भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

अतस्त्वं दृश्याँ अग्न एतान्यङ्ग्भिः पश्येरद्भुताँ अर्य एवैः.. (१२) हे अग्नि! मनुष्यों के घरों में रहने वाले तिरस्कारशून्य एवं क्रांतदर्शी देवों ने तुझ मेधावी से होता बनने के लिए कहा है. हे यज्ञस्वामी! तुम अपने गतिशील तेजों से इन दर्शनीय एवं आश्चर्ययुक्त देवों को देखो. (१२) त्वमग्ने वाघते सुप्रणीतिः सुतसोमाय विधते यविष्ठ. रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथुश्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः.. (१३) हे अतिशय युवा, दीप्तियुक्त, मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं उत्तर वेदी पर स्थापित करने योग्य अग्नि! सोम निचोड़ने वाले व तुम्हारी सेवा तथा स्तुति करने वाले यजमान की रक्षा के लिए उसे अधिक मात्रा में आनंददायक एवं उत्तम धन दो. (१३) अधा ह यद्द्यमग्ने त्वाया पड्भिर्हस्तेभिश्चकृमा तनूभिः. रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोर्ऋतं येमुः सुध्य आशुषाणाः.. (१४) हे अग्नि! हम हाथों, पैरों एवं शरीर के अन्य अवयवों द्वारा जिस प्रयोजन के लिए तुम्हें उत्पन्न करते हैं, उत्तम कर्मों वाले एवं यज्ञादि कर्मों में तल्लीन अंगिरा भी अपनी भुजाओं से अरणिमंथन करके तुम्हें उसी कर्म के लिए इस प्रकार उत्पन्न करते हैं, जिस प्रकार कारीगर रथ तैयार करता है. (१४) अधा मातुरुषसः सप्त विप्रा जायेमहि प्रथमा वेधसो नॄन्. दिवस्पुत्रा अङ्गिरसो भवेमाद्रिं रुजेम धनिनं शुचन्तः.. (१५) हम आठ श्रेष्ठ मेधावी (छः अंगिरा एवं सातवें वामदेव) जनों ने उषा माता से अग्नि की किरणों को लिया है. तेजस्वी सूर्य के पुत्र हम अंगिरा दीप्तियुक्त होते हुए गोधन को रोकने वाले एवं जलपूर्ण पर्वत को भेदेंगे. (१५) अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशूषाणाः. शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (१६) हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ, पुरातन एवं सच्चे यज्ञ के करने में संलग्न पूर्वजों ने तेजस्वी स्थान तथा दीप्ति प्राप्त की थी, उक्थमंत्र बोलकर अंधकार को नष्ट किया था तथा पणियों द्वारा चुराई गई लाल रंग वाली गायों को बाहर निकाला था. (१६) सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः. शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अगमन्.. (१७) यागादि शोभन कार्य करने वाले, उत्तम-दीप्तिसंपन्न एवं देवों की अभिलाषा करने वाले स्तोतागण यज्ञादि द्वारा अपना मनुष्यजन्म इस प्रकार निर्मल कर रहे हैं, जिस प्रकार लोहार ebook converter DEMO Watermarks*

धौंकनी के द्वारा लोहे को साफ करता है. अग्नि को दीप्तिशाली करते एवं इंद्र को बढ़ाते हुए उन लोगों ने यज्ञ के चारों ओर बैठकर महान् गोधन को प्राप्त किया था. (१७) आ यूथेव क्षुमति पश्वो अख्यद्देवानां यज्जन्निमान्त्युग्र. मर्तानां चिदुर्वशीरकृप्रन्वृधे चिदर्य उपरस्यायोः.. (१८) हे तेजस्वी अग्नि! अंगिराओं के पर्वत में बंद गोसमूह को इंद्र ने उसी प्रकार देखा, जिस प्रकार लोग अन्न वाले घर में पशुसमूह को देखते हैं. अंगिराओं द्वारा लाई गईं गायों से प्रजाएं संपन्न बनी थीं. स्वामी संतान के पालन एवं दास अपने पालन में समर्थ हुए थे. (१८) अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवस्त्रनुषसो विभातिः. अनूनमग्निं पुरुधा सुश्चन्द्रं देवस्य मर्मृजतश्चारु चक्षुः.. (१९) हे अग्नि! हम तुम्हारी सेवा करते हुए शोभन कर्मों वाले बनें. प्रकाश वाली उषाएं सबको तेज से ढक देती हैं तथा प्रसन्नताकारक अग्नि को अनेक बार पूर्ण रूप से धारण करती हैं. हे तेजस्वी अग्नि! हम तुम्हारे मनोहर तेज की सेवा करके शोभनकर्मयुक्त बनें. (१९) एता ते अग्न उचथानि वेधोऽवोचाम कवये ता जुषस्व. उच्छोचस्व कृणुहि वस्यसो नो महो रायः पुरुवार प्र यन्धि.. (२०) हे विधाता एवं मेधावी अग्नि! अपने उद्देश्य से बोले गए इस मंत्रसमूह को स्वीकार करो एवं उद्दीप्त होकर हमें परमसंपत्तिशाली बनाओ. हे बहुतों द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! हमें महान् धन दो. (२०) सूक्त-३ देवता—अग्नि आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः. अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्.. (१) हे यजमानो! वज्र के समान ध्रुवमृत्यु से पहले ही यज्ञ के स्वामी, देवों को बुलाने वाले, शत्रुओं को रुलाने वाले, धरती-आकाश को अन्न देने वाले एवं सुनहरी प्रभा से युक्त अग्नि की अपनी रक्षा के निमित्त हवि से सेवा करो. (१) अयं योनिश्चकृमा यं वयं ते जायेव पत्य उशती सुवासाः. अर्वाचीनः परिवीतो नि षीदेमा उ ते स्वपाक प्रतीचीः.. (२) हे अग्नि! जिस प्रकार पति की अभिलाषा करती हुई एवं शोभन वस्त्रों वाली पत्नी अपने समीप पति को स्थान देती है, उसी प्रकार हम तुम्हारे लिए उत्तर वेदी रूप स्थान निश्चित करते हैं. हे उत्तम कर्मों वाले अग्नि! तुम देवों से घिरे हुए हमारे सामने बैठो. समस्त ebook converter DEMO Watermarks*

स्तुतियां तुम्हारे सम्मुख होंगी. (२) आशृण्वते अदृपिताय मन्म नृचक्षसे सुमृळीकाय वेधः. देवाय शस्तिममृताय शंस ग्रावेव सोता मधुषुद्यमीळे.. (३) हे स्तुतिकर्त्ताओं! स्तोत्र सुनने वाले, प्रमादरहित, मनुष्यों को देखने वाले, शोभन सुखदाता एवं मरणरहित अग्नि देव के लिए स्तोत्र बोलो. पत्थरों के समान सोमरस निचोड़ने वाले यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. (३) त्वं चिन्नः शम्या अग्ने अस्या ऋतस्य बोध्युतचित्स्वाधीः. कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते.. (४) हे अग्नि! तुम हमारे इस यज्ञकर्म के देव बनो. हे सत्ययज्ञ वाले एवं शोभनकर्मयुक्त अग्नि! तुम हमारे स्तोत्र को जानो. हमें प्रसन्न करने वाले तुम्हारे स्तोत्र हमारे घरों में कब बोले जावेंगे एवं तुम्हारे साथ मित्रता हमारे घर में कब बनेगी? (४) कथा ह तद्वरुणाय त्वमग्ने कथा दिवे गर्हसे कन्न आगः. कथा मित्राय मीळहुषे पृथिव्यै ब्रवः कदर्यम्णे कद्भग़ाय.. (५) हे अग्नि! तुम वरुण एवं सविता के समीप हमारी निंदा क्यों करते हो? हमसे क्या अपराध हुआ है? तुमने कामवर्षी मित्र, पृथ्वी, अर्यमा एवं भग को हमारा पाप क्यों बताया? (५) कद्धिष्ण्यासु वृधानो अग्ने कद्धाताय प्रतवसे शुभंये. परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदर्ग्ने रुद्राय नृघ्ने.. (६) हे अग्नि! यज्ञ में बढ़ते हुए तुम अतिशय बलशाली, शुभ फलदाता एवं सर्वत्र गमनशील अश्विनीकुमारों, वायु, धरती एवं पापियों का नाश करने वाले इंद्र से हमारे पाप के विषय में क्यों कहते हो? (६) कथा महे पुष्टिम्भराय पूष्णे कद्रुद्राय सुमखाय हविर्दे. कद्विष्णव उरुगायाय रेतो ब्रवः कद्ग्ने शरवे बृहत्यै.. (७) हे अग्नि! हमारे पाप की वह कहानी महान् एवं पुष्टिकारक पूषा, पूजनीय एवं हविदाता रुद्र, बहुतों द्वारा प्रशंसित विष्णु अथवा महान् संवत्सर से क्यों कहते हो? (७) कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः. प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान्.. (८) हे अग्नि! सत्यरूप, मरुद्गण, महान् सूर्य, देवी अदिति एवं वेगशाली वायु द्वारा पूछे

जाने पर हमारे पाप की बात उन्हें क्यों बताते हो? हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम सब कुछ जानते हुए देवों के पास जाओ. (८) ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत्पक्वमग्ने. कृष्णा सती रुशता धासिनैषा जामर्येण पयसा पीपाय.. (९) हे अग्नि! हम गायों से उस दूध की याचना करते हैं जो यज्ञ से नित्य संबंधित है. वे गाएं स्वयं सच्ची होते हुए भी मधुर दूध देती हैं. वे गाएं स्वयं काली हैं, पर श्वेत-वर्ण, प्राणधारक एवं प्रजाओं को अमर बनाने वाले दूध से पुष्ट करती हैं. (९) ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन. अस्पन्दमानो अचरद्वयोधा वृषा शुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः.. (१०) कामवर्षी एवं श्रेष्ठ अग्नि सत्यरूप एवं पालन करने वाले दूध से भरे रहते हैं. अन्न देने वाले वे अग्नि एक जगह रहकर भी सब जगह चलते हैं. जलवर्षक सूर्य बादलों से जल दुहते हैं. (१०) ऋतेनाद्रिं व्यसन्भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः. शुनं नरः परि षदनुषसमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ.. (११) मेधातिथि आदि अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने यज्ञ के द्वारा गायों को रोकने वाले पहाड़ को उखाड़ फेंका था एवं वे अपनी गायों के पास पहुंच गए थे. उन यज्ञनेताओं ने सुख से उषा को पाया था. अरणिमंथन द्वारा अग्नि उत्पन्न होने पर सूर्य देव प्रकट हुए. (११) ऋतेन देवीरमृता अमृक्ता अर्णोभिरापो मधुमद्भििरग्ने. वाजी न सर्गेषु प्रस्तुभानः प्र सदमित्स्रवितवे दधन्युः.. (१२) हे अग्नि! अमृत का कारण, बाधारहित एवं मधुर जल से भरी हुई दिव्य नदियां यज्ञ की प्रेरणा से सदा इस प्रकार बहती रहती हैं, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित घोड़ा बढ़ता है. (१२) मा कस्य यक्षं सदमिद्धुरो गा मा वेशस्य प्रमिनतो मापेः. मा भ्रातुरग्ने अनृजोर्ऋणं वेर्मा सख्युर्दक्षं रिपोर्भुजेम.. (१३) हे अग्नि! हमारे हिंसक, दुष्टबुद्धि पड़ोसी अथवा हमारे अतिरिक्त किसी भी बंधु के यज्ञ में मत जाना तथा कुटिलबुद्धि वाले हमारे भ्राता का हव्य धारण मत करना. हम शत्रु अथवा मित्र का दिया अन्न भोग में न लाकर केवल तुम्हारे द्वारा दिए गए अन्न का ही उपभोग करेंगे. (१३) रक्षा णो अग्ने तव रक्षणेभी रारक्षाणः सुमख प्रीणानः. ebook converter DEMO Watermarks*

प्रति ष्फुर वि रुज वीड्वंहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम्.. (१४) हे उत्तम धन वाले, हम लोगों के महान् रक्षक एवं हव्य द्वारा प्रसन्न अग्नि! तुम अपनी रक्षा द्वारा प्रसन्न हमें उन्नत बनाओ, शक्तिशाली पाप का नाश करो एवं महान् तथा वृद्धि-प्राप्त विघ्न का नाश करो. (१४) एभिर्भव सुमना अग्ने अर्कैरिमन्त्सपृश मन्मभिः शूर वाजान्. उत ब्रह्माण्यङ्गिरो जुषस्व सं ते शस्तिर्देववाता जरेत.. (१५) हे अग्नि! मेरी इन पूज्य स्तुतियों द्वारा प्रसन्नमन बनो. हे शूर! स्तोत्रों के साथ हमारे अन्न को स्वीकार करो. हे हव्यप्राप्तकर्त्ता अग्नि! हमारे मंत्रों को स्वीकार करो. देवों की स्तुति के निमित्त बने मंत्र तुम्हें बढ़ावें. (१५) एता विश्वा विदुषे तुभ्यं वेधो नीथान्यग्ने निण्या वचांसि. निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः.. (१६) हे विधाता, यज्ञकर्म के ज्ञानी एवं क्रांतदर्शी! हम बुद्धिमान् लोग तुम्हें लक्ष्य करके फल प्राप्त कराने वाली, गूढ़, सभी प्रकार कहने योग्य एवं विद्वानों द्वारा बनाई हुई समस्त स्तुतियों को एक साथ बोलते हैं. (१६) सूक्त-४ देवता—अग्नि कृणुष्व पाजः प्रसितिं याहि राजेवामवाँ इभेन. तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः.. (१) हे अग्नि! बहेलिया जिस प्रकार जाल फैलाता है, उसी प्रकार तुम अपने भयनाशक तेजसमूह को फैलाओ. राजा जिस प्रकार अपने मंत्री के साथ चलता है, उसी प्रकार तुम भी अपने तेजों के साथ आगे बढ़ो. तेज चलने वाली शत्रुसेना के पीछे चलते हुए तुम उसका नाश करो एवं अपने अत्यंत तप्त तेजों से राक्षसों का हनन करो. (१) तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः. तपूंष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसेन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः.. (२) हे अग्नि! तुम्हारी घूमने वाली एवं शीघ्रगामिनी किरणें सब जगह फैलती हैं. तुम अत्यंत दीप्त होकर हराने वाले तेज से शत्रुओं को जलाओ. हे शत्रु द्वारा निरुद्ध न होने वाले अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं द्वारा तेज चिनगारियों तथा उल्काओं को चारों ओर फैलाओ. (२) प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः. यो नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्.. (३)

हे अतिशय वेगशाली अग्नि! शत्रुओं को बाधा पहुंचाने वाली किरणों को विशेष रूप से फैलाओ. हे हिंसारहित अग्नि! जो दूर रहकर हमारा बुरा चाहता है अथवा पास रहकर हमारे अनिष्ट की इच्छा करता है, तुम उससे हम लोगों की रक्षा करो. हम तुम्हारे हैं. कोई हमें हरा न सके. (३) उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्य१मित्राँ ओषतात्तिग्महेते. यो नो अरातिं समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्.. (४) हे तेज ज्वालाओं वाले अग्नि! उठो एवं राक्षसों के नाश में लगो, शत्रुओं के विरुद्ध अपनी ज्वालाएं फैलाओ एवं तेज-समूह द्वारा शत्रुओं को जलाओ. हे भली प्रकार प्रज्वलित अग्नि! जो व्यक्ति हमसे शत्रुता रखता हो उस नीच को सूखी लकड़ी के समान जला दो. (४) ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने. अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्.. (५) हे अग्नि! तुम तैयार हो जाओ और हमसे अधिक बलशाली राक्षसों को एक-एक करके मारो, अपने दिव्य तेज का आविष्कार करो, प्राणियों को क्लेश देने वाले राक्षसों के धनुषों को डोरी से हीन बनाओ तथा हमारे द्वारा पराजित अथवा अपराजित सभी शत्रुओं को समाप्त करो. (५) स ते जानाति सुमतिं यविष्ठ य ईवते ब्रह्मणे गातुमैरत्. विश्वान्यस्मै सुदिनानि रायो द्युम्नान्यर्यो वि दुरो अभि द्यौत्.. (६) हे अतिशय युवा, गमनशील एवं श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाला व्यक्ति तुम्हारा अनुग्रह प्राप्त करता है. हे यज्ञस्वामी अग्नि! तुम उसके लिए संपूर्ण रूप से उत्तम दिवस, धन एवं रत्नों को लेकर उसके घर के सामने प्रकाशित बनो. (६) सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः. पिप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना सासदिष्टिः.. (७) हे अग्नि! जो व्यक्ति तुम्हें नित्य हव्य एवं मंत्रों से प्रसन्न करना चाहता है, वह शोभन-धन वाला एवं दानशील हो, कठिनता से मिलने वाली सौ वर्ष की आयु प्राप्त करे, उसके सभी दिन उत्तम हों एवं उसका यज्ञ फल देने वाला हो. (७) अर्चामि ते सुमतिं घोष्यर्वाक्सं ते वावाता जरतामियं गीः. स्वश्वास्त्वा सुरथा मर्जयेमास्मे क्षत्राणि धारयेरनु द्यून.. (८) हे अग्नि! हम तुम्हारी शोभन-बुद्धि की उपासना करते हैं. बार-बार तुम्हें प्राप्त होने के विचार से बोली गई वाणी गूंजती हुई तुम्हारी स्तुति करे. हम सुंदर घोड़ों एवं शोभन रथों से युक्त होकर तुम्हें अलंकृत करें. तुम प्रतिदिन हम लोगों को धनसंपन्न बनाओ. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन्दोषावस्तर्दीदिवांसमनु द्यून्. क्रीळन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम्.. (९) हे रात-दिन दीप्ति होने वाले अग्नि! बहुत से लोग इस संसार में प्रतिदिन तुम्हारी सेवा करते हैं. हम भी शत्रुजनों की संपत्तियां तुम्हारी कृपा से अपने अधिकार में करते हुए तथा अपने घरों में पुत्र-पौत्रों के साथ क्रीड़ा करते हुए प्रसन्न मन से तुम्हारी सेवा करें. (९) यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन. तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमानुषग्जुजोषत्.. (१०) हे अग्नि! सुंदर घोड़ों वाला एवं यज्ञ के योग्य संपत्तियों का स्वामी जो पुरुष अन्नयुक्त रथ के द्वारा तुम्हारे पास आता है, तुम उसकी रक्षा करते हो, जो पुरुष क्रम से तुम्हारा अतिथि सत्कार करता है, उसके तुम मित्र बनते हो. (१०) महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय. त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतोदमूनाः.. (११) हे होता, अतिशय युवा एवं शोभन-बुद्धि अग्नि! स्तोत्रों द्वारा हमने तुम्हारी मित्रता प्राप्त की है. उससे हम अपने शत्रु राक्षसों का नाश करें. यह स्तोत्र हमें अपने पिता गौतम से प्राप्त हुआ है. हे शत्रुनाशक अग्नि! हमारे इन स्तुतिवचनों को जानो. (११) अस्वप्नजस्तरशयः सुशेवा अतन्द्रासोऽवृका अश्रमिष्ठाः. ते पायवः सध्र्यञ्चो निषद्याग्ने तव नः पान्त्वमूर.. (१२) हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम्हारी जागरूक, नित्य गतिशील, उत्तम-सुख देने वाली, आलस्यहीन, हिंसारहित, कभी न थकने वाली, परस्पर मिली हुई एवं रक्षक किरणें हमारे यज्ञ में बैठकर हमारी रक्षा करें. (१२) ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन्. ररक्ष तान्सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः.. (१३) हे अग्नि! तुम्हारी रक्षा करने वाली एवं करुणादृष्टियुक्त किरणों ने ममता के अंधे पुत्र दीर्घतमा की शाप से रक्षा की थी. हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! तुम उन उत्तम कर्म वाली किरणों की रक्षा करते हो. नष्ट करने की इच्छा रखने वाले शत्रु भी उसे समाप्त नहीं कर सके. (१३) त्वया वयं सधन्य१स्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान्. उभा शंसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठ्या कृण्वह्रयाण.. (१४) हे अलज्जित गमन वाले अग्नि! हम स्तोता तुम्हारी कृपा से धनयुक्त एवं रक्षित होकर ebook converter DEMO Watermarks*

तुम्हारी प्रेरणा से अन्न प्राप्त करें. हे सत्य को विस्तृत करने वाले एवं पापनाशक अग्नि! हमारे दूर एवं समीपवर्ती शत्रुओं को नष्ट करो तथा क्रमशः सब कार्य पूरे करो. (१४) अया ते अग्ने समिधा विधेम प्रति स्तोमं शस्यमानं गृभाय. दहाशसो रक्षसः पाह्य१स्मान्द्रुहो निदो मित्रवहो अवद्यात्.. (१५) हे अग्नि! इस प्रदीप्त स्तुति द्वारा हम तुम्हारी सेवा करें. हमारी स्तुति को ग्रहण करो एवं स्तुति न करने वाले राक्षसों को जलाओ. हे मित्रों द्वारा पूजनीय अग्नि! द्रोह एवं निंदा करने वालों के अपयश से हमें बचाओ. (१५) सूक्त-५ देवता—अग्नि वैश्वानराय मीळहुषे सजोषाः कथा दाशेमाग्नये बृहद्भाः. अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः.. (१) परस्पर समान प्रेम रखने वाले हम ऋत्विज् और यजमान कामवर्षी एवं भासमान महान् वैश्वानर अग्नि को किस प्रकार हव्य दें? थूना जिस प्रकार छप्पर को धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि अपने विशाल एवं संपूर्ण शरीर से स्वर्ग को धारण करते हैं. (१) मा निन्दत य इमां मह्यं रातिं देवो ददौ मर्त्याय स्वधावान्. पाकाय गृत्सो अमृतो विचेता वैश्वानरो नृतमो यह्वो अग्निः.. (२) हे होताओ! वैश्वानर अग्नि की निंदा मत करो. वे हव्य पाकर हम मरणशील एवं पूर्ण- ज्ञान वाले यजमानों को यह दान देते हैं. वे मेधावी, मरणरहित, विशिष्ट बुद्धि वाले, नेताओं में श्रेष्ठ तथा महान् हैं. (२) साम द्विबर्हा महि तिग्मभृष्टिः सहस्ररेता वृषभस्तुविष्मान्. पदं न गोरपगूळ्हं विविद्वानग्निर्मह्यं प्रेदु वोचन्मनीषाम्.. (३) मध्यम और उत्तम दो स्थानों में विराजमान, तीक्ष्ण तेज वाले, अधिक सारयुक्त, कामवर्षी, बहुधनी, खोई हुई गाय के चरणचिह्नों के समान रहस्यपूर्ण एवं जानने योग्य अग्नि हमारे पूज्य एवं प्रिय स्तोत्र को बार-बार जानकर हमें बतावें. (३) प्र ताँ अग्निर्बभसत्तिग्मजम्भस्तपिष्ठेन शोचिषा यः सुराधाः. प्र ये मिनन्ति वरुणस्य धाम प्रिया मित्रस्य चेततो ध्रुवाणि.. (४) शोभन धनयुक्त एवं तीखे दांतों वाले अग्नि अत्यंत तापकारी तेज द्वारा उन्हें नष्ट करें जो जानने वाले मित्र और वरुण के प्रिय तथा ध्रुवतेज की निंदा करते हैं. (४) अभ्रातरो न योषणो व्यन्तः पतिरिपो न जनयो दुरेवाः. ebook converter DEMO Watermarks*

पापासः सन्तो अनृता असत्या इदं पदमजनता गभीरम्.. (५) बंधु-बांधवरहित नारी के समान यज्ञादि त्यागकर जाने वाले, पति से द्वेष करने वाली स्त्रियों के समान दुराचारी, पापी, मानस तथा वाचिक-सत्य-रहित लोग नरक को प्राप्त होते हैं. (५) इदं मे अग्ने कियते पावकामिनते गुरुं भारं न मन्म. बृहद्दधाथ धृषता गभीरं यह्वं पृष्टं प्रयसा सप्तधातु.. (६) हे पवित्रकर्त्ता अग्नि! जैसे अल्प-शक्ति वाले व्यक्ति पर भारी बोझा लादा जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा कर्म मेरे लिए भारी है, पर मैं उसका त्याग नहीं करता. तुम मुझे प्रिय, अधिक, शत्रुओं को हराने वाले अन्न से युक्त, गंभीर, महान्, स्पर्श करने योग्य एवं सात प्रकार का धन दान करो. (६) तमिन्न्वे३व समना समानमभि क्रत्वा पुनती धीतिरश्याः. ससस्य चर्मन्नधि चारु पृश्नेरग्रे रुप आरुपितं जबारु.. (७) उपयुक्त एवं हमें पवित्र करने वाली स्तुति कर्म के साथ शीघ्र ही वैश्वानर के पास पहुंचे. वह स्तुति वैश्वानर अग्नि के दीप्तिमंडल पृथ्वी से निश्चित स्वर्गलोक के ऊपर घूमने के लिए देवों ने पूर्व दिशा में स्थापित की है. (७) प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति. यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः.. (८) मेरे इस वचन के अतिरिक्त कहने योग्य अन्य बात क्या है? जानने वाले लोग कहते हैं कि दूध काढ़ने वाले जिस दूध को जल के समान निकालते हैं, उसे वैश्वानर अग्नि गुफा में छिपाकर रखते हैं एवं फैली हुई धरती के सर्वप्रिय तथा श्रेष्ठ स्थान की रक्षा करते हैं. (८) इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्रिया सचत पूर्व्यं गौः. ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद्रघुयद्विवेद.. (९) दुधारू गायों द्वारा अग्निहोत्रादि के लिए सेवित, अत्यंत चमकता हुआ, गुफा में शीघ्र गतिशील, प्रसिद्ध, महान् एवं पूज्य सूर्यमंडल रूपी वैश्वानर अग्नि को मैं जान चुका हूं. (९) अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः. मातुष्पदे परमे अन्ति षद्गोर्वृष्णः शोचिषः प्रयतस्य जिह्वा.. (१०) दीप्यमान वैश्वानर अग्नि धरती-आकाशरूपी माता-पिता के बीच में व्याप्त रहकर गाय के थन में छिपे हुए दूध को मुंह से पीने के लिए जागृत हुए थे. कामवर्षी, दीप्त एवं आहवनीय रूप से निश्चित वैश्वानर अग्नि की जीभ गोमाता के थन रूप उत्तम स्थान में ebook converter DEMO Watermarks*

उपस्थित है. (१०) ऋतं वोचे नमसा पृच्छ्यमानस्तवाशसा जातवेदो यदीदम्. त्वमस्य क्षयसि यद्ध विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत्पृथिव्याम्.. (११) मुझ यजमान से यदि कोई नमस्कार करके पूछे तो मैं सत्य कहूंगा. हे जातवेद अग्नि! यदि तुम्हारी स्तुति से हमें धन मिलेगा तो उसके स्वामी तुम्हीं बनोगे. सबके धन भी तुम्हारे ही हैं, चाहे वे धन स्वर्ग में हों या धरती पर. (११) किं नो अस्य द्रविणं कद्ध रत्नं वि नो वोचो जातवेदश्चिकित्वान्. गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य रेकु पदं न निदाना अगन्म.. (१२) इस धन का साधनरूप धन क्या है? हितकर धन क्या है? हे जातवेद! तुम इस बात को जानते हो, इसलिए हमें बताओ. धन प्राप्ति के मार्ग का गूढ़ उपाय भी हमें बताओ. हम निंदा के पात्र बने बिना गंतव्य स्थान को पा सकें. (१२) का मर्यादा वयुना कद्ध वाममच्छा गमेम रघवो न वाजम्. कदा नो देवीरमृतस्य पत्नीः सूरो वर्णेन ततनन्नुषासः.. (१३) पूर्व आदि दिशाओं की सीमा, पदार्थज्ञान एवं रमणीय वस्तुएं क्या हैं? इन्हें हम उसी प्रकार प्राप्त करें, जिस प्रकार तेज दौड़ने वाला घोड़ा युद्धभूमि में पहुंच जाता है. प्रकाशयुक्त, मरणरहित, सूर्य का पालन करने वाली एवं जन्म देने वाली उषाएं हमें अपने प्रकाश से कब घेरेंगी? (१३) अनिरेण वचसा फल्गुवेन प्रतीत्येन कृधुनातृपासः. अधा ते अग्ने किमिहा वदन्त्यनायुधास आसता सचन्ताम्.. (१४) हे अग्नि! हव्य-अन्न से रहित स्तुतियों एवं अर्थहीन ओछे वचनों द्वारा अतृप्त लोग इस संसार में तुम्हारे विषय में जो कुछ कहते हैं, वह व्यर्थ है, हव्य-रूपी साधन के बिना वे लोग दुःख उठाते हैं. (१४) अस्य श्रिये समिधानस्य वृष्णो वसोरनीकं दम आ रुरोच. रुशद्वसानः सुदृशीकरूपः क्षितिर्न राया पुरुवारो अद्यौत्.. (१५) यजमान के कल्याण के निमित्त प्रज्वलित, कामवर्षी एवं निवास स्थान देने वाले अग्नि की ज्वालाएं यज्ञशाला की ओर चमकती हैं. तेजधारी, रमणीय बल वाले व अनेक यजमानों द्वारा स्तुत अग्नि इस प्रकार प्रकाशित होते हैं, जिस प्रकार अश्व आदि धन से राजा शोभा पाता है. (१५) सूक्त-६ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

ऊर्ध्व ऊ षु णो अध्वरस्य होतरग्ने तिष्ठ देवतात यजीयान्. त्वं हि विश्वमभ्यसि मन्म प्र वेधसश्चित्तिरसि मनीषाम्.. (१) हे यज्ञ के होता एवं यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ अग्नि! हमारे यज्ञों में तुम ऊंचे स्थान पर बैठो, शत्रुओं के समस्त धन पर अधिकार करो एवं यजमान की स्तुति को बढ़ाओ. (१) अमूरो होता न्यसादि विश्व१ग्निर्मन्द्रो विदथेषु प्रचेता:. ऊर्ध्वं भानुं सवितेवाश्रेन्मेतेव धूमं स्तभायदुप द्याम्.. (२) प्रगल्भ, यज्ञ पूर्ण करने वाले, हर्षित करने वाले एवं अधिक ज्ञान-युक्त अग्नि यज्ञों में प्रजाओं के साथ बैठते हैं, उदित सूर्य के समान ऊपर की ओर मुंह करते हैं एवं अपने धुएं को आकाश के ऊपर इस प्रकार स्थापित करते हैं, जिस प्रकार थूना अपने ऊपर बांस आदि को रखता है. (२) यता सुजूर्णी रातिनी घृताची प्रदक्षिणिद् देवतातिमुरान:. उदु स्वरुर्नवजा नाक्र: पश्वो अनक्ति सुधित: सुमेक:.. (३) भली प्रकार पकड़ी हुई और पुरानी घृताची (पात्र विशेष) घी से भरी हुई है. यज्ञ को बढ़ाने वाले अध्वर्यु प्रदक्षिणा कर रहे हैं. ताजा बनाया हुआ यूप ऊंचा उठता है. आक्रमण करने वाला एवं दीप्ति वाला कुठार भी पशुओं की ओर चलता है. (३) स्तीर्णे बर्हिषि समिधाने अग्ना ऊर्ध्वो अध्वर्युर्जुजुषाणो अस्थात्. पर्यग्नि: पशुपा न होता त्रिविष्ट्येति प्रदिव उराण:.. (४) वेदी पर कुश बिछ जाने एवं अग्नि के प्रज्वलित हो जाने पर अध्वर्यु उन्हें प्रसन्न करने के लिए उठता है. यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं पुरातन अग्नि थोड़े हव्य को भी बहुत बनाते हुए इस प्रकार तीन बार पशुओं की परिक्रमा करते हैं, जिस प्रकार पशुओं को पालने वाला. (४) परि त्मना मितद्रुरेति होताग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा. द्रवन्त्यस्य वाजिनो न शोका भयन्ते विश्वा भुवना यदभ्राट्.. (५) ये होता, प्रसन्न करने वाले, मधुरभाषी एवं यज्ञ के स्वामी अग्नि सीमित चाल से पशुओं के चारों ओर घूमते हैं. इनका प्रकाश घोड़े के समान चारों ओर भागता है. अग्नि के प्रज्वलित होने पर सभी प्राणी डर जाते हैं. (५) भद्रा ते अग्ने स्वनीक सन्दृग्घोरस्य सतो विषुणस्य चारु:. न यत्ते शोचिस्तमसा वरन्त न ध्वस्मानस्तन्वी३ रेप आ धु:.. (६) हे शोभन ज्वालाओं वाले, भयजनक एवं सर्वत्र व्याप्त अग्नि! तुम्हारी रमणीय एवं कल्याणी मूर्ति भली प्रकार दिखाई देती है. तुम्हारी दीप्ति को अंधकार नहीं रोक सकता एवं ebook converter DEMO Watermarks*

विध्वंसकारी राक्षस तुम्हारे शरीर में पाप का प्रवेश नहीं करा सकते. (६) न यस्य सातुर्जनितोरवारि न मातरापितरा नू चिदिष्टौ. अधा मित्रो न सुधितः पावकोऽ ग्निद्दीदाय मानुषीषु विक्षु.. (७) हे वर्षाकारक अग्नि! तुम्हारे पशु आदि दान को अन्य लोग नहीं रोक सकते. माता-पिता के समान धरती-आकाश भी तुम्हें प्रेरणा देने में समर्थ नहीं होते. भली प्रकार तृप्त एवं शुद्ध करने वाले अग्नि मानव प्रजाओं में मित्र के समान प्रकाशित होते हैं. (७) द्वियं पञ्च जीजन्त्संवसानाः स्वसारो अग्निं मानुषीषु विक्षु. उषर्बुधमथर्यो३ न दन्तं शुक्रं स्वासं परशुं न तिग्मम्.. (८) स्त्रियों के समान परस्पर मिली हुई मनुष्यों की दस उंगलियां मंथन द्वारा प्रातःकाल जागने वाले, हव्य-भक्षणकर्त्ता, किरणों द्वारा दीप्त, सुंदर मुख वाले एवं तेज परशु के समान राक्षसहननकर्त्ता अग्नि को उत्पन्न करती हैं. (८) तव त्ये अग्ने हरितो घृतस्ना रोहितास ऋज्वञ्चः स्वञ्चः. अरुषासो वृषण ऋजुमुष्का आ देवतातिमह्वन्त दस्माः.. (९) हे अग्नि! नाक के नथुनों से फेन गिराने वाले, लाल रंग वाले, सीधे चलने वाले, दीप्तिशाली, कामवर्षी, साधनयुक्त एवं सुंदर घोड़े ऋत्विजों द्वारा हमारे यज्ञ की ओर बुलाए जाते हैं. (९) ये ह त्ये ते सहमाना अयासस्त्वेषासो अग्ने अर्चयश्चरन्ति. श्येनासो न दुवसनासो अर्थं तुविष्वणसो मारुतं न शर्धः.. (१०) हे अग्नि! तुम्हारी शत्रुओं को पराजित करने वाली, गमनशील, दीप्त व सेवा करने योग्य किरणें घोड़ों के समान अपने गंतव्य स्थान पर जाती हैं एवं मरुतों के समान अधिक आवाज करती हैं. (१०) अकारि ब्रह्म समिधान तुभ्यं शंसात्युक्थं यजते व्यू धाः. होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्नमस्यन्त उशिजः शंसमायोः.. (११) हे प्रज्वलित अग्नि! तुम्हारे लिए हमने स्तोत्र बनाया है. उसी को होतागण बोलते हैं. यजमान तुम्हारे निमित्त यज्ञ करते हैं. इसलिए तुम हमें धन दो. ऋत्विज् मानवों द्वारा प्रशंसनीय व देवों को बुलाने वाले अग्नि की पूजा करने के लिए हम धन की कामना से बैठे हैं. (११) सूक्त-७ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः. यमप्रवानो भृगवी विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे.. (१) आप्रवान् एवं अन्य भृगुवंशी ऋषियों ने वनों में दावाग्निरूप से दर्शनीय एवं समस्त प्रजाओं के स्वामी अग्नि को प्रज्वलित किया था. वे ही देवों को बुलाने वाले, अतिशय यज्ञकर्त्ता, यज्ञों में ऋत्विजों द्वारा स्तुत्य एवं देवों में सर्वश्रेष्ठ अग्नि यज्ञकर्त्ताओं द्वारा स्थापित किए गए हैं. (१) अग्ने कदा त आनुषग्भुवद्देवस्य चेतनम्. अधा हि त्वा जगृभिरे मर्तासो विश्वीड्यम्.. (२) हे द्योतमान एवं मानवों द्वारा पूज्य अग्नि! तुम्हारा तेज कब गतिशील होगा? मनुष्य तुम्हें ग्रहण करते हैं. (२) ऋतावानं विचेतसं पश्यन्तो द्यामिव स्तृभिः. विश्वेषामध्वराणां हस्कर्तारं दमेदमे.. (३) मायारहित, विशिष्ट-ज्ञान वाले, तारों से भरे हुए आकाश के समान चिनगारियों से युक्त एवं समस्त यज्ञों की वृद्धि करने वाले अग्नि को देखते हुए ऋत्विजों ने उन्हें प्रत्येक यज्ञशाला में ग्रहण किया. (३) आशुं दूतं विवस्वतो विश्वा यश्चर्षणीरभि. आ जभ्रुः केतुमायवो भृगवाणं विशेविशे.. (४) मनुष्य समस्त प्रजाओं को पराजित करने वाले, तीव्रगति, यजमान के दूत, झंडे के समान ज्ञान कराने वाले एवं दीप्तिमान् अग्नि को सभी प्रजाओं के कल्याण के लिए लाते हैं. (४) तमीं होतारमानुषक्चिकित्वां सं नि षेदिरे. रण्वं पावकशोचिषं यजिष्ठं सप्त धामभिः.. (५) ऋत्विज् आदि मानवों ने प्रसिद्ध, क्रमशः देवों को बुलाने वाले, ज्ञानसंपन्न, रमणीय, पवित्र प्रकाश वाले, श्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता एवं सात तेजों से युक्त अग्नि को स्थापित किया था. (५) तं शश्वतीषु मातृषु वन आ वीतमश्रितम्. चित्रं सन्तं गुहा हितं सुवेदं कूचिदर्थिनम्.. (६) माता के समान जलसमूह में एवं वृक्षों में वर्तमान, सुंदर, जलने के डर से प्राणियों द्वारा असेवित, विचित्र, गुहा में छिपे हुए, शोभन धनयुक्त एवं सभी जगह हव्य की अभिलाषा करने वाले अग्नि को ऋत्विजों ने स्थापित किया था. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

ससस्य यद्वियुता सस्मिन्नूधन्नृतस्य धामन्रणयन्त देवाः. महाँ अग्निर् नमसा रातहव्यो वेरध्वराय सदमिदृतावा.. (७) देवगण प्रातःकाल नींद त्याग कर जल के कारणभूत यज्ञ में अग्नि को प्रसन्न करते हैं. महान्, नमस्कारपूर्वक हव्य दिए गए एवं सत्ययुक्त अग्नि सदा ही यजमानों के यज्ञों को जानें. (७) वेरध्वरस्य दूत्यानि विद्वानुभे अन्ता रोदसी सञ्चिकित्वान्. दूत ईयसे प्रदिव उराणो विदुष्टरो दिव आरोधनानि.. (८) हे विद्वान् यज्ञ के दूत, कार्यों को जानने वाले, धरती और आकाश के मध्य भाग से भली-भांति परिचित, पुरातन, थोड़े हव्य को अधिक करने में समर्थ, अतिशय विद्वान् एव देवों के दूत अग्नि! तुम देवों को हवि देने के लिए स्वर्ग की सीढ़ियों पर चढ़ते हो. (८) कृष्णं त एम रुशतः पुरो भाश्श्वरिष्व१ञ्चिर्वपुषामिदेकम्. यदप्रवीता दधते ह गर्भं सद्यश्चिज्जातो भवसीदु दूतः.. (९) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम्हारा गमन मार्ग काला है, तुम्हारे आगे-आगे चलता है एवं तुम्हारा गतिशील तेज रूपशालियों में सर्वोत्तम है. यजमान तुम्हें न पाकर तुम्हारी उत्पत्ति में कारण काष्ठ को रखते हैं. इसके बाद तुम शीघ्र उत्पन्न होकर यजमान के दूत बनते हो. (९) सद्यो जातस्य ददृशानमोजो यदस्य वातो अनुवाति शोचिः. वृणक्ति तिग्मामतसेषु जिह्वां स्थिरा चिदन्ना दयते वि जम्भैः.. (१०) अरणिमंथन के पश्चात् उत्पन्न अग्नि का तेज ऋत्विजों को दिखाई देता है. जब अग्नि की लपटों को लक्ष्य करके हवा चलती है तो अग्नि अपनी ज्वाला को वृक्षों से मिला देते हैं एवं स्थिर काष्ठों को अपने तेज से जला देते हैं. (१०) तृषु यदन्ना तृषुणा ववक्ष तृषं दूतं कृणुते यह्वो अग्निः. वातस्य मेळिं सचते निजूर्वन्नाशुं न वाजयते हिन्वे अर्वा.. (११) अग्नि अपनी लपटों द्वारा लकड़ियों को शीघ्र ही जला देते हैं. महान् अग्नि स्वयं को तेज चलने वाला दूत बनाते हैं एवं लकड़ियों को विशेष रूप से जलाते हुए वायु की शक्ति से सहायता लेते हैं. जिस प्रकार सवार घोड़े को शक्तिशाली बनाता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी किरणों को बलयुक्त करते हैं. (११) सूक्त-८ देवता—अग्नि दूतं वो विश्ववेदसं हव्यवाहममर्त्यम्. यजिष्ठमृञ्जसे गिरा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हम स्तुति द्वारा समस्त धनों के स्वामी, देवों को हवि पहुंचाने वाले, मरणरहित, अतिशय यज्ञपात्र एवं देवदूत अग्नि को बढ़ाते हैं. (१) स हि वेदा वसुधितिं महाँ आरोधनं दिवः. स देवाँ एह वक्षति.. (२) वे महान् अग्नि यजमान के धन का दान हैं एवं स्वर्ग की सीढ़ियों को जानते हैं. वे देवों को इस यज्ञ में लावें. (२) स वेद देव आनमं देवाँ ऋतायते दमे. दाति प्रियाणि चिद्धसु.. (३) वे तेजयुक्त अग्नि यजमानों से क्रमशः देवों के प्रति नमस्कार कराना जानते हैं एवं यज्ञशाला में यजमान को प्रिय धन देते हैं. (३) स होता सेदु दूत्यं चिकित्वाँ अन्तरीयते. विद्वाँ आरोधनं दिवः.. (४) देवों का आह्वान करने वाले अग्नि दूतकर्म एवं स्वर्ग की सीढ़ियों को जानकर धरती- आकाश के मध्य में चलते हैं. (४) ते स्याम ये अग्नये ददाशुर्हव्यदातिभिः. य ईं पुष्यन्त इन्धते.. (५) जो यजमान अग्नि को हव्य देकर प्रसन्न करते हैं, बढ़ाते हैं एवं समिधाओं द्वारा प्रज्वलित करते हैं, हम उन्हीं के समान बनें. (५) ते राया ते सुवीर्यैः ससवांसो वि शृण्विरे. ये अग्ना दधिरे दुवः.. (६) जो यजमान अग्नि की सेवा करते हैं, वे अग्नि की सेवा से धन पाकर एवं प्रसिद्ध पुत्र- पौत्रादि द्वारा प्रसिद्ध बनते हैं. (६) अस्मे रायो दिवेदिवे सं चरन्तु पुरुस्पृहः. अस्मे वाजास ईरताम्.. (७) ऋत्विज् आदि द्वारा चाहा गया धन प्रतिदिन हम यजमानों के समीप आवे एवं अन्न हमें यज्ञ की प्रेरणा दे. (७) स विप्रश्चर्षणीनां शवसा मानुषाणाम्. अति क्षिप्रेव विध्यति.. (८) मेधावी अग्नि अपनी शक्ति द्वारा मानव प्रजाओं के नष्ट करने योग्य पाप सर्वथा नष्ट करते हैं. (८) सूक्त-९ देवता—अग्नि अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम्. इयेथ बर्हिरासदम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे महान् अग्नि! हम लोगों को सुखी करो एवं देवों की अभिलाषा करने वाले यजमान के पास कुश पर बैठने के लिए आओ. (१) स मानुषीषु दूळभो विक्षु प्रावीरमर्त्य:. दूतो विश्वेषां भुवत्.. (२) राक्षसों आदि द्वारा अहिंसित, मानव प्रजाओं में भली प्रकार गमन करने वाले एवं मरणरहित अग्नि सब देवों के दूत बनें. (२) स सद्म परि णीयते होता मन्द्रो दिविष्टिषु. उत पोता नि षीदति.. (३) ऋत्विजों द्वारा यज्ञशाला में लाए गए अग्नि यज्ञों में प्रशंसनीय होता बनते हैं अथवा पोता बनकर बैठते हैं. (३) उत ग्ना अग्निरध्वर उतो गृहपतिर्दमे. उत ब्रह्मा नि षीदति.. (४) वे अग्नि यज्ञ में देवपत्नी, अध्वर्यु, गृहपति अथवा ब्रह्मा बनकर बैठते हैं. (४) वेषि ह्यध्वरीयतामुपवक्ता जनानाम्. हव्या च मानुषाणाम्.. (५) हे अग्नि! तुम यज्ञ करने के इच्छुक लोगों का हव्य चाहते हो एवं यज्ञकर्म के उपवक्ता हो. (५) वेषीद्ध्यस्य दूत्यं१ यस्य जुजोषो अध्वरम्. हव्यं मर्तस्य वोळ्हवे.. (६) हे अग्नि! तुम जिस यजमान के यज्ञ में हव्य वहन करने का काम स्वीकार कर लेते हो, उसका दूतकर्म करने की भी अभिलाषा करते हो. (६) अस्माकं जोष्यध्वरमस्माकं यज्ञमङ्गिर:. अस्माकं शृणुधी हवम्.. (७) हे अंगिरा अग्नि! तुम हमारे यज्ञ की सेवा करो, हमारे हवि को स्वीकार करो तथा हमारे स्तोत्र को सुनो. (७) परि ते दूळभो रथोऽस्माँ अश्रोतु विश्वतः. येन रक्षसि दाशुषः.. (८) हे अग्नि! तुम जिस रथ की सहायता से सभी दिशाओं में जाकर हव्य देने वाले यजमान की रक्षा करते हो, तुम्हारा वही दुर्लभ रथ मेरे चारों ओर रहे. (८) सूक्त-१० देवता—अग्नि अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्. ऋध्यामा त ओहैः.. (१) हे अग्नि! हम ऋत्विज् इंद्र आदि देवों को प्राप्त करने वाली स्तुतियों द्वारा अश्व के ebook converter DEMO Watermarks*

समान ढोने वाले, यज्ञकर्त्ता के समान उपकारक, भद्र एवं प्रिय तुमको बढ़ाते हैं. (१) अधा ह्याग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः. रथीर्ऋतस्य बृहतो बभूथ.. (२) हे अग्नि! तुम इसी समय हमारे भद्र, बढ़े हुए, मनचाहे फल देने वाले, सत्य एवं महान् यज्ञ के नेता हो. (२) एभिर्नो अर्कैर्भवा नो अर्वाङ्स्व१र्ण ज्योतिः. अग्ने विश्वेभिः सुमना अनीकैः.. (३) हे सूर्य के समान तेजस्वी तथा समस्त तेजयुक्त व शोभन गमन वाले अग्नि! तुम हमारे इन पूजनीय स्तोत्रों द्वारा हमारे सामने आओ. (३) आभिष्टे अद्य गीर्भिर्गृणन्तोऽग्ने दाशेम. प्र ते दिवो न स्तनयन्ति शुष्माः.. (४) हे अग्नि! हम आज इन स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करते हुए तुम्हें हवि देंगे. तुम्हारी शुद्ध करने वाली ज्वालाएं सूर्य की किरणों के समान शब्द करती हैं. (४) तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिरिदा चिदह्न इदा चिदक्तोः. श्रिये रुक्मो न रोचत उपाके.. (५) हे अग्नि! तुम्हारा प्रियतम प्रकाश रात-दिन अलंकार के समान पदार्थों के समीप आकर शोभा पाता है. (५) घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यम्. तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः.. (६) हे अन्न के स्वामी अग्नि! तुम्हारा शरीर शुद्ध घृत के समान पापरहित है. तुम्हारा शुद्ध एवं रमणीय तेज अलंकार के समान चमकता है. (६) कृतं चिद्धि ष्मा सनेमि द्वेषोऽग्न इनोषि मर्तात्. इत्था यजमानादृतावः.. (७) हे सत्ययुक्त अग्नि! यजमानों द्वारा उत्पन्न होने पर भी चिरंतन तुम निश्चय ही यजमान के पापों को नष्ट करते हो. (७) शिवा नः सख्या सन्तु भ्रात्राग्ने देवेषु युष्मे. सा नो नाभिः सदने सस्मिन्नूधन्.. (८) हे द्योतमान अग्नि! तुम्हारे प्रति हमारी मित्रता एवं बंधुत्व भाव कल्याणकारी हो. यह भावना देवस्थानों एवं समस्त यज्ञों में हमारा आधार हो. (८) सूक्त-११ देवता—अग्नि भद्रं ते अग्ने सहसिन्ननीकमुपाक आ रोचते सूर्यस्य. रुशद्दृशे ददृशे नक्तया चिदरूक्षितं दृश आ रूपे अन्नम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारा प्रिय तेज दिन के समय चारों ओर प्रकाशित होता है. तुम्हारा प्रकाशयुक्त एवं दर्शनीय तेज रात में भी दिखाई देता है. हे रूपवान् अग्नि! ऋत्विज् आदि तुम में चिकना एवं सुंदर अन्न डालते हैं. (१) वि षाह्यग्ने गृणते मनीषां खं वेपसा तुविजात स्तवानः. विश्वेभिर्यद्द्वावनः शुक्र देवैस्तन्नो रास्व सुमहो भूरि मन्म.. (२) हे अनेक बार जन्म लेने वाले एवं ऋत्विजों द्वारा स्तुत अग्नि! यज्ञकर्म के द्वारा स्तुति करने वाले यजमान के लिए तुम पुण्यलोक के द्वार खोलो. हे दीप्यमान एवं शोभन तेज वाले अग्नि! देवों के साथ मिलकर तुम यजमान को जो धन देते हो, वही अधिक एवं उत्तम धन हमें दो. (२) त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि. त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्याधिये दाशुषे मर्त्याय.. (३) हे अग्नि! हव्यवहन और देवों को बुलाने का काम, स्तुतिरूपी वचन एवं पूजा करने योग्य उक्थ तुम ही से उत्पन्न होते हैं. सत्यकर्म वाले एवं हव्य दान करने वाले यजमान के लिए विक्रांत रूप एवं धन तुमसे ही निकलता है. (३) त्वद्वाजी वाजम्भरो विहाया अभिष्टिकृज्जायते सत्यशुष्मः. त्वद्रयिर्देवजूतो मयोभुस्त्वदाशुर्जूर्जुवाँ अग्ने अर्वा.. (४) हे अग्नि! तुमसे बलवान्, हव्य अन्न वहन करने वाला, महान् यज्ञकर्त्ता एवं सच्ची शक्ति से युक्त पुत्र उत्पन्न होता है. देवों द्वारा प्रेरित एवं सुख देने वाला धन एवं शीघ्रगामी तथा वेगशाली अश्व भी तुम्हीं से उत्पन्न होता है. (४) त्वामग्ने प्रथमं देवयन्तो देवं मर्त अमृत मन्द्रजिह्वम्. द्वेषोयुतमा विवासन्ति धीभिर्द्मूनसं गृहपतिममूरम्.. (५) हे मरणरहित देवों में प्रथम, प्रकाशयुक्त, देवों को प्रसन्न करने वाली जिह्वा वाले, पाप दूर करने वाले, राक्षसदमनकारी मन से युक्त, गृहपति एवं प्रगल्भ अग्नि! देवों की कामना करने वाले यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारी भली प्रकार सेवा करते हैं. (५) आरे अस्मदमतिमारे अंह आरे विश्वां दुर्मतिं यन्निपासि. दोषा शिवः सहसः सूनो अग्ने यं देव आ चित्सचसे स्वस्ति.. (६) हे बलपुत्र, रात्रि में कल्याणकारी एवं द्योतमान अग्नि! तुम कल्याण करने के लिए हमारी सेवा करते हो. तुम अमति, पाप और दुर्मति को हमारे पास से दूर करो. (६) सूक्त—१२ देवता—अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

यस्त्वामग्न इन्धते यतस्रुक्तिरस्ते अन्नं कृणवत्समिन्नहन्. स सु द्युम्नैरभ्यस्तु प्रसक्तव क्रत्वा जातवेदश्चिकित्वान्.. (१) हे अग्नि! जो यजमान स्रुच उठाकर तुम्हें प्रज्वलित करता है एवं दिन में तीन बार तुम्हें हव्य अन्न देता है, हे जातवेद! वह तुम्हें संतुष्ट करने वाले ईंधन आदि से बढ़ते हुए तुम्हारे तेज को जानता हुआ धन द्वारा शत्रुओं को पूरी तरह हरावे. (१) इध्मं यस्ते जभरच्छश्रमाणो महो अग्ने अनीकमा सपर्यन्. स इधानः प्रति दोषामुषासं पुष्यन्रयिं सचते घ्नन्नमित्रान्.. (२) हे महान् अग्नि! जो व्यक्ति तुम्हारे लिए ईंधन लाता है तथा लकड़ी ढोने से थककर महान् तेज की सेवा करता हुआ रात और दिन के समय तुम्हें प्रज्वलित करता है, वह संतान एवं पशुओं से पुष्ट होकर शत्रुओं का नाश करता हुआ धन प्राप्त करता है. (२) अग्निरीशे बृहतः क्षत्रियस्याग्निर्वाजस्य परमस्य रायः. दधाति रत्नं विधते यविष्ठो व्यानुषङ्मर्त्याय स्वधावान्.. (३) अग्नि महान् बल, उत्कृष्ट अन्न एवं पशु आदि धन के स्वामी हैं. अतिशय युवा एवं अन्नयुक्त अग्नि अपनी सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन देते हैं. (३) यच्चिद्धि ते पुरुषत्रा यविष्ठाचित्तिभिश्चकृमा कच्चिदागः. कृधी ष्व१स्माँ अदितेरनागान्व्येनांसि शिश्रथो विष्वगग्ने.. (४) हे अतिशय युवा अग्नि! यद्यपि हम अज्ञान के कारण तुम्हारी सेवा करने वालों के प्रति कुछ पाप करते हैं, फिर भी तुम हमें धरती पर पापरहित बनाओ. चारों ओर फैले हुए हमारे पापों को ढीला करो. (४) महश्चिदग्न एनसो अभीक ऊर्वद्देवानामुत मर्त्यानाम्. मा ते सखायः सदमिद्रिषाम यच्छा तोकाय तनयाय शं योः.. (५) हे अग्नि! तुम्हारे सखारूप हमने देवों अथवा मनुष्यों के प्रति जो महान् एवं विस्तृत पाप किया है, उससे हम कभी पीड़ित न हों. तुम हमारे पुत्रों और पौत्रों के लिए शांति एवं सुख दो. (५) यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः. एवो ष्व१स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः.. (६) हे पूजा के योग्य एवं निवास देने वाले अग्नि! जिस प्रकार तुमने बंधे हुए पैरों वाली गौरी नामक गाय को छुड़ाया था, उसी प्रकार हमें पाप से छुड़ा लो. हे अग्नि! अपने द्वारा बढ़ाई हुई हमारी आयु को और अधिक बढ़ाओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१३ देवता—अग्नि

सूक्त—१३ देवता—अग्नि प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यद्विभातीनां सुमना रत्नधेयम्. यातमश्विना सुकृतो दुरोणमुत्सूर्यो ज्योतिषा देव एति.. (१) शोभन मन वाले अग्नि अंधकार-विनाशिनी उषा का मनोहर प्रकाश फैलने के समय से पहले ही बढ़ने लगते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमान के घर जाओ. सूर्य देव प्रकाश के साथ आ रहे हैं. (१) ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्दृप्सं दविध्वद्गविषो न सत्वा. अनु व्रतं वरुणो यन्ति मित्रो यत्सूर्यं दिव्यारोहयन्ति.. (२) सविता देव ऊपर जाने वाली किरणों का सहारा लेते हैं. किरणें जब सूर्य को आकाश पर चढ़ाती हैं, तब वरुण, मित्र एवं अन्य देव अपने कर्म इस प्रकार प्रारंभ करते हैं, जैसे धूल उड़ाता हुआ बैल गायों के पीछे चलता है. (२) यं सीमकृण्वन्तमसे विपूचे ध्रुवक्षेमा अनवस्यन्तो अर्थम्. तं सूर्यं हरितः सप्त यह्वीः स्पशं विश्वस्य जगतो वहन्ति.. (३) सृष्टि करने वाले देवों ने संसार का कार्य न त्याग कर अंधकार को सभी प्रकार से दूर करने के निमित्त जिस सूर्य को बनाया, हरि नामक सात महान् घोड़े समस्त प्राणियों को जानने वाले उस सूर्य को ढोते हैं. (३) वहिष्ठेभिर्विहरन्यासि तन्तुमवव्ययन्नसितं देव वस्म. दविध्वतो रश्मयः सूर्यस्य चर्मेवावाधुस्तमो अप्स्व१न्तः.. (४) हे सूर्य देव! तुम विश्व का निर्वाह करने वाला रस ग्रहण करने के लिए अपनी किरणें फैलाते हुए एवं काले रंग की रात को नष्ट करते हुए अपने अत्यंत वेगवान् घोड़ों के सहारे चलते हो. सूर्य की कांपती हुई किरणें आकाश के मध्य चमड़े के समान फैले हुए अंधकार को नष्ट करती हैं. (४) अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न. कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्.. (५) पास में रहने वाले, बंधनरहित एवं अधोमुख सूर्य को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता. ऊर्ध्वमुख सूर्य किस शक्ति से चलते हैं? आकाश में खंभे के समान सूर्य स्वर्ग का पालन करते हैं, इसे किसने देखा है? (५) सूक्त—१४ देवता—अग्नि आदि