भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 692

ससस्य यद्वियुता सस्मिन्नूधन्नृतस्य धामन्रणयन्त देवाः. महाँ अग्निर् नमसा रातहव्यो वेरध्वराय सदमिदृतावा.. (७) देवगण प्रातःकाल नींद त्याग कर जल के कारणभूत यज्ञ में अग्नि को प्रसन्न करते हैं. महान्, नमस्कारपूर्वक हव्य दिए गए एवं सत्ययुक्त अग्नि सदा ही यजमानों के यज्ञों को जानें. (७) वेरध्वरस्य दूत्यानि विद्वानुभे अन्ता रोदसी सञ्चिकित्वान्. दूत ईयसे प्रदिव उराणो विदुष्टरो दिव आरोधनानि.. (८) हे विद्वान् यज्ञ के दूत, कार्यों को जानने वाले, धरती और आकाश के मध्य भाग से भली-भांति परिचित, पुरातन, थोड़े हव्य को अधिक करने में समर्थ, अतिशय विद्वान् एव देवों के दूत अग्नि! तुम देवों को हवि देने के लिए स्वर्ग की सीढ़ियों पर चढ़ते हो. (८) कृष्णं त एम रुशतः पुरो भाश्श्वरिष्व१ञ्चिर्वपुषामिदेकम्. यदप्रवीता दधते ह गर्भं सद्यश्चिज्जातो भवसीदु दूतः.. (९) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम्हारा गमन मार्ग काला है, तुम्हारे आगे-आगे चलता है एवं तुम्हारा गतिशील तेज रूपशालियों में सर्वोत्तम है. यजमान तुम्हें न पाकर तुम्हारी उत्पत्ति में कारण काष्ठ को रखते हैं. इसके बाद तुम शीघ्र उत्पन्न होकर यजमान के दूत बनते हो. (९) सद्यो जातस्य ददृशानमोजो यदस्य वातो अनुवाति शोचिः. वृणक्ति तिग्मामतसेषु जिह्वां स्थिरा चिदन्ना दयते वि जम्भैः.. (१०) अरणिमंथन के पश्चात् उत्पन्न अग्नि का तेज ऋत्विजों को दिखाई देता है. जब अग्नि की लपटों को लक्ष्य करके हवा चलती है तो अग्नि अपनी ज्वाला को वृक्षों से मिला देते हैं एवं स्थिर काष्ठों को अपने तेज से जला देते हैं. (१०) तृषु यदन्ना तृषुणा ववक्ष तृषं दूतं कृणुते यह्वो अग्निः. वातस्य मेळिं सचते निजूर्वन्नाशुं न वाजयते हिन्वे अर्वा.. (११) अग्नि अपनी लपटों द्वारा लकड़ियों को शीघ्र ही जला देते हैं. महान् अग्नि स्वयं को तेज चलने वाला दूत बनाते हैं एवं लकड़ियों को विशेष रूप से जलाते हुए वायु की शक्ति से सहायता लेते हैं. जिस प्रकार सवार घोड़े को शक्तिशाली बनाता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी किरणों को बलयुक्त करते हैं. (११) सूक्त-८ देवता—अग्नि दूतं वो विश्ववेदसं हव्यवाहममर्त्यम्. यजिष्ठमृञ्जसे गिरा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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