ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 683, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रति ष्फुर वि रुज वीड्वंहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम्.. (१४) हे उत्तम धन वाले, हम लोगों के महान् रक्षक एवं हव्य द्वारा प्रसन्न अग्नि! तुम अपनी रक्षा द्वारा प्रसन्न हमें उन्नत बनाओ, शक्तिशाली पाप का नाश करो एवं महान् तथा वृद्धि-प्राप्त विघ्न का नाश करो. (१४) एभिर्भव सुमना अग्ने अर्कैरिमन्त्सपृश मन्मभिः शूर वाजान्. उत ब्रह्माण्यङ्गिरो जुषस्व सं ते शस्तिर्देववाता जरेत.. (१५) हे अग्नि! मेरी इन पूज्य स्तुतियों द्वारा प्रसन्नमन बनो. हे शूर! स्तोत्रों के साथ हमारे अन्न को स्वीकार करो. हे हव्यप्राप्तकर्त्ता अग्नि! हमारे मंत्रों को स्वीकार करो. देवों की स्तुति के निमित्त बने मंत्र तुम्हें बढ़ावें. (१५) एता विश्वा विदुषे तुभ्यं वेधो नीथान्यग्ने निण्या वचांसि. निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः.. (१६) हे विधाता, यज्ञकर्म के ज्ञानी एवं क्रांतदर्शी! हम बुद्धिमान् लोग तुम्हें लक्ष्य करके फल प्राप्त कराने वाली, गूढ़, सभी प्रकार कहने योग्य एवं विद्वानों द्वारा बनाई हुई समस्त स्तुतियों को एक साथ बोलते हैं. (१६) सूक्त-४ देवता—अग्नि कृणुष्व पाजः प्रसितिं याहि राजेवामवाँ इभेन. तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः.. (१) हे अग्नि! बहेलिया जिस प्रकार जाल फैलाता है, उसी प्रकार तुम अपने भयनाशक तेजसमूह को फैलाओ. राजा जिस प्रकार अपने मंत्री के साथ चलता है, उसी प्रकार तुम भी अपने तेजों के साथ आगे बढ़ो. तेज चलने वाली शत्रुसेना के पीछे चलते हुए तुम उसका नाश करो एवं अपने अत्यंत तप्त तेजों से राक्षसों का हनन करो. (१) तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः. तपूंष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसेन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः.. (२) हे अग्नि! तुम्हारी घूमने वाली एवं शीघ्रगामिनी किरणें सब जगह फैलती हैं. तुम अत्यंत दीप्त होकर हराने वाले तेज से शत्रुओं को जलाओ. हे शत्रु द्वारा निरुद्ध न होने वाले अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं द्वारा तेज चिनगारियों तथा उल्काओं को चारों ओर फैलाओ. (२) प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः. यो नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्.. (३)