ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 693, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहम स्तुति द्वारा समस्त धनों के स्वामी, देवों को हवि पहुंचाने वाले, मरणरहित, अतिशय यज्ञपात्र एवं देवदूत अग्नि को बढ़ाते हैं. (१) स हि वेदा वसुधितिं महाँ आरोधनं दिवः. स देवाँ एह वक्षति.. (२) वे महान् अग्नि यजमान के धन का दान हैं एवं स्वर्ग की सीढ़ियों को जानते हैं. वे देवों को इस यज्ञ में लावें. (२) स वेद देव आनमं देवाँ ऋतायते दमे. दाति प्रियाणि चिद्धसु.. (३) वे तेजयुक्त अग्नि यजमानों से क्रमशः देवों के प्रति नमस्कार कराना जानते हैं एवं यज्ञशाला में यजमान को प्रिय धन देते हैं. (३) स होता सेदु दूत्यं चिकित्वाँ अन्तरीयते. विद्वाँ आरोधनं दिवः.. (४) देवों का आह्वान करने वाले अग्नि दूतकर्म एवं स्वर्ग की सीढ़ियों को जानकर धरती- आकाश के मध्य में चलते हैं. (४) ते स्याम ये अग्नये ददाशुर्हव्यदातिभिः. य ईं पुष्यन्त इन्धते.. (५) जो यजमान अग्नि को हव्य देकर प्रसन्न करते हैं, बढ़ाते हैं एवं समिधाओं द्वारा प्रज्वलित करते हैं, हम उन्हीं के समान बनें. (५) ते राया ते सुवीर्यैः ससवांसो वि शृण्विरे. ये अग्ना दधिरे दुवः.. (६) जो यजमान अग्नि की सेवा करते हैं, वे अग्नि की सेवा से धन पाकर एवं प्रसिद्ध पुत्र- पौत्रादि द्वारा प्रसिद्ध बनते हैं. (६) अस्मे रायो दिवेदिवे सं चरन्तु पुरुस्पृहः. अस्मे वाजास ईरताम्.. (७) ऋत्विज् आदि द्वारा चाहा गया धन प्रतिदिन हम यजमानों के समीप आवे एवं अन्न हमें यज्ञ की प्रेरणा दे. (७) स विप्रश्चर्षणीनां शवसा मानुषाणाम्. अति क्षिप्रेव विध्यति.. (८) मेधावी अग्नि अपनी शक्ति द्वारा मानव प्रजाओं के नष्ट करने योग्य पाप सर्वथा नष्ट करते हैं. (८) सूक्त-९ देवता—अग्नि अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम्. इयेथ बर्हिरासदम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*