भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 682, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 682

जाने पर हमारे पाप की बात उन्हें क्यों बताते हो? हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम सब कुछ जानते हुए देवों के पास जाओ. (८) ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत्पक्वमग्ने. कृष्णा सती रुशता धासिनैषा जामर्येण पयसा पीपाय.. (९) हे अग्नि! हम गायों से उस दूध की याचना करते हैं जो यज्ञ से नित्य संबंधित है. वे गाएं स्वयं सच्ची होते हुए भी मधुर दूध देती हैं. वे गाएं स्वयं काली हैं, पर श्वेत-वर्ण, प्राणधारक एवं प्रजाओं को अमर बनाने वाले दूध से पुष्ट करती हैं. (९) ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन. अस्पन्दमानो अचरद्वयोधा वृषा शुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः.. (१०) कामवर्षी एवं श्रेष्ठ अग्नि सत्यरूप एवं पालन करने वाले दूध से भरे रहते हैं. अन्न देने वाले वे अग्नि एक जगह रहकर भी सब जगह चलते हैं. जलवर्षक सूर्य बादलों से जल दुहते हैं. (१०) ऋतेनाद्रिं व्यसन्भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः. शुनं नरः परि षदनुषसमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ.. (११) मेधातिथि आदि अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने यज्ञ के द्वारा गायों को रोकने वाले पहाड़ को उखाड़ फेंका था एवं वे अपनी गायों के पास पहुंच गए थे. उन यज्ञनेताओं ने सुख से उषा को पाया था. अरणिमंथन द्वारा अग्नि उत्पन्न होने पर सूर्य देव प्रकट हुए. (११) ऋतेन देवीरमृता अमृक्ता अर्णोभिरापो मधुमद्भििरग्ने. वाजी न सर्गेषु प्रस्तुभानः प्र सदमित्स्रवितवे दधन्युः.. (१२) हे अग्नि! अमृत का कारण, बाधारहित एवं मधुर जल से भरी हुई दिव्य नदियां यज्ञ की प्रेरणा से सदा इस प्रकार बहती रहती हैं, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित घोड़ा बढ़ता है. (१२) मा कस्य यक्षं सदमिद्धुरो गा मा वेशस्य प्रमिनतो मापेः. मा भ्रातुरग्ने अनृजोर्ऋणं वेर्मा सख्युर्दक्षं रिपोर्भुजेम.. (१३) हे अग्नि! हमारे हिंसक, दुष्टबुद्धि पड़ोसी अथवा हमारे अतिरिक्त किसी भी बंधु के यज्ञ में मत जाना तथा कुटिलबुद्धि वाले हमारे भ्राता का हव्य धारण मत करना. हम शत्रु अथवा मित्र का दिया अन्न भोग में न लाकर केवल तुम्हारे द्वारा दिए गए अन्न का ही उपभोग करेंगे. (१३) रक्षा णो अग्ने तव रक्षणेभी रारक्षाणः सुमख प्रीणानः. ebook converter DEMO Watermarks*