भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 685, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 685

इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन्दोषावस्तर्दीदिवांसमनु द्यून्. क्रीळन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम्.. (९) हे रात-दिन दीप्ति होने वाले अग्नि! बहुत से लोग इस संसार में प्रतिदिन तुम्हारी सेवा करते हैं. हम भी शत्रुजनों की संपत्तियां तुम्हारी कृपा से अपने अधिकार में करते हुए तथा अपने घरों में पुत्र-पौत्रों के साथ क्रीड़ा करते हुए प्रसन्न मन से तुम्हारी सेवा करें. (९) यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन. तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमानुषग्जुजोषत्.. (१०) हे अग्नि! सुंदर घोड़ों वाला एवं यज्ञ के योग्य संपत्तियों का स्वामी जो पुरुष अन्नयुक्त रथ के द्वारा तुम्हारे पास आता है, तुम उसकी रक्षा करते हो, जो पुरुष क्रम से तुम्हारा अतिथि सत्कार करता है, उसके तुम मित्र बनते हो. (१०) महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय. त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतोदमूनाः.. (११) हे होता, अतिशय युवा एवं शोभन-बुद्धि अग्नि! स्तोत्रों द्वारा हमने तुम्हारी मित्रता प्राप्त की है. उससे हम अपने शत्रु राक्षसों का नाश करें. यह स्तोत्र हमें अपने पिता गौतम से प्राप्त हुआ है. हे शत्रुनाशक अग्नि! हमारे इन स्तुतिवचनों को जानो. (११) अस्वप्नजस्तरशयः सुशेवा अतन्द्रासोऽवृका अश्रमिष्ठाः. ते पायवः सध्र्यञ्चो निषद्याग्ने तव नः पान्त्वमूर.. (१२) हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम्हारी जागरूक, नित्य गतिशील, उत्तम-सुख देने वाली, आलस्यहीन, हिंसारहित, कभी न थकने वाली, परस्पर मिली हुई एवं रक्षक किरणें हमारे यज्ञ में बैठकर हमारी रक्षा करें. (१२) ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन्. ररक्ष तान्सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः.. (१३) हे अग्नि! तुम्हारी रक्षा करने वाली एवं करुणादृष्टियुक्त किरणों ने ममता के अंधे पुत्र दीर्घतमा की शाप से रक्षा की थी. हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! तुम उन उत्तम कर्म वाली किरणों की रक्षा करते हो. नष्ट करने की इच्छा रखने वाले शत्रु भी उसे समाप्त नहीं कर सके. (१३) त्वया वयं सधन्य१स्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान्. उभा शंसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठ्या कृण्वह्रयाण.. (१४) हे अलज्जित गमन वाले अग्नि! हम स्तोता तुम्हारी कृपा से धनयुक्त एवं रक्षित होकर ebook converter DEMO Watermarks*