ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 671, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसेवा योग्य बृहस्पति से मैं मनचाहा फल मांगता हूं. (६) इयं ते पूषन्नाघृणे सुष्टुतिर्देव नव्यसी. अस्माभिस्तुभ्यं शस्यते.. (७) हे पूषादेव! यह अतिशय नवीन एवं शोभन स्तुति तुम्हारे लिए है. इसे हम तुम्हारे निमित्त बोलते हैं. (७) तां जुषस्व गिरं मम वाजयन्तीमवा धियम्. वध्यूरिव योषणाम्.. (८) हे पूषा! तुम मेरी स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार करो. कामी पुरुष जिस प्रकार नारी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तुति के सामने आओ. (८) यो विश्वाभि विपश्यति भुवनां सं च पश्यति. स नः पूषाविता भुवत्.. (९) जो सूर्य सब लोकों को विशेष रूप से देखते हैं एवं सभी वस्तुओं को वास्तव में जानते हैं, वे हमारे रक्षक हैं. (९) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (१०) हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जिन्होंने हमारी बुद्धि को प्रेरित किया. (१०) देवस्य सवितुर्वयं वाजयन्तः पुरंध्या. भगस्य रातीमीमहे.. (११) अन्न की अभिलाषा करते हुए हम लोग तेजस्वी सविता देव के धन का दान उनकी स्तुति द्वारा चाहते हैं. (११) देवं नरः सवितारं विप्रा यज्ञैः सुवृक्तिभिः. नमस्यन्ति धियेषिताः.. (१२) यज्ञकर्मकुशल एवं मेधावी अध्वर्यु आदि यज्ञ करने की भावना से प्रेरित होकर हव्य एवं स्तुतियों द्वारा सविता देव की सेवा करते हैं. (१२) सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम्. ऋतस्य योनिमासदम्.. (१३) मार्ग को जानने वाला सोमरस गंतव्य स्थान दिखाता है एवं देवों के बैठने योग्य यज्ञस्थल में जाता है. (१३) सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे. अनमीवा इषस्करत्.. (१४) सोम हम मानवों तथा दो पैर और चार पैर वाले पशुओं को रोगरहित अन्न दे. (१४) अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः. सोमः सधस्थमासदत्.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*