भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 679, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 679

अतस्त्वं दृश्याँ अग्न एतान्यङ्ग्भिः पश्येरद्भुताँ अर्य एवैः.. (१२) हे अग्नि! मनुष्यों के घरों में रहने वाले तिरस्कारशून्य एवं क्रांतदर्शी देवों ने तुझ मेधावी से होता बनने के लिए कहा है. हे यज्ञस्वामी! तुम अपने गतिशील तेजों से इन दर्शनीय एवं आश्चर्ययुक्त देवों को देखो. (१२) त्वमग्ने वाघते सुप्रणीतिः सुतसोमाय विधते यविष्ठ. रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथुश्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः.. (१३) हे अतिशय युवा, दीप्तियुक्त, मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं उत्तर वेदी पर स्थापित करने योग्य अग्नि! सोम निचोड़ने वाले व तुम्हारी सेवा तथा स्तुति करने वाले यजमान की रक्षा के लिए उसे अधिक मात्रा में आनंददायक एवं उत्तम धन दो. (१३) अधा ह यद्द्यमग्ने त्वाया पड्भिर्हस्तेभिश्चकृमा तनूभिः. रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोर्ऋतं येमुः सुध्य आशुषाणाः.. (१४) हे अग्नि! हम हाथों, पैरों एवं शरीर के अन्य अवयवों द्वारा जिस प्रयोजन के लिए तुम्हें उत्पन्न करते हैं, उत्तम कर्मों वाले एवं यज्ञादि कर्मों में तल्लीन अंगिरा भी अपनी भुजाओं से अरणिमंथन करके तुम्हें उसी कर्म के लिए इस प्रकार उत्पन्न करते हैं, जिस प्रकार कारीगर रथ तैयार करता है. (१४) अधा मातुरुषसः सप्त विप्रा जायेमहि प्रथमा वेधसो नॄन्. दिवस्पुत्रा अङ्गिरसो भवेमाद्रिं रुजेम धनिनं शुचन्तः.. (१५) हम आठ श्रेष्ठ मेधावी (छः अंगिरा एवं सातवें वामदेव) जनों ने उषा माता से अग्नि की किरणों को लिया है. तेजस्वी सूर्य के पुत्र हम अंगिरा दीप्तियुक्त होते हुए गोधन को रोकने वाले एवं जलपूर्ण पर्वत को भेदेंगे. (१५) अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशूषाणाः. शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (१६) हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ, पुरातन एवं सच्चे यज्ञ के करने में संलग्न पूर्वजों ने तेजस्वी स्थान तथा दीप्ति प्राप्त की थी, उक्थमंत्र बोलकर अंधकार को नष्ट किया था तथा पणियों द्वारा चुराई गई लाल रंग वाली गायों को बाहर निकाला था. (१६) सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः. शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अगमन्.. (१७) यागादि शोभन कार्य करने वाले, उत्तम-दीप्तिसंपन्न एवं देवों की अभिलाषा करने वाले स्तोतागण यज्ञादि द्वारा अपना मनुष्यजन्म इस प्रकार निर्मल कर रहे हैं, जिस प्रकार लोहार ebook converter DEMO Watermarks*