ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 666, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंरथो ह वां भूरि वर्पः करिक्रत्सुतावतो निष्कृतमागमिष्ठः.. (९) हे अश्विनीकुमारो! मधुर-रस से युक्त सोमरस को पिओ एवं हमारे घर आओ. तुम्हारा अतिशय धन देने वाला रथ सोम निचोड़ने वाले यजमान के शुद्ध घर में बार-बार आता है. (९) सूक्त—५९ देवता—मित्र मित्रो जनान्यातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवीमुत द्याम्. मित्रः कृष्टीरनिमिषाभि चष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत.. (१) स्तुति किए जाने पर मित्र देव सभी लोगों को खेती आदि कामों में लगा देते हैं. वे धरती और आकाश दोनों को धारण करते हैं एवं यज्ञकर्म करने वालों को भली प्रकार देखते हैं. घी मिला हुआ हव्य मित्र के लिए हवन करो. (१) प्र स मित्र मर्तो अस्तु प्रयस्वान्यस्त आदित्य शिक्षति व्रतेन. न हन्यते न जीयते त्वोतो नैनमंहो अश्नोत्यन्तितो न दूरात्.. (२) हे आदित्य देव! जो गाय का घृत लेकर तुम्हें हव्य देता है, वह मनुष्य अन्न का स्वामी बने. तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे न कोई नष्ट कर सकता है और न हरा सकता है. उसे पास से या दूर से पाप भी नहीं छू सकता. (२) अनमीवास इळया मदन्तो मितज्ञवो वरिमन्ना पृथिव्याः. आदित्यस्य व्रतमुपक्षियन्तो वयं मित्रस्य सुमतौ स्याम.. (३) हे मित्र! निरोग एवं अन्न के कारण प्रसन्न हम धरती के विस्तृत भाग में घुटने टेककर इच्छानुसार चलते हुए आदित्य के यज्ञ के समीप निवास करते हैं. हम लोग आदित्य की कृपादृष्टि में रहें. (३) अयं मित्रो नमस्यः सुशेवो राजा सुक्षत्रो अजनिष्ट वेधाः. तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (४) सबके नमस्कार करने योग्य, सुख से सेव्य, सर्व जगत् के स्वामी, शोभन बलयुक्त एवं सबके विधाता सूर्य उत्पन्न हुए हैं. उन यज्ञपात्र सूर्य की अनुग्रह बुद्धि तथा कल्याण करने वाली मित्रता का हम पावें. (४) महाँ आदित्यो नमसोपसद्यो यातयज्जनो गृणते सुशेवः. तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविरा जुहोत.. (५) महान् आदित्य लोगों को अपने-अपने कर्म में लगाने वाले एवं नमस्कार द्वारा सेवा करने ebook converter DEMO Watermarks*