ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन्दोषावस्तर्दीदिवांसमनु द्यून्. क्रीळन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम्.. (९) हे रात-दिन दीप्ति होने वाले अग्नि! बहुत से लोग इस संसार में प्रतिदिन तुम्हारी सेवा करते हैं. हम भी शत्रुजनों की संपत्तियां तुम्हारी कृपा से अपने अधिकार में करते हुए तथा अपने घरों में पुत्र-पौत्रों के साथ क्रीड़ा करते हुए प्रसन्न मन से तुम्हारी सेवा करें. (९) यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन. तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमानुषग्जुजोषत्.. (१०) हे अग्नि! सुंदर घोड़ों वाला एवं यज्ञ के योग्य संपत्तियों का स्वामी जो पुरुष अन्नयुक्त रथ के द्वारा तुम्हारे पास आता है, तुम उसकी रक्षा करते हो, जो पुरुष क्रम से तुम्हारा अतिथि सत्कार करता है, उसके तुम मित्र बनते हो. (१०) महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय. त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतोदमूनाः.. (११) हे होता, अतिशय युवा एवं शोभन-बुद्धि अग्नि! स्तोत्रों द्वारा हमने तुम्हारी मित्रता प्राप्त की है. उससे हम अपने शत्रु राक्षसों का नाश करें. यह स्तोत्र हमें अपने पिता गौतम से प्राप्त हुआ है. हे शत्रुनाशक अग्नि! हमारे इन स्तुतिवचनों को जानो. (११) अस्वप्नजस्तरशयः सुशेवा अतन्द्रासोऽवृका अश्रमिष्ठाः. ते पायवः सध्र्यञ्चो निषद्याग्ने तव नः पान्त्वमूर.. (१२) हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम्हारी जागरूक, नित्य गतिशील, उत्तम-सुख देने वाली, आलस्यहीन, हिंसारहित, कभी न थकने वाली, परस्पर मिली हुई एवं रक्षक किरणें हमारे यज्ञ में बैठकर हमारी रक्षा करें. (१२) ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन्. ररक्ष तान्सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः.. (१३) हे अग्नि! तुम्हारी रक्षा करने वाली एवं करुणादृष्टियुक्त किरणों ने ममता के अंधे पुत्र दीर्घतमा की शाप से रक्षा की थी. हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! तुम उन उत्तम कर्म वाली किरणों की रक्षा करते हो. नष्ट करने की इच्छा रखने वाले शत्रु भी उसे समाप्त नहीं कर सके. (१३) त्वया वयं सधन्य१स्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान्. उभा शंसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठ्या कृण्वह्रयाण.. (१४) हे अलज्जित गमन वाले अग्नि! हम स्तोता तुम्हारी कृपा से धनयुक्त एवं रक्षित होकर ebook converter DEMO Watermarks*
तुम्हारी प्रेरणा से अन्न प्राप्त करें. हे सत्य को विस्तृत करने वाले एवं पापनाशक अग्नि! हमारे दूर एवं समीपवर्ती शत्रुओं को नष्ट करो तथा क्रमशः सब कार्य पूरे करो. (१४) अया ते अग्ने समिधा विधेम प्रति स्तोमं शस्यमानं गृभाय. दहाशसो रक्षसः पाह्य१स्मान्द्रुहो निदो मित्रवहो अवद्यात्.. (१५) हे अग्नि! इस प्रदीप्त स्तुति द्वारा हम तुम्हारी सेवा करें. हमारी स्तुति को ग्रहण करो एवं स्तुति न करने वाले राक्षसों को जलाओ. हे मित्रों द्वारा पूजनीय अग्नि! द्रोह एवं निंदा करने वालों के अपयश से हमें बचाओ. (१५) सूक्त-५ देवता—अग्नि वैश्वानराय मीळहुषे सजोषाः कथा दाशेमाग्नये बृहद्भाः. अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः.. (१) परस्पर समान प्रेम रखने वाले हम ऋत्विज् और यजमान कामवर्षी एवं भासमान महान् वैश्वानर अग्नि को किस प्रकार हव्य दें? थूना जिस प्रकार छप्पर को धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि अपने विशाल एवं संपूर्ण शरीर से स्वर्ग को धारण करते हैं. (१) मा निन्दत य इमां मह्यं रातिं देवो ददौ मर्त्याय स्वधावान्. पाकाय गृत्सो अमृतो विचेता वैश्वानरो नृतमो यह्वो अग्निः.. (२) हे होताओ! वैश्वानर अग्नि की निंदा मत करो. वे हव्य पाकर हम मरणशील एवं पूर्ण- ज्ञान वाले यजमानों को यह दान देते हैं. वे मेधावी, मरणरहित, विशिष्ट बुद्धि वाले, नेताओं में श्रेष्ठ तथा महान् हैं. (२) साम द्विबर्हा महि तिग्मभृष्टिः सहस्ररेता वृषभस्तुविष्मान्. पदं न गोरपगूळ्हं विविद्वानग्निर्मह्यं प्रेदु वोचन्मनीषाम्.. (३) मध्यम और उत्तम दो स्थानों में विराजमान, तीक्ष्ण तेज वाले, अधिक सारयुक्त, कामवर्षी, बहुधनी, खोई हुई गाय के चरणचिह्नों के समान रहस्यपूर्ण एवं जानने योग्य अग्नि हमारे पूज्य एवं प्रिय स्तोत्र को बार-बार जानकर हमें बतावें. (३) प्र ताँ अग्निर्बभसत्तिग्मजम्भस्तपिष्ठेन शोचिषा यः सुराधाः. प्र ये मिनन्ति वरुणस्य धाम प्रिया मित्रस्य चेततो ध्रुवाणि.. (४) शोभन धनयुक्त एवं तीखे दांतों वाले अग्नि अत्यंत तापकारी तेज द्वारा उन्हें नष्ट करें जो जानने वाले मित्र और वरुण के प्रिय तथा ध्रुवतेज की निंदा करते हैं. (४) अभ्रातरो न योषणो व्यन्तः पतिरिपो न जनयो दुरेवाः. ebook converter DEMO Watermarks*
पापासः सन्तो अनृता असत्या इदं पदमजनता गभीरम्.. (५) बंधु-बांधवरहित नारी के समान यज्ञादि त्यागकर जाने वाले, पति से द्वेष करने वाली स्त्रियों के समान दुराचारी, पापी, मानस तथा वाचिक-सत्य-रहित लोग नरक को प्राप्त होते हैं. (५) इदं मे अग्ने कियते पावकामिनते गुरुं भारं न मन्म. बृहद्दधाथ धृषता गभीरं यह्वं पृष्टं प्रयसा सप्तधातु.. (६) हे पवित्रकर्त्ता अग्नि! जैसे अल्प-शक्ति वाले व्यक्ति पर भारी बोझा लादा जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा कर्म मेरे लिए भारी है, पर मैं उसका त्याग नहीं करता. तुम मुझे प्रिय, अधिक, शत्रुओं को हराने वाले अन्न से युक्त, गंभीर, महान्, स्पर्श करने योग्य एवं सात प्रकार का धन दान करो. (६) तमिन्न्वे३व समना समानमभि क्रत्वा पुनती धीतिरश्याः. ससस्य चर्मन्नधि चारु पृश्नेरग्रे रुप आरुपितं जबारु.. (७) उपयुक्त एवं हमें पवित्र करने वाली स्तुति कर्म के साथ शीघ्र ही वैश्वानर के पास पहुंचे. वह स्तुति वैश्वानर अग्नि के दीप्तिमंडल पृथ्वी से निश्चित स्वर्गलोक के ऊपर घूमने के लिए देवों ने पूर्व दिशा में स्थापित की है. (७) प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति. यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः.. (८) मेरे इस वचन के अतिरिक्त कहने योग्य अन्य बात क्या है? जानने वाले लोग कहते हैं कि दूध काढ़ने वाले जिस दूध को जल के समान निकालते हैं, उसे वैश्वानर अग्नि गुफा में छिपाकर रखते हैं एवं फैली हुई धरती के सर्वप्रिय तथा श्रेष्ठ स्थान की रक्षा करते हैं. (८) इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्रिया सचत पूर्व्यं गौः. ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद्रघुयद्विवेद.. (९) दुधारू गायों द्वारा अग्निहोत्रादि के लिए सेवित, अत्यंत चमकता हुआ, गुफा में शीघ्र गतिशील, प्रसिद्ध, महान् एवं पूज्य सूर्यमंडल रूपी वैश्वानर अग्नि को मैं जान चुका हूं. (९) अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः. मातुष्पदे परमे अन्ति षद्गोर्वृष्णः शोचिषः प्रयतस्य जिह्वा.. (१०) दीप्यमान वैश्वानर अग्नि धरती-आकाशरूपी माता-पिता के बीच में व्याप्त रहकर गाय के थन में छिपे हुए दूध को मुंह से पीने के लिए जागृत हुए थे. कामवर्षी, दीप्त एवं आहवनीय रूप से निश्चित वैश्वानर अग्नि की जीभ गोमाता के थन रूप उत्तम स्थान में ebook converter DEMO Watermarks*
उपस्थित है. (१०) ऋतं वोचे नमसा पृच्छ्यमानस्तवाशसा जातवेदो यदीदम्. त्वमस्य क्षयसि यद्ध विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत्पृथिव्याम्.. (११) मुझ यजमान से यदि कोई नमस्कार करके पूछे तो मैं सत्य कहूंगा. हे जातवेद अग्नि! यदि तुम्हारी स्तुति से हमें धन मिलेगा तो उसके स्वामी तुम्हीं बनोगे. सबके धन भी तुम्हारे ही हैं, चाहे वे धन स्वर्ग में हों या धरती पर. (११) किं नो अस्य द्रविणं कद्ध रत्नं वि नो वोचो जातवेदश्चिकित्वान्. गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य रेकु पदं न निदाना अगन्म.. (१२) इस धन का साधनरूप धन क्या है? हितकर धन क्या है? हे जातवेद! तुम इस बात को जानते हो, इसलिए हमें बताओ. धन प्राप्ति के मार्ग का गूढ़ उपाय भी हमें बताओ. हम निंदा के पात्र बने बिना गंतव्य स्थान को पा सकें. (१२) का मर्यादा वयुना कद्ध वाममच्छा गमेम रघवो न वाजम्. कदा नो देवीरमृतस्य पत्नीः सूरो वर्णेन ततनन्नुषासः.. (१३) पूर्व आदि दिशाओं की सीमा, पदार्थज्ञान एवं रमणीय वस्तुएं क्या हैं? इन्हें हम उसी प्रकार प्राप्त करें, जिस प्रकार तेज दौड़ने वाला घोड़ा युद्धभूमि में पहुंच जाता है. प्रकाशयुक्त, मरणरहित, सूर्य का पालन करने वाली एवं जन्म देने वाली उषाएं हमें अपने प्रकाश से कब घेरेंगी? (१३) अनिरेण वचसा फल्गुवेन प्रतीत्येन कृधुनातृपासः. अधा ते अग्ने किमिहा वदन्त्यनायुधास आसता सचन्ताम्.. (१४) हे अग्नि! हव्य-अन्न से रहित स्तुतियों एवं अर्थहीन ओछे वचनों द्वारा अतृप्त लोग इस संसार में तुम्हारे विषय में जो कुछ कहते हैं, वह व्यर्थ है, हव्य-रूपी साधन के बिना वे लोग दुःख उठाते हैं. (१४) अस्य श्रिये समिधानस्य वृष्णो वसोरनीकं दम आ रुरोच. रुशद्वसानः सुदृशीकरूपः क्षितिर्न राया पुरुवारो अद्यौत्.. (१५) यजमान के कल्याण के निमित्त प्रज्वलित, कामवर्षी एवं निवास स्थान देने वाले अग्नि की ज्वालाएं यज्ञशाला की ओर चमकती हैं. तेजधारी, रमणीय बल वाले व अनेक यजमानों द्वारा स्तुत अग्नि इस प्रकार प्रकाशित होते हैं, जिस प्रकार अश्व आदि धन से राजा शोभा पाता है. (१५) सूक्त-६ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्ध्व ऊ षु णो अध्वरस्य होतरग्ने तिष्ठ देवतात यजीयान्. त्वं हि विश्वमभ्यसि मन्म प्र वेधसश्चित्तिरसि मनीषाम्.. (१) हे यज्ञ के होता एवं यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ अग्नि! हमारे यज्ञों में तुम ऊंचे स्थान पर बैठो, शत्रुओं के समस्त धन पर अधिकार करो एवं यजमान की स्तुति को बढ़ाओ. (१) अमूरो होता न्यसादि विश्व१ग्निर्मन्द्रो विदथेषु प्रचेता:. ऊर्ध्वं भानुं सवितेवाश्रेन्मेतेव धूमं स्तभायदुप द्याम्.. (२) प्रगल्भ, यज्ञ पूर्ण करने वाले, हर्षित करने वाले एवं अधिक ज्ञान-युक्त अग्नि यज्ञों में प्रजाओं के साथ बैठते हैं, उदित सूर्य के समान ऊपर की ओर मुंह करते हैं एवं अपने धुएं को आकाश के ऊपर इस प्रकार स्थापित करते हैं, जिस प्रकार थूना अपने ऊपर बांस आदि को रखता है. (२) यता सुजूर्णी रातिनी घृताची प्रदक्षिणिद् देवतातिमुरान:. उदु स्वरुर्नवजा नाक्र: पश्वो अनक्ति सुधित: सुमेक:.. (३) भली प्रकार पकड़ी हुई और पुरानी घृताची (पात्र विशेष) घी से भरी हुई है. यज्ञ को बढ़ाने वाले अध्वर्यु प्रदक्षिणा कर रहे हैं. ताजा बनाया हुआ यूप ऊंचा उठता है. आक्रमण करने वाला एवं दीप्ति वाला कुठार भी पशुओं की ओर चलता है. (३) स्तीर्णे बर्हिषि समिधाने अग्ना ऊर्ध्वो अध्वर्युर्जुजुषाणो अस्थात्. पर्यग्नि: पशुपा न होता त्रिविष्ट्येति प्रदिव उराण:.. (४) वेदी पर कुश बिछ जाने एवं अग्नि के प्रज्वलित हो जाने पर अध्वर्यु उन्हें प्रसन्न करने के लिए उठता है. यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं पुरातन अग्नि थोड़े हव्य को भी बहुत बनाते हुए इस प्रकार तीन बार पशुओं की परिक्रमा करते हैं, जिस प्रकार पशुओं को पालने वाला. (४) परि त्मना मितद्रुरेति होताग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा. द्रवन्त्यस्य वाजिनो न शोका भयन्ते विश्वा भुवना यदभ्राट्.. (५) ये होता, प्रसन्न करने वाले, मधुरभाषी एवं यज्ञ के स्वामी अग्नि सीमित चाल से पशुओं के चारों ओर घूमते हैं. इनका प्रकाश घोड़े के समान चारों ओर भागता है. अग्नि के प्रज्वलित होने पर सभी प्राणी डर जाते हैं. (५) भद्रा ते अग्ने स्वनीक सन्दृग्घोरस्य सतो विषुणस्य चारु:. न यत्ते शोचिस्तमसा वरन्त न ध्वस्मानस्तन्वी३ रेप आ धु:.. (६) हे शोभन ज्वालाओं वाले, भयजनक एवं सर्वत्र व्याप्त अग्नि! तुम्हारी रमणीय एवं कल्याणी मूर्ति भली प्रकार दिखाई देती है. तुम्हारी दीप्ति को अंधकार नहीं रोक सकता एवं ebook converter DEMO Watermarks*
विध्वंसकारी राक्षस तुम्हारे शरीर में पाप का प्रवेश नहीं करा सकते. (६) न यस्य सातुर्जनितोरवारि न मातरापितरा नू चिदिष्टौ. अधा मित्रो न सुधितः पावकोऽ ग्निद्दीदाय मानुषीषु विक्षु.. (७) हे वर्षाकारक अग्नि! तुम्हारे पशु आदि दान को अन्य लोग नहीं रोक सकते. माता-पिता के समान धरती-आकाश भी तुम्हें प्रेरणा देने में समर्थ नहीं होते. भली प्रकार तृप्त एवं शुद्ध करने वाले अग्नि मानव प्रजाओं में मित्र के समान प्रकाशित होते हैं. (७) द्वियं पञ्च जीजन्त्संवसानाः स्वसारो अग्निं मानुषीषु विक्षु. उषर्बुधमथर्यो३ न दन्तं शुक्रं स्वासं परशुं न तिग्मम्.. (८) स्त्रियों के समान परस्पर मिली हुई मनुष्यों की दस उंगलियां मंथन द्वारा प्रातःकाल जागने वाले, हव्य-भक्षणकर्त्ता, किरणों द्वारा दीप्त, सुंदर मुख वाले एवं तेज परशु के समान राक्षसहननकर्त्ता अग्नि को उत्पन्न करती हैं. (८) तव त्ये अग्ने हरितो घृतस्ना रोहितास ऋज्वञ्चः स्वञ्चः. अरुषासो वृषण ऋजुमुष्का आ देवतातिमह्वन्त दस्माः.. (९) हे अग्नि! नाक के नथुनों से फेन गिराने वाले, लाल रंग वाले, सीधे चलने वाले, दीप्तिशाली, कामवर्षी, साधनयुक्त एवं सुंदर घोड़े ऋत्विजों द्वारा हमारे यज्ञ की ओर बुलाए जाते हैं. (९) ये ह त्ये ते सहमाना अयासस्त्वेषासो अग्ने अर्चयश्चरन्ति. श्येनासो न दुवसनासो अर्थं तुविष्वणसो मारुतं न शर्धः.. (१०) हे अग्नि! तुम्हारी शत्रुओं को पराजित करने वाली, गमनशील, दीप्त व सेवा करने योग्य किरणें घोड़ों के समान अपने गंतव्य स्थान पर जाती हैं एवं मरुतों के समान अधिक आवाज करती हैं. (१०) अकारि ब्रह्म समिधान तुभ्यं शंसात्युक्थं यजते व्यू धाः. होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्नमस्यन्त उशिजः शंसमायोः.. (११) हे प्रज्वलित अग्नि! तुम्हारे लिए हमने स्तोत्र बनाया है. उसी को होतागण बोलते हैं. यजमान तुम्हारे निमित्त यज्ञ करते हैं. इसलिए तुम हमें धन दो. ऋत्विज् मानवों द्वारा प्रशंसनीय व देवों को बुलाने वाले अग्नि की पूजा करने के लिए हम धन की कामना से बैठे हैं. (११) सूक्त-७ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः. यमप्रवानो भृगवी विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे.. (१) आप्रवान् एवं अन्य भृगुवंशी ऋषियों ने वनों में दावाग्निरूप से दर्शनीय एवं समस्त प्रजाओं के स्वामी अग्नि को प्रज्वलित किया था. वे ही देवों को बुलाने वाले, अतिशय यज्ञकर्त्ता, यज्ञों में ऋत्विजों द्वारा स्तुत्य एवं देवों में सर्वश्रेष्ठ अग्नि यज्ञकर्त्ताओं द्वारा स्थापित किए गए हैं. (१) अग्ने कदा त आनुषग्भुवद्देवस्य चेतनम्. अधा हि त्वा जगृभिरे मर्तासो विश्वीड्यम्.. (२) हे द्योतमान एवं मानवों द्वारा पूज्य अग्नि! तुम्हारा तेज कब गतिशील होगा? मनुष्य तुम्हें ग्रहण करते हैं. (२) ऋतावानं विचेतसं पश्यन्तो द्यामिव स्तृभिः. विश्वेषामध्वराणां हस्कर्तारं दमेदमे.. (३) मायारहित, विशिष्ट-ज्ञान वाले, तारों से भरे हुए आकाश के समान चिनगारियों से युक्त एवं समस्त यज्ञों की वृद्धि करने वाले अग्नि को देखते हुए ऋत्विजों ने उन्हें प्रत्येक यज्ञशाला में ग्रहण किया. (३) आशुं दूतं विवस्वतो विश्वा यश्चर्षणीरभि. आ जभ्रुः केतुमायवो भृगवाणं विशेविशे.. (४) मनुष्य समस्त प्रजाओं को पराजित करने वाले, तीव्रगति, यजमान के दूत, झंडे के समान ज्ञान कराने वाले एवं दीप्तिमान् अग्नि को सभी प्रजाओं के कल्याण के लिए लाते हैं. (४) तमीं होतारमानुषक्चिकित्वां सं नि षेदिरे. रण्वं पावकशोचिषं यजिष्ठं सप्त धामभिः.. (५) ऋत्विज् आदि मानवों ने प्रसिद्ध, क्रमशः देवों को बुलाने वाले, ज्ञानसंपन्न, रमणीय, पवित्र प्रकाश वाले, श्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता एवं सात तेजों से युक्त अग्नि को स्थापित किया था. (५) तं शश्वतीषु मातृषु वन आ वीतमश्रितम्. चित्रं सन्तं गुहा हितं सुवेदं कूचिदर्थिनम्.. (६) माता के समान जलसमूह में एवं वृक्षों में वर्तमान, सुंदर, जलने के डर से प्राणियों द्वारा असेवित, विचित्र, गुहा में छिपे हुए, शोभन धनयुक्त एवं सभी जगह हव्य की अभिलाषा करने वाले अग्नि को ऋत्विजों ने स्थापित किया था. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
ससस्य यद्वियुता सस्मिन्नूधन्नृतस्य धामन्रणयन्त देवाः. महाँ अग्निर् नमसा रातहव्यो वेरध्वराय सदमिदृतावा.. (७) देवगण प्रातःकाल नींद त्याग कर जल के कारणभूत यज्ञ में अग्नि को प्रसन्न करते हैं. महान्, नमस्कारपूर्वक हव्य दिए गए एवं सत्ययुक्त अग्नि सदा ही यजमानों के यज्ञों को जानें. (७) वेरध्वरस्य दूत्यानि विद्वानुभे अन्ता रोदसी सञ्चिकित्वान्. दूत ईयसे प्रदिव उराणो विदुष्टरो दिव आरोधनानि.. (८) हे विद्वान् यज्ञ के दूत, कार्यों को जानने वाले, धरती और आकाश के मध्य भाग से भली-भांति परिचित, पुरातन, थोड़े हव्य को अधिक करने में समर्थ, अतिशय विद्वान् एव देवों के दूत अग्नि! तुम देवों को हवि देने के लिए स्वर्ग की सीढ़ियों पर चढ़ते हो. (८) कृष्णं त एम रुशतः पुरो भाश्श्वरिष्व१ञ्चिर्वपुषामिदेकम्. यदप्रवीता दधते ह गर्भं सद्यश्चिज्जातो भवसीदु दूतः.. (९) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम्हारा गमन मार्ग काला है, तुम्हारे आगे-आगे चलता है एवं तुम्हारा गतिशील तेज रूपशालियों में सर्वोत्तम है. यजमान तुम्हें न पाकर तुम्हारी उत्पत्ति में कारण काष्ठ को रखते हैं. इसके बाद तुम शीघ्र उत्पन्न होकर यजमान के दूत बनते हो. (९) सद्यो जातस्य ददृशानमोजो यदस्य वातो अनुवाति शोचिः. वृणक्ति तिग्मामतसेषु जिह्वां स्थिरा चिदन्ना दयते वि जम्भैः.. (१०) अरणिमंथन के पश्चात् उत्पन्न अग्नि का तेज ऋत्विजों को दिखाई देता है. जब अग्नि की लपटों को लक्ष्य करके हवा चलती है तो अग्नि अपनी ज्वाला को वृक्षों से मिला देते हैं एवं स्थिर काष्ठों को अपने तेज से जला देते हैं. (१०) तृषु यदन्ना तृषुणा ववक्ष तृषं दूतं कृणुते यह्वो अग्निः. वातस्य मेळिं सचते निजूर्वन्नाशुं न वाजयते हिन्वे अर्वा.. (११) अग्नि अपनी लपटों द्वारा लकड़ियों को शीघ्र ही जला देते हैं. महान् अग्नि स्वयं को तेज चलने वाला दूत बनाते हैं एवं लकड़ियों को विशेष रूप से जलाते हुए वायु की शक्ति से सहायता लेते हैं. जिस प्रकार सवार घोड़े को शक्तिशाली बनाता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी किरणों को बलयुक्त करते हैं. (११) सूक्त-८ देवता—अग्नि दूतं वो विश्ववेदसं हव्यवाहममर्त्यम्. यजिष्ठमृञ्जसे गिरा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हम स्तुति द्वारा समस्त धनों के स्वामी, देवों को हवि पहुंचाने वाले, मरणरहित, अतिशय यज्ञपात्र एवं देवदूत अग्नि को बढ़ाते हैं. (१) स हि वेदा वसुधितिं महाँ आरोधनं दिवः. स देवाँ एह वक्षति.. (२) वे महान् अग्नि यजमान के धन का दान हैं एवं स्वर्ग की सीढ़ियों को जानते हैं. वे देवों को इस यज्ञ में लावें. (२) स वेद देव आनमं देवाँ ऋतायते दमे. दाति प्रियाणि चिद्धसु.. (३) वे तेजयुक्त अग्नि यजमानों से क्रमशः देवों के प्रति नमस्कार कराना जानते हैं एवं यज्ञशाला में यजमान को प्रिय धन देते हैं. (३) स होता सेदु दूत्यं चिकित्वाँ अन्तरीयते. विद्वाँ आरोधनं दिवः.. (४) देवों का आह्वान करने वाले अग्नि दूतकर्म एवं स्वर्ग की सीढ़ियों को जानकर धरती- आकाश के मध्य में चलते हैं. (४) ते स्याम ये अग्नये ददाशुर्हव्यदातिभिः. य ईं पुष्यन्त इन्धते.. (५) जो यजमान अग्नि को हव्य देकर प्रसन्न करते हैं, बढ़ाते हैं एवं समिधाओं द्वारा प्रज्वलित करते हैं, हम उन्हीं के समान बनें. (५) ते राया ते सुवीर्यैः ससवांसो वि शृण्विरे. ये अग्ना दधिरे दुवः.. (६) जो यजमान अग्नि की सेवा करते हैं, वे अग्नि की सेवा से धन पाकर एवं प्रसिद्ध पुत्र- पौत्रादि द्वारा प्रसिद्ध बनते हैं. (६) अस्मे रायो दिवेदिवे सं चरन्तु पुरुस्पृहः. अस्मे वाजास ईरताम्.. (७) ऋत्विज् आदि द्वारा चाहा गया धन प्रतिदिन हम यजमानों के समीप आवे एवं अन्न हमें यज्ञ की प्रेरणा दे. (७) स विप्रश्चर्षणीनां शवसा मानुषाणाम्. अति क्षिप्रेव विध्यति.. (८) मेधावी अग्नि अपनी शक्ति द्वारा मानव प्रजाओं के नष्ट करने योग्य पाप सर्वथा नष्ट करते हैं. (८) सूक्त-९ देवता—अग्नि अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम्. इयेथ बर्हिरासदम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे महान् अग्नि! हम लोगों को सुखी करो एवं देवों की अभिलाषा करने वाले यजमान के पास कुश पर बैठने के लिए आओ. (१) स मानुषीषु दूळभो विक्षु प्रावीरमर्त्य:. दूतो विश्वेषां भुवत्.. (२) राक्षसों आदि द्वारा अहिंसित, मानव प्रजाओं में भली प्रकार गमन करने वाले एवं मरणरहित अग्नि सब देवों के दूत बनें. (२) स सद्म परि णीयते होता मन्द्रो दिविष्टिषु. उत पोता नि षीदति.. (३) ऋत्विजों द्वारा यज्ञशाला में लाए गए अग्नि यज्ञों में प्रशंसनीय होता बनते हैं अथवा पोता बनकर बैठते हैं. (३) उत ग्ना अग्निरध्वर उतो गृहपतिर्दमे. उत ब्रह्मा नि षीदति.. (४) वे अग्नि यज्ञ में देवपत्नी, अध्वर्यु, गृहपति अथवा ब्रह्मा बनकर बैठते हैं. (४) वेषि ह्यध्वरीयतामुपवक्ता जनानाम्. हव्या च मानुषाणाम्.. (५) हे अग्नि! तुम यज्ञ करने के इच्छुक लोगों का हव्य चाहते हो एवं यज्ञकर्म के उपवक्ता हो. (५) वेषीद्ध्यस्य दूत्यं१ यस्य जुजोषो अध्वरम्. हव्यं मर्तस्य वोळ्हवे.. (६) हे अग्नि! तुम जिस यजमान के यज्ञ में हव्य वहन करने का काम स्वीकार कर लेते हो, उसका दूतकर्म करने की भी अभिलाषा करते हो. (६) अस्माकं जोष्यध्वरमस्माकं यज्ञमङ्गिर:. अस्माकं शृणुधी हवम्.. (७) हे अंगिरा अग्नि! तुम हमारे यज्ञ की सेवा करो, हमारे हवि को स्वीकार करो तथा हमारे स्तोत्र को सुनो. (७) परि ते दूळभो रथोऽस्माँ अश्रोतु विश्वतः. येन रक्षसि दाशुषः.. (८) हे अग्नि! तुम जिस रथ की सहायता से सभी दिशाओं में जाकर हव्य देने वाले यजमान की रक्षा करते हो, तुम्हारा वही दुर्लभ रथ मेरे चारों ओर रहे. (८) सूक्त-१० देवता—अग्नि अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्. ऋध्यामा त ओहैः.. (१) हे अग्नि! हम ऋत्विज् इंद्र आदि देवों को प्राप्त करने वाली स्तुतियों द्वारा अश्व के ebook converter DEMO Watermarks*
समान ढोने वाले, यज्ञकर्त्ता के समान उपकारक, भद्र एवं प्रिय तुमको बढ़ाते हैं. (१) अधा ह्याग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः. रथीर्ऋतस्य बृहतो बभूथ.. (२) हे अग्नि! तुम इसी समय हमारे भद्र, बढ़े हुए, मनचाहे फल देने वाले, सत्य एवं महान् यज्ञ के नेता हो. (२) एभिर्नो अर्कैर्भवा नो अर्वाङ्स्व१र्ण ज्योतिः. अग्ने विश्वेभिः सुमना अनीकैः.. (३) हे सूर्य के समान तेजस्वी तथा समस्त तेजयुक्त व शोभन गमन वाले अग्नि! तुम हमारे इन पूजनीय स्तोत्रों द्वारा हमारे सामने आओ. (३) आभिष्टे अद्य गीर्भिर्गृणन्तोऽग्ने दाशेम. प्र ते दिवो न स्तनयन्ति शुष्माः.. (४) हे अग्नि! हम आज इन स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करते हुए तुम्हें हवि देंगे. तुम्हारी शुद्ध करने वाली ज्वालाएं सूर्य की किरणों के समान शब्द करती हैं. (४) तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिरिदा चिदह्न इदा चिदक्तोः. श्रिये रुक्मो न रोचत उपाके.. (५) हे अग्नि! तुम्हारा प्रियतम प्रकाश रात-दिन अलंकार के समान पदार्थों के समीप आकर शोभा पाता है. (५) घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यम्. तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः.. (६) हे अन्न के स्वामी अग्नि! तुम्हारा शरीर शुद्ध घृत के समान पापरहित है. तुम्हारा शुद्ध एवं रमणीय तेज अलंकार के समान चमकता है. (६) कृतं चिद्धि ष्मा सनेमि द्वेषोऽग्न इनोषि मर्तात्. इत्था यजमानादृतावः.. (७) हे सत्ययुक्त अग्नि! यजमानों द्वारा उत्पन्न होने पर भी चिरंतन तुम निश्चय ही यजमान के पापों को नष्ट करते हो. (७) शिवा नः सख्या सन्तु भ्रात्राग्ने देवेषु युष्मे. सा नो नाभिः सदने सस्मिन्नूधन्.. (८) हे द्योतमान अग्नि! तुम्हारे प्रति हमारी मित्रता एवं बंधुत्व भाव कल्याणकारी हो. यह भावना देवस्थानों एवं समस्त यज्ञों में हमारा आधार हो. (८) सूक्त-११ देवता—अग्नि भद्रं ते अग्ने सहसिन्ननीकमुपाक आ रोचते सूर्यस्य. रुशद्दृशे ददृशे नक्तया चिदरूक्षितं दृश आ रूपे अन्नम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारा प्रिय तेज दिन के समय चारों ओर प्रकाशित होता है. तुम्हारा प्रकाशयुक्त एवं दर्शनीय तेज रात में भी दिखाई देता है. हे रूपवान् अग्नि! ऋत्विज् आदि तुम में चिकना एवं सुंदर अन्न डालते हैं. (१) वि षाह्यग्ने गृणते मनीषां खं वेपसा तुविजात स्तवानः. विश्वेभिर्यद्द्वावनः शुक्र देवैस्तन्नो रास्व सुमहो भूरि मन्म.. (२) हे अनेक बार जन्म लेने वाले एवं ऋत्विजों द्वारा स्तुत अग्नि! यज्ञकर्म के द्वारा स्तुति करने वाले यजमान के लिए तुम पुण्यलोक के द्वार खोलो. हे दीप्यमान एवं शोभन तेज वाले अग्नि! देवों के साथ मिलकर तुम यजमान को जो धन देते हो, वही अधिक एवं उत्तम धन हमें दो. (२) त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि. त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्याधिये दाशुषे मर्त्याय.. (३) हे अग्नि! हव्यवहन और देवों को बुलाने का काम, स्तुतिरूपी वचन एवं पूजा करने योग्य उक्थ तुम ही से उत्पन्न होते हैं. सत्यकर्म वाले एवं हव्य दान करने वाले यजमान के लिए विक्रांत रूप एवं धन तुमसे ही निकलता है. (३) त्वद्वाजी वाजम्भरो विहाया अभिष्टिकृज्जायते सत्यशुष्मः. त्वद्रयिर्देवजूतो मयोभुस्त्वदाशुर्जूर्जुवाँ अग्ने अर्वा.. (४) हे अग्नि! तुमसे बलवान्, हव्य अन्न वहन करने वाला, महान् यज्ञकर्त्ता एवं सच्ची शक्ति से युक्त पुत्र उत्पन्न होता है. देवों द्वारा प्रेरित एवं सुख देने वाला धन एवं शीघ्रगामी तथा वेगशाली अश्व भी तुम्हीं से उत्पन्न होता है. (४) त्वामग्ने प्रथमं देवयन्तो देवं मर्त अमृत मन्द्रजिह्वम्. द्वेषोयुतमा विवासन्ति धीभिर्द्मूनसं गृहपतिममूरम्.. (५) हे मरणरहित देवों में प्रथम, प्रकाशयुक्त, देवों को प्रसन्न करने वाली जिह्वा वाले, पाप दूर करने वाले, राक्षसदमनकारी मन से युक्त, गृहपति एवं प्रगल्भ अग्नि! देवों की कामना करने वाले यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारी भली प्रकार सेवा करते हैं. (५) आरे अस्मदमतिमारे अंह आरे विश्वां दुर्मतिं यन्निपासि. दोषा शिवः सहसः सूनो अग्ने यं देव आ चित्सचसे स्वस्ति.. (६) हे बलपुत्र, रात्रि में कल्याणकारी एवं द्योतमान अग्नि! तुम कल्याण करने के लिए हमारी सेवा करते हो. तुम अमति, पाप और दुर्मति को हमारे पास से दूर करो. (६) सूक्त—१२ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*
यस्त्वामग्न इन्धते यतस्रुक्तिरस्ते अन्नं कृणवत्समिन्नहन्. स सु द्युम्नैरभ्यस्तु प्रसक्तव क्रत्वा जातवेदश्चिकित्वान्.. (१) हे अग्नि! जो यजमान स्रुच उठाकर तुम्हें प्रज्वलित करता है एवं दिन में तीन बार तुम्हें हव्य अन्न देता है, हे जातवेद! वह तुम्हें संतुष्ट करने वाले ईंधन आदि से बढ़ते हुए तुम्हारे तेज को जानता हुआ धन द्वारा शत्रुओं को पूरी तरह हरावे. (१) इध्मं यस्ते जभरच्छश्रमाणो महो अग्ने अनीकमा सपर्यन्. स इधानः प्रति दोषामुषासं पुष्यन्रयिं सचते घ्नन्नमित्रान्.. (२) हे महान् अग्नि! जो व्यक्ति तुम्हारे लिए ईंधन लाता है तथा लकड़ी ढोने से थककर महान् तेज की सेवा करता हुआ रात और दिन के समय तुम्हें प्रज्वलित करता है, वह संतान एवं पशुओं से पुष्ट होकर शत्रुओं का नाश करता हुआ धन प्राप्त करता है. (२) अग्निरीशे बृहतः क्षत्रियस्याग्निर्वाजस्य परमस्य रायः. दधाति रत्नं विधते यविष्ठो व्यानुषङ्मर्त्याय स्वधावान्.. (३) अग्नि महान् बल, उत्कृष्ट अन्न एवं पशु आदि धन के स्वामी हैं. अतिशय युवा एवं अन्नयुक्त अग्नि अपनी सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन देते हैं. (३) यच्चिद्धि ते पुरुषत्रा यविष्ठाचित्तिभिश्चकृमा कच्चिदागः. कृधी ष्व१स्माँ अदितेरनागान्व्येनांसि शिश्रथो विष्वगग्ने.. (४) हे अतिशय युवा अग्नि! यद्यपि हम अज्ञान के कारण तुम्हारी सेवा करने वालों के प्रति कुछ पाप करते हैं, फिर भी तुम हमें धरती पर पापरहित बनाओ. चारों ओर फैले हुए हमारे पापों को ढीला करो. (४) महश्चिदग्न एनसो अभीक ऊर्वद्देवानामुत मर्त्यानाम्. मा ते सखायः सदमिद्रिषाम यच्छा तोकाय तनयाय शं योः.. (५) हे अग्नि! तुम्हारे सखारूप हमने देवों अथवा मनुष्यों के प्रति जो महान् एवं विस्तृत पाप किया है, उससे हम कभी पीड़ित न हों. तुम हमारे पुत्रों और पौत्रों के लिए शांति एवं सुख दो. (५) यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः. एवो ष्व१स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः.. (६) हे पूजा के योग्य एवं निवास देने वाले अग्नि! जिस प्रकार तुमने बंधे हुए पैरों वाली गौरी नामक गाय को छुड़ाया था, उसी प्रकार हमें पाप से छुड़ा लो. हे अग्नि! अपने द्वारा बढ़ाई हुई हमारी आयु को और अधिक बढ़ाओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३ देवता—अग्नि
सूक्त—१३ देवता—अग्नि प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यद्विभातीनां सुमना रत्नधेयम्. यातमश्विना सुकृतो दुरोणमुत्सूर्यो ज्योतिषा देव एति.. (१) शोभन मन वाले अग्नि अंधकार-विनाशिनी उषा का मनोहर प्रकाश फैलने के समय से पहले ही बढ़ने लगते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमान के घर जाओ. सूर्य देव प्रकाश के साथ आ रहे हैं. (१) ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्दृप्सं दविध्वद्गविषो न सत्वा. अनु व्रतं वरुणो यन्ति मित्रो यत्सूर्यं दिव्यारोहयन्ति.. (२) सविता देव ऊपर जाने वाली किरणों का सहारा लेते हैं. किरणें जब सूर्य को आकाश पर चढ़ाती हैं, तब वरुण, मित्र एवं अन्य देव अपने कर्म इस प्रकार प्रारंभ करते हैं, जैसे धूल उड़ाता हुआ बैल गायों के पीछे चलता है. (२) यं सीमकृण्वन्तमसे विपूचे ध्रुवक्षेमा अनवस्यन्तो अर्थम्. तं सूर्यं हरितः सप्त यह्वीः स्पशं विश्वस्य जगतो वहन्ति.. (३) सृष्टि करने वाले देवों ने संसार का कार्य न त्याग कर अंधकार को सभी प्रकार से दूर करने के निमित्त जिस सूर्य को बनाया, हरि नामक सात महान् घोड़े समस्त प्राणियों को जानने वाले उस सूर्य को ढोते हैं. (३) वहिष्ठेभिर्विहरन्यासि तन्तुमवव्ययन्नसितं देव वस्म. दविध्वतो रश्मयः सूर्यस्य चर्मेवावाधुस्तमो अप्स्व१न्तः.. (४) हे सूर्य देव! तुम विश्व का निर्वाह करने वाला रस ग्रहण करने के लिए अपनी किरणें फैलाते हुए एवं काले रंग की रात को नष्ट करते हुए अपने अत्यंत वेगवान् घोड़ों के सहारे चलते हो. सूर्य की कांपती हुई किरणें आकाश के मध्य चमड़े के समान फैले हुए अंधकार को नष्ट करती हैं. (४) अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न. कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्.. (५) पास में रहने वाले, बंधनरहित एवं अधोमुख सूर्य को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता. ऊर्ध्वमुख सूर्य किस शक्ति से चलते हैं? आकाश में खंभे के समान सूर्य स्वर्ग का पालन करते हैं, इसे किसने देखा है? (५) सूक्त—१४ देवता—अग्नि आदि
प्रत्यग्निरुषसो जातवेदा अख्यद्देवो रोचमाना महोभिः. आ नासत्योरुगाया रथेनेमं यज्ञमुप नो यातमच्छ.. (१) जातवेद अग्नि देव तेजों से दीप्त उषा को लक्ष्य करके बढ़ते हैं. हे परम गतिशील अश्विनीकुमारो! तुम रथ द्वारा हमारे यज्ञ के सामने आओ. (१) ऊर्ध्वं केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्. आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चिकितानः.. (२) सारे संसार के लिए प्रकाश देते हुए सविता देव ऊर्ध्वमुखी किरणों का सहारा लेते हैं. सूर्य ने सबको विशेष रूप से देखते हुए किरणों से धरती, आकाश और अंतरिक्ष को प्राप्त किया है. (२) आवहन्त्यरुणीर्ज्योतिषागान्माही चित्रा रश्मिभिश्चेकिताना. प्रबोधयन्ती सुविताय देव्यु१षा ईयते सुयुजा रथेन.. (३) धनों को धारण करने वाली, लाल रंग युक्त, तेजधारिणी, महान्, किरणों के कारण रंग- बिरंगी एवं जानने वाली उषा आई थीं. उषादेवी सोए हुए प्राणियों को जगाती हुई भली प्रकार जोते गए रथ द्वारा सुख पाने के लिए आती हैं. (३) आ वां वहिष्ठा इह ते वहन्तु रथा अश्वास उषसो व्युष्टौ. इमे हि वां मधुपैयाय सोमा अस्मिन्यज्ञे वृषणा मादयेथाम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! उषाकाल होने पर अधिक बोझा ढोने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें इस यज्ञ में सब ओर से लावें. हे कामवर्षियो! यह सोमरस तुम्हारे पीने के लिए है. यज्ञ में सोमपान से प्रसन्न बनो. (४) अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न. कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्.. (५) पास में रहने वाले, बंधनरहित एवं ऊर्ध्वमुख-सूर्य को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता. ऊर्ध्वमुख-सूर्य किस शक्ति से चलते हैं? आकाश के खंभे के समान सूर्य स्वर्ग का पालन करते हैं, इसे किसने देखा है? (५) सूक्त—१५ देवता—अग्नि, सोम आदि अग्निहोता नो अध्वरे वाजी सन्परि णीयते. देवो देवेषु यज्ञियः.. (१) देवों को बुलाने वाले, इंद्रादि देवों के मध्य तेजस्वी एवं यज्ञ के योग्य अग्नि शीघ्रगामी अश्व के समान हमारे यज्ञ में चारों ओर से लाए जाते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव. आ देवेषु प्रयो दधत्.. (२) यजमानों द्वारा इंद्रादि देवों को दिया गया हव्य धारण करते हुए अग्नि दिन में तीन बार रथ में बैठे पुरुष के समान चारों ओर से यज्ञ में जाते हैं. (२) परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्. दधद्रत्नानि दाशुषे.. (३) अन्नों का पालन करने वाले एवं मेधावी अग्नि हव्य देने वाले यजमान के लिए रमणीय धन देते हुए हव्यों को चारों ओर से घेरते हैं. (३) अयं यः सृञ्जये पुरो दैववाते समिध्यते. द्युमाँ अमित्रदम्भनः.. (४) जो अग्नि देव वात के पुत्र सृजव के लिए पूर्व दिशा में प्रज्वलित होते हैं, वे शत्रुनाशक अग्नि दीप्ति धारण करते हैं. (४) अस्य घा वीर ईवतोऽग्नेरीशीत मर्त्यः. तिग्मजम्भस्य मीळहुषः.. (५) स्तुति करने में कुशल मनुष्य तीखे तेज वाले, अभिलषित फल देने वाले एवं गतिशील- अग्नि को वश में कर लें. (५) तमर्वन्तं न सानसिमरुषं न दिवः शिशुम्. मर्मृज्यन्ते दिवेदिवे.. (६) यजमान घोड़े के समान हव्य ढोने में समर्थ व आकाश के पुत्र सूर्य के समान तेजस्वी अग्नि की प्रतिदिन सेवा करें. (६) बोधन्मन्मा हरिभ्यां कुमारः साहदेव्यः. अच्छा न हूत उदरम्.. (७) राजा सहदेव के पुत्र कुमार ने जब हमसे दोनों घोड़ों को देने की बात कही थी, तब हम उन्हें ले आए थे. (७) उत त्या यजता हरी कुमारात्साहदेव्यात्. प्रयता सद्य आ ददे.. (८) सहदेव के पुत्र कुमार से हमने पूजनीय एवं गतिशील घोड़ों को उसी दिन ले लिया था. (८) एष वां देवावश्विना कुमारः साहदेव्यः दीर्घायुरस्तु सोमकः.. (९) हे तेजस्वी अश्विनीकुमारो! तुम्हें तृप्त करने वाला सहदेव का पुत्र कुमार सोमक राजा अधिक अवस्था वाला हो. (९) तं युवं देवावश्विना कुमारं साहदेव्यम्. दीर्घायुषं कृणोतन.. (१०) हे तेजस्वी अश्विनीकुमारो! तुम सहदेव के पुत्र कुमार को दीर्घ आयु वाला बनाओ. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१६ देवता—इंद्र
सूक्त—१६ देवता—इंद्र आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः. तस्मा इदन्धः सुषुमा सुदुक्षमिहाभिपित्वं करते गृणानः.. (१) सोम एवं सत्य को धारण करने वाले इंद्र हमारे पास आवें. उनके घोड़े हमारी ओर दौड़ें. हम यजमान उन इंद्र के लिए इस यज्ञ में सारयुक्त सोम निचोड़ रहे हैं. हमारे द्वारा स्तुत इंद्र हमारी इच्छा पूरी करें. (१) अव स्य शूराध्वनो नान्तेऽस्मिन्नो अद्य सवने मन्दध्यै. शंसात्युक्थमुशनेव वेधाश्चिकितुषे असुर्याय मन्म.. (२) हे शूर इंद्र! जैसे मार्ग समाप्त होने पर लोग घोड़े को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार माध्यंदिन सवन के समय तुम हमें छुटकारा दे दो, जिससे हम तुम्हें प्रसन्न कर सकें. हे सर्वज्ञ एवं असुरविनाशक इंद्र! हम यजमान उशना के समान तुम्हारे प्रति सुंदर स्तुति बोलते हैं. (२) कविर्न निण्यं विदथानि साधन्व्दृषा यत्सेकं विपिपानो अर्चात्. दिव इत्था जीजनत्सप्त कारूनह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः.. (३) कवि के समान गूढ़ कार्यों का साधन करते हुए कामवर्षी इंद्र जब सोमरस को अधिक मात्रा में पीकर उसके प्रति आदर प्रकट करते हैं, तब स्वर्ग से सात किरणें वास्तव में उत्पन्न करते हैं. स्तुति की जाती हुई सूर्यकिरणें दिन में भी मनुष्यों को ज्ञान कराती हैं. (३) स्वर् यद्देदि सुदृशीकमर्कैर्महि ज्योती रुरुचुर्यद्ध वस्तोः. अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ.. (४) जब महान् एवं तेजरूप स्वर्ग किरणों से भली प्रकार दिखाई देने लगता है, तब देवगण उस स्वर्ग में रहने के लिए दीप्तियुक्त होते हैं. उत्तम नेता सूर्य ने आकर मनुष्यों के ठीक से देखने के लिए घने अंधकारों को नष्ट कर दिया है. (४) ववक्ष इन्द्रो अमितमृजीष्य्१ भे आ पप्रौ रोदसी महित्वा. अतश्चिदस्य महिमा वि रेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव.. (५) सोम वाले इंद्र असीमित महिमा धारण करते हैं एवं अपनी महिमा से धरती-आकाश को भर देते हैं. इंद्र ने सारे संसार को पराजित कर दिया है, इसलिए इनकी महिमा सबसे अधिक है. (५) विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः. अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
समस्त मानव-हितकारी कार्यों को जानते हुए इंद्र ने अभिलाषापूर्ण एवं मित्ररूप मरुतों की सहायता से जल बरसाया था. जिन मरुतों ने अपने शब्द से पर्वत को भेद दिया था, उन्होंने इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गोशाला को ढक दिया था. (६) अपो वृत्रं वव्रिवांसं पराहन्प्रावत्ते वज्रं पृथिवी सचेताः. प्राणसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो.. (७) हे इंद्र! अधिक मात्रा में लोगों का पालन करने वाले तुम्हारे वज्र ने जल को रोकने वाले मेघ को प्रेरणा दी थी एवं चेतना वाली धरती तुमसे मिली थी. हे शूर एवं पराभवकारी इंद्र! तुम बल के कारण लोकपालक बनकर सागर एवं आकाश के जल को प्रेरणा दो. (७) अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत्सरमा पूर्व्यं ते. स नो नेता वाजमा दर्षि भूरिं गोत्रा रुजन्नङ्गिरोभिर्गृणानः.. (८) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! जब तुमने वर्षा के जल के उद्देश्य से मेघ को विदीर्ण किया था, उससे पहले ही सरमा ने तुम्हें पणियों द्वारा चुराई गई गाएं बता दी थीं. अंगिरागोत्रीय ऋषियों द्वारा स्तुत होकर मेघों को विदीर्ण करते हुए तुमने हमको बहुत सा अन्न दिया एवं हमारा आदर किया. (८) अच्छा कविं नृमणो गा अभिष्टौ स्वर्षाता मघवन्नाधमानम्. ऊतिभिस्तमिषणो द्युम्नहूतौ नि मायावान्ब्रह्मा दस्युरर्त.. (९) हे धन के स्वामी एवं मनुष्यों द्वारा मान्य इंद्र! तुम कुत्स ऋषि के समीप धन देने की अभिलाषा से गए. कुत्स ने तुमसे प्रार्थना की कि उसके शत्रु से युद्ध करो. तुमने उसे शत्रु के आक्रमण से बचाया एवं कपटी तथा वेदोक्त कर्म से हीन जानकर तुमने कुत्स के शत्रु को युद्ध में मारा. (९) आ दस्युघ्ना मनसा याह्यस्तं भुवत्ते कुत्सः सख्ये निकामः. स्वे योनौ नि षदतं सरूपा वि वां चिकित्सद्ऋतचिद्ध नारी.. (१०) हे इंद्र! शत्रुओं को नष्ट करने की भावना से तुम कुत्स के घर गए. कुत्स ने तुम्हारी मित्रता पाने की अतिशय अभिलाषा की. इसके बाद तुम दोनों इंद्र-भवन में बैठे. सत्यदर्शिनी तुम्हारी पत्नी शची तुम दोनों का समान रूप देखकर संशय में पड़ गई. (१०) यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हर्योरीशानः. ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषन्कविर्यदहन्पार्याय भूषात्.. (११) हे इंद्र! बुद्धिमान् कुत्स ग्रहण करने योग्य अन्न के समान सरलगति घोड़ों को अपने रथ में जोड़कर जिस दिन आपत्तियों से पार हुआ, हे शत्रुनाशक एवं वायु सदृश वेगशाली अश्वों के स्वामी इंद्र! उस दिन तुम कुत्स की रक्षा की इच्छा करते हुए उसके साथ एक रथ में गए थे. ebook converter DEMO Watermarks*
(११) कुत्साय शुष्णमशुषं नि बर्हीः प्रपित्ये अह्नः कुयवं सहस्रा. सद्यो दस्यून्प्र मृण कुत्स्येन प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीके.. (१२) हे इंद्र! तुमने कुत्स के निमित्त दुःखदाता शुष्ण असुर को मारा. दिवस के पूर्व भाग में तुमने कुयव असुर को मारने के साथ ही हजारों राक्षसों का अपने वज्र से नाश किया एवं संग्राम में सूर्य का चक्र नामक आयुध तोड़ डाला. (१२) त्वं पिप्रुं मृगयं शूशुवांसमृजिश्वने वैदथिनाय रन्धीः. पञ्चाशत्कृष्णा नि वपः सहसात्कं न पुरो जरिमा वि दर्दः.. (१३) हे इंद्र! तुमने पिप्रु एवं उन्नतिप्राप्त मृगय असुर को मारा था. विदीथ के पुत्र ऋजिश्व को तुमने कैद किया एवं काले रंग वाले पचास हजार राक्षसों को मारा. बुढ़ापा जिस प्रकार सौंदर्य को नष्ट करता है, उसी प्रकार तुमने शंबर राक्षस के नगरों को विदीर्ण किया. (१३) सूर उपाके तन्वं१ दधानो वि यत्ते चेत्यमृतस्य वर्षः. मृगो न हस्ती तविषीमुषाणः सिंहो न भीम आयुधानि बिभ्रत्.. (१४) हे मरणरहित इंद्र! जब तुम सूर्य के समीप शरीर धारण करते हो, तब तुम्हारा रूप सुशोभित होता है. तुम हाथी के समान शत्रुओं की सेना जलाते हुए आयुध धारण करते हो एवं शेर के समान भयंकर हो. (१४) इन्द्रं कामा वसूयन्तो अगन्न्त्स्वर्मीळ्हे न सवने चकानाः. श्रवस्यवः शशमानास उक्थैरोको न रण्वा सुदृशीव पुष्टिः.. (१५) इंद्र की कामना एवं धन की अभिलाषा करने वाले, युद्ध के समान यज्ञ में इंद्र से याचना करने वाले, अन्न के इच्छुक एवं स्तोत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति करते हुए यजमान इंद्र के समीप जाते हैं. उस समय इंद्र निवासस्थान के समान सुंदर एवं लक्ष्मी के समान रमणीय होते हैं. (१५) तमिद्व इन्द्रं सुहवं हुवेम यस्ता चकार नर्या पुरूणि. यो मावते जरित्रे गध्यं चिन्मक्षू वाजं भरति स्पार्हराधाः.. (१६) हे यजमानो! तुम हमारे कल्याण के निमित्त मानव हितकारी प्रसिद्ध कर्म करने वाले, चाहने योग्य धन के स्वामी एवं मेरे समान स्तोता को शीघ्र संग्रह योग्य अन्न देने वाले इंद्र का सुंदर आह्वान करते हो. (१६) तिग्मा यदन्तरशनिः पताति कस्मिञ्चिच्छूर मुहुके जनानाम्. घोरा यदर्य समृतिर्भवात्यध स्मा नस्तन्वो बोधि गोपाः.. (१७)
हे शूर इंद्र! मनुष्यों के किसी युद्ध में यदि हमारे मध्य तेज वज्र गिरे अथवा हे स्वामी! हमारा शत्रुओं के साथ भयानक युद्ध हो रहा हो, उस समय तुम हमारे शरीर के रक्षक बनना. (१७) भुवोऽविता वामदेवस्य धीनां भुवः सखावृतको वाजसातौ. त्वामनु प्रमतिमा जगन्मोरुशंसो जरित्रे विश्वध स्याः.. (१८) हे इंद्र! वामदेव के यज्ञ के रक्षक बनो. हे हिंसारहित! युद्ध में मेरे मित्र बनो. हे बुद्धिमान्! हम तुम्हारी ओर आते हैं. तुम स्तुतिकर्त्ताओं की सदा प्रशंसा करो. (१८) एभिर्नृभिरिन्द्र त्वायुभिष्ट्वा मधवद्भिर्मघवन्विश्व आजौ. द्यावो न द्युम्नैरभि सन्तो अर्यः क्षपो मदेम शरदश्च पूर्वीः.. (१९) हे धन के स्वामी इंद्र! हम सभी युद्धों में धन से पूर्ण हो. द्युलोक के समान ओज से युक्त अपने सहायक मरुतों के साथ मिलकर आप शत्रुओं को हरावें. हम कई सालों तक रात्रि- दिवस आपको प्रमुदित करते रहें. (१९) एवेदिन्द्राय वृषभाय वृष्णे ब्रह्माकर्म भृगवो न रथम्. नू चिद्द्यथा नः सख्या वियोषदसन्न उग्रोऽविता तनूपाः.. (२०) बढ़ई जिस प्रकार रथ बनाते हैं, उसी प्रकार हम कामवर्षी एवं नित्य तरुण इंद्र के लिए स्तोत्र की रचना करते हैं. हम ऐसा आचरण करेंगे, जिससे इंद्र के साथ हम लोगों की मैत्री बनी रहे व तेजस्वी तथा शरीरपालक इंद्र हम लोगों के रक्षक हों. (२०) नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो३ न पीपेः. अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः.. (२१) हे इंद्र! जिस प्रकार जल नदी को पूर्ण कर देता है, उसी प्रकार तुम पूर्ववर्ती ऋषियों तथा हमारी स्तुतियों को स्वीकार करके हमारी अन्नवृद्धि करो. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हमने तुम्हारे लिए नई स्तुतियां की हैं. हम रथ के स्वामी एवं तुम्हारे सेवक बनें. (२१) सूक्त—१७ देवता—इंद्र त्वं महाँ इन्द्र तुभ्यं ह क्षा अनु क्षत्रं मंहना मन्यत द्यौः. त्वं वृत्रं शवसा जघन्वान्त्सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानान्.. (१) हे महान् इंद्र! विस्तृत धरती और आकाश ने तुम्हारे बल को स्वीकार किया था. तुमने अपने बल से वृत्र को मारा एवं उसके द्वारा ग्रसित नदियों को स्वतंत्र किया. (१) तव त्विसो जनिमन्नेजत द्यौ रेजद्भूमिर्भियसा स्वस्य मन्योः. ebook converter DEMO Watermarks*