भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 686, कुल 1855 में से

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तुम्हारी प्रेरणा से अन्न प्राप्त करें. हे सत्य को विस्तृत करने वाले एवं पापनाशक अग्नि! हमारे दूर एवं समीपवर्ती शत्रुओं को नष्ट करो तथा क्रमशः सब कार्य पूरे करो. (१४) अया ते अग्ने समिधा विधेम प्रति स्तोमं शस्यमानं गृभाय. दहाशसो रक्षसः पाह्य१स्मान्द्रुहो निदो मित्रवहो अवद्यात्.. (१५) हे अग्नि! इस प्रदीप्त स्तुति द्वारा हम तुम्हारी सेवा करें. हमारी स्तुति को ग्रहण करो एवं स्तुति न करने वाले राक्षसों को जलाओ. हे मित्रों द्वारा पूजनीय अग्नि! द्रोह एवं निंदा करने वालों के अपयश से हमें बचाओ. (१५) सूक्त-५ देवता—अग्नि वैश्वानराय मीळहुषे सजोषाः कथा दाशेमाग्नये बृहद्भाः. अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः.. (१) परस्पर समान प्रेम रखने वाले हम ऋत्विज् और यजमान कामवर्षी एवं भासमान महान् वैश्वानर अग्नि को किस प्रकार हव्य दें? थूना जिस प्रकार छप्पर को धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि अपने विशाल एवं संपूर्ण शरीर से स्वर्ग को धारण करते हैं. (१) मा निन्दत य इमां मह्यं रातिं देवो ददौ मर्त्याय स्वधावान्. पाकाय गृत्सो अमृतो विचेता वैश्वानरो नृतमो यह्वो अग्निः.. (२) हे होताओ! वैश्वानर अग्नि की निंदा मत करो. वे हव्य पाकर हम मरणशील एवं पूर्ण- ज्ञान वाले यजमानों को यह दान देते हैं. वे मेधावी, मरणरहित, विशिष्ट बुद्धि वाले, नेताओं में श्रेष्ठ तथा महान् हैं. (२) साम द्विबर्हा महि तिग्मभृष्टिः सहस्ररेता वृषभस्तुविष्मान्. पदं न गोरपगूळ्हं विविद्वानग्निर्मह्यं प्रेदु वोचन्मनीषाम्.. (३) मध्यम और उत्तम दो स्थानों में विराजमान, तीक्ष्ण तेज वाले, अधिक सारयुक्त, कामवर्षी, बहुधनी, खोई हुई गाय के चरणचिह्नों के समान रहस्यपूर्ण एवं जानने योग्य अग्नि हमारे पूज्य एवं प्रिय स्तोत्र को बार-बार जानकर हमें बतावें. (३) प्र ताँ अग्निर्बभसत्तिग्मजम्भस्तपिष्ठेन शोचिषा यः सुराधाः. प्र ये मिनन्ति वरुणस्य धाम प्रिया मित्रस्य चेततो ध्रुवाणि.. (४) शोभन धनयुक्त एवं तीखे दांतों वाले अग्नि अत्यंत तापकारी तेज द्वारा उन्हें नष्ट करें जो जानने वाले मित्र और वरुण के प्रिय तथा ध्रुवतेज की निंदा करते हैं. (४) अभ्रातरो न योषणो व्यन्तः पतिरिपो न जनयो दुरेवाः. ebook converter DEMO Watermarks*