ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 681, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तुतियां तुम्हारे सम्मुख होंगी. (२) आशृण्वते अदृपिताय मन्म नृचक्षसे सुमृळीकाय वेधः. देवाय शस्तिममृताय शंस ग्रावेव सोता मधुषुद्यमीळे.. (३) हे स्तुतिकर्त्ताओं! स्तोत्र सुनने वाले, प्रमादरहित, मनुष्यों को देखने वाले, शोभन सुखदाता एवं मरणरहित अग्नि देव के लिए स्तोत्र बोलो. पत्थरों के समान सोमरस निचोड़ने वाले यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. (३) त्वं चिन्नः शम्या अग्ने अस्या ऋतस्य बोध्युतचित्स्वाधीः. कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते.. (४) हे अग्नि! तुम हमारे इस यज्ञकर्म के देव बनो. हे सत्ययज्ञ वाले एवं शोभनकर्मयुक्त अग्नि! तुम हमारे स्तोत्र को जानो. हमें प्रसन्न करने वाले तुम्हारे स्तोत्र हमारे घरों में कब बोले जावेंगे एवं तुम्हारे साथ मित्रता हमारे घर में कब बनेगी? (४) कथा ह तद्वरुणाय त्वमग्ने कथा दिवे गर्हसे कन्न आगः. कथा मित्राय मीळहुषे पृथिव्यै ब्रवः कदर्यम्णे कद्भग़ाय.. (५) हे अग्नि! तुम वरुण एवं सविता के समीप हमारी निंदा क्यों करते हो? हमसे क्या अपराध हुआ है? तुमने कामवर्षी मित्र, पृथ्वी, अर्यमा एवं भग को हमारा पाप क्यों बताया? (५) कद्धिष्ण्यासु वृधानो अग्ने कद्धाताय प्रतवसे शुभंये. परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदर्ग्ने रुद्राय नृघ्ने.. (६) हे अग्नि! यज्ञ में बढ़ते हुए तुम अतिशय बलशाली, शुभ फलदाता एवं सर्वत्र गमनशील अश्विनीकुमारों, वायु, धरती एवं पापियों का नाश करने वाले इंद्र से हमारे पाप के विषय में क्यों कहते हो? (६) कथा महे पुष्टिम्भराय पूष्णे कद्रुद्राय सुमखाय हविर्दे. कद्विष्णव उरुगायाय रेतो ब्रवः कद्ग्ने शरवे बृहत्यै.. (७) हे अग्नि! हमारे पाप की वह कहानी महान् एवं पुष्टिकारक पूषा, पूजनीय एवं हविदाता रुद्र, बहुतों द्वारा प्रशंसित विष्णु अथवा महान् संवत्सर से क्यों कहते हो? (७) कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः. प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान्.. (८) हे अग्नि! सत्यरूप, मरुद्गण, महान् सूर्य, देवी अदिति एवं वेगशाली वायु द्वारा पूछे