ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 703, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ें(११) कुत्साय शुष्णमशुषं नि बर्हीः प्रपित्ये अह्नः कुयवं सहस्रा. सद्यो दस्यून्प्र मृण कुत्स्येन प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीके.. (१२) हे इंद्र! तुमने कुत्स के निमित्त दुःखदाता शुष्ण असुर को मारा. दिवस के पूर्व भाग में तुमने कुयव असुर को मारने के साथ ही हजारों राक्षसों का अपने वज्र से नाश किया एवं संग्राम में सूर्य का चक्र नामक आयुध तोड़ डाला. (१२) त्वं पिप्रुं मृगयं शूशुवांसमृजिश्वने वैदथिनाय रन्धीः. पञ्चाशत्कृष्णा नि वपः सहसात्कं न पुरो जरिमा वि दर्दः.. (१३) हे इंद्र! तुमने पिप्रु एवं उन्नतिप्राप्त मृगय असुर को मारा था. विदीथ के पुत्र ऋजिश्व को तुमने कैद किया एवं काले रंग वाले पचास हजार राक्षसों को मारा. बुढ़ापा जिस प्रकार सौंदर्य को नष्ट करता है, उसी प्रकार तुमने शंबर राक्षस के नगरों को विदीर्ण किया. (१३) सूर उपाके तन्वं१ दधानो वि यत्ते चेत्यमृतस्य वर्षः. मृगो न हस्ती तविषीमुषाणः सिंहो न भीम आयुधानि बिभ्रत्.. (१४) हे मरणरहित इंद्र! जब तुम सूर्य के समीप शरीर धारण करते हो, तब तुम्हारा रूप सुशोभित होता है. तुम हाथी के समान शत्रुओं की सेना जलाते हुए आयुध धारण करते हो एवं शेर के समान भयंकर हो. (१४) इन्द्रं कामा वसूयन्तो अगन्न्त्स्वर्मीळ्हे न सवने चकानाः. श्रवस्यवः शशमानास उक्थैरोको न रण्वा सुदृशीव पुष्टिः.. (१५) इंद्र की कामना एवं धन की अभिलाषा करने वाले, युद्ध के समान यज्ञ में इंद्र से याचना करने वाले, अन्न के इच्छुक एवं स्तोत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति करते हुए यजमान इंद्र के समीप जाते हैं. उस समय इंद्र निवासस्थान के समान सुंदर एवं लक्ष्मी के समान रमणीय होते हैं. (१५) तमिद्व इन्द्रं सुहवं हुवेम यस्ता चकार नर्या पुरूणि. यो मावते जरित्रे गध्यं चिन्मक्षू वाजं भरति स्पार्हराधाः.. (१६) हे यजमानो! तुम हमारे कल्याण के निमित्त मानव हितकारी प्रसिद्ध कर्म करने वाले, चाहने योग्य धन के स्वामी एवं मेरे समान स्तोता को शीघ्र संग्रह योग्य अन्न देने वाले इंद्र का सुंदर आह्वान करते हो. (१६) तिग्मा यदन्तरशनिः पताति कस्मिञ्चिच्छूर मुहुके जनानाम्. घोरा यदर्य समृतिर्भवात्यध स्मा नस्तन्वो बोधि गोपाः.. (१७)