, हिंसारहित, कभी न थकने वाली, परस्पर मिली हुई एवं रक्षक किरणें हमारे यज्ञ में बैठकर हमारी रक्षा करें. (१२) ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन्. ररक्ष तान्सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः.. (१३) हे अग्नि! तुम्हारी रक्षा करने वाली एवं करुणादृष्टियुक्त किरणों ने ममता के अंधे पुत्र दीर्घतमा की शाप से रक्षा की थी. हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! तुम उन उत्तम कर्म वाली किरणों की रक्षा करते हो. नष्ट करने की इच्छा रखने वाले शत्रु भी उसे समाप्त नहीं कर सके. (१३) त्वया वयं सधन्य१स्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान्. उभा शंसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठ्या कृण्वह्रयाण.. (१४) हे अलज्जित गमन वाले अग्नि! हम स्तोता तुम्हारी कृपा से धनयुक्त एवं रक्षित होकर ebook converter DEMO Watermarks*