भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 702, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 702

समस्त मानव-हितकारी कार्यों को जानते हुए इंद्र ने अभिलाषापूर्ण एवं मित्ररूप मरुतों की सहायता से जल बरसाया था. जिन मरुतों ने अपने शब्द से पर्वत को भेद दिया था, उन्होंने इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गोशाला को ढक दिया था. (६) अपो वृत्रं वव्रिवांसं पराहन्प्रावत्ते वज्रं पृथिवी सचेताः. प्राणसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो.. (७) हे इंद्र! अधिक मात्रा में लोगों का पालन करने वाले तुम्हारे वज्र ने जल को रोकने वाले मेघ को प्रेरणा दी थी एवं चेतना वाली धरती तुमसे मिली थी. हे शूर एवं पराभवकारी इंद्र! तुम बल के कारण लोकपालक बनकर सागर एवं आकाश के जल को प्रेरणा दो. (७) अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत्सरमा पूर्व्यं ते. स नो नेता वाजमा दर्षि भूरिं गोत्रा रुजन्नङ्गिरोभिर्गृणानः.. (८) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! जब तुमने वर्षा के जल के उद्देश्य से मेघ को विदीर्ण किया था, उससे पहले ही सरमा ने तुम्हें पणियों द्वारा चुराई गई गाएं बता दी थीं. अंगिरागोत्रीय ऋषियों द्वारा स्तुत होकर मेघों को विदीर्ण करते हुए तुमने हमको बहुत सा अन्न दिया एवं हमारा आदर किया. (८) अच्छा कविं नृमणो गा अभिष्टौ स्वर्षाता मघवन्नाधमानम्. ऊतिभिस्तमिषणो द्युम्नहूतौ नि मायावान्ब्रह्मा दस्युरर्त.. (९) हे धन के स्वामी एवं मनुष्यों द्वारा मान्य इंद्र! तुम कुत्स ऋषि के समीप धन देने की अभिलाषा से गए. कुत्स ने तुमसे प्रार्थना की कि उसके शत्रु से युद्ध करो. तुमने उसे शत्रु के आक्रमण से बचाया एवं कपटी तथा वेदोक्त कर्म से हीन जानकर तुमने कुत्स के शत्रु को युद्ध में मारा. (९) आ दस्युघ्ना मनसा याह्यस्तं भुवत्ते कुत्सः सख्ये निकामः. स्वे योनौ नि षदतं सरूपा वि वां चिकित्सद्ऋतचिद्ध नारी.. (१०) हे इंद्र! शत्रुओं को नष्ट करने की भावना से तुम कुत्स के घर गए. कुत्स ने तुम्हारी मित्रता पाने की अतिशय अभिलाषा की. इसके बाद तुम दोनों इंद्र-भवन में बैठे. सत्यदर्शिनी तुम्हारी पत्नी शची तुम दोनों का समान रूप देखकर संशय में पड़ गई. (१०) यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हर्योरीशानः. ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषन्कविर्यदहन्पार्याय भूषात्.. (११) हे इंद्र! बुद्धिमान् कुत्स ग्रहण करने योग्य अन्न के समान सरलगति घोड़ों को अपने रथ में जोड़कर जिस दिन आपत्तियों से पार हुआ, हे शत्रुनाशक एवं वायु सदृश वेगशाली अश्वों के स्वामी इंद्र! उस दिन तुम कुत्स की रक्षा की इच्छा करते हुए उसके साथ एक रथ में गए थे. ebook converter DEMO Watermarks*