भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 689, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 689

ऊर्ध्व ऊ षु णो अध्वरस्य होतरग्ने तिष्ठ देवतात यजीयान्. त्वं हि विश्वमभ्यसि मन्म प्र वेधसश्चित्तिरसि मनीषाम्.. (१) हे यज्ञ के होता एवं यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ अग्नि! हमारे यज्ञों में तुम ऊंचे स्थान पर बैठो, शत्रुओं के समस्त धन पर अधिकार करो एवं यजमान की स्तुति को बढ़ाओ. (१) अमूरो होता न्यसादि विश्व१ग्निर्मन्द्रो विदथेषु प्रचेता:. ऊर्ध्वं भानुं सवितेवाश्रेन्मेतेव धूमं स्तभायदुप द्याम्.. (२) प्रगल्भ, यज्ञ पूर्ण करने वाले, हर्षित करने वाले एवं अधिक ज्ञान-युक्त अग्नि यज्ञों में प्रजाओं के साथ बैठते हैं, उदित सूर्य के समान ऊपर की ओर मुंह करते हैं एवं अपने धुएं को आकाश के ऊपर इस प्रकार स्थापित करते हैं, जिस प्रकार थूना अपने ऊपर बांस आदि को रखता है. (२) यता सुजूर्णी रातिनी घृताची प्रदक्षिणिद् देवतातिमुरान:. उदु स्वरुर्नवजा नाक्र: पश्वो अनक्ति सुधित: सुमेक:.. (३) भली प्रकार पकड़ी हुई और पुरानी घृताची (पात्र विशेष) घी से भरी हुई है. यज्ञ को बढ़ाने वाले अध्वर्यु प्रदक्षिणा कर रहे हैं. ताजा बनाया हुआ यूप ऊंचा उठता है. आक्रमण करने वाला एवं दीप्ति वाला कुठार भी पशुओं की ओर चलता है. (३) स्तीर्णे बर्हिषि समिधाने अग्ना ऊर्ध्वो अध्वर्युर्जुजुषाणो अस्थात्. पर्यग्नि: पशुपा न होता त्रिविष्ट्येति प्रदिव उराण:.. (४) वेदी पर कुश बिछ जाने एवं अग्नि के प्रज्वलित हो जाने पर अध्वर्यु उन्हें प्रसन्न करने के लिए उठता है. यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं पुरातन अग्नि थोड़े हव्य को भी बहुत बनाते हुए इस प्रकार तीन बार पशुओं की परिक्रमा करते हैं, जिस प्रकार पशुओं को पालने वाला. (४) परि त्मना मितद्रुरेति होताग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा. द्रवन्त्यस्य वाजिनो न शोका भयन्ते विश्वा भुवना यदभ्राट्.. (५) ये होता, प्रसन्न करने वाले, मधुरभाषी एवं यज्ञ के स्वामी अग्नि सीमित चाल से पशुओं के चारों ओर घूमते हैं. इनका प्रकाश घोड़े के समान चारों ओर भागता है. अग्नि के प्रज्वलित होने पर सभी प्राणी डर जाते हैं. (५) भद्रा ते अग्ने स्वनीक सन्दृग्घोरस्य सतो विषुणस्य चारु:. न यत्ते शोचिस्तमसा वरन्त न ध्वस्मानस्तन्वी३ रेप आ धु:.. (६) हे शोभन ज्वालाओं वाले, भयजनक एवं सर्वत्र व्याप्त अग्नि! तुम्हारी रमणीय एवं कल्याणी मूर्ति भली प्रकार दिखाई देती है. तुम्हारी दीप्ति को अंधकार नहीं रोक सकता एवं ebook converter DEMO Watermarks*

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