ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि, वरुण त्वां ह्यग्ने सदमित्समन्यवो देवासो देवमरतिं न्येरिरे इति क्रत्वा न्येरिरे. अमर्त्य यजत मर्त्येष्वा देवमादेवं प्रचेतसं विश्वमादेवं जनत प्रचेतसम्.. (१) हे शीघ्रगामी अग्नि देव! बराबर वालों से स्पर्धा करते हुए इंद्रादि देव तुम्हें युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं एवं यजमान यज्ञ में देवों को बुलाने के लिए प्रेरणा देते हैं. हे यज्ञ योग्य, मरणरहित, तेजस्वी एवं उत्तम-ज्ञान वाले अग्नि! देवों ने तुम्हें यज्ञकर्त्ता मानवों में आने एवं विभिन्न यज्ञों में उपस्थित रहने के लिए जन्म दिया है. (१) स भ्रातरं वरुणमग्न आ ववृत्स्व देवाँ अच्छा सुमती यज्ञवनसं ज्येष्ठं यज्ञवनसम्. ऋतावानमादित्यं चर्षणीधृतं राजानं चर्षणीधृतम्.. (२) हे अग्नि! तुम अपने भाई, हवि द्वारा सेवा योग्य, यज्ञ का भाग करने वाले, अतिशय प्रशंसनीय, जलों के स्वामी, अदिति के पुत्र, जल देकर मनुष्यों को धारण करने वाले, शोभनबुद्धि संपन्न एवं राजमान वरुणदेव को स्तोताओं के प्रति अभिमुख करो. (२) सखे सखायमभ्या ववृत्स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं दस्म रंह्या. अग्ने मृळीकं वरुणे सचा विदो मरुत्सु विश्वभानुषु. तोकाय तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि.. (३) हे दर्शनीय एवं सखा अग्नि! तुम अपने मित्र वरुण को उसी प्रकार हमारी ओर अभिमुख करो, जैसे चलने में कुशल एवं रथ में जुते हुए घोड़े तेज चलने वाले पहिए को लक्ष्य की ओर ले जाते हैं. तुमने वरुण एवं मरुतों की सहायता से सुखकारक हव्य पाया है. हे तेजस्वी अग्नि! हमारे पुत्र-पौत्रों को सुखी करो एवं हमारा कल्याण करो. (३) त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेळोऽवयासिसीष्ठाः. यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषांसि प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (४) हे उपायों को जानने वाले अग्नि! तुम हमारे ऊपर होने वाला वरुणदेव का क्रोध दूर करो. हे सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता, हव्य के अतिशय वहन करने वाले एवं दीप्तिशाली अग्नि! सभी पापों को हमसे दूर करो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*