भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 669, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 669

करो. हे सबके द्वारा वरण करने योग्य, पुरातन, युवती एवं बहुतों द्वारा स्तुत उषा! तुम यज्ञकर्म के अनुसार चलती हो. (१) उषो देव्यमर्त्या वि भाहि चन्द्ररथा सूनृता ईरयन्ती. आ त्वा वहन्तु सुयमासो अश्वा हिरण्यवर्णां पृथुपाजसो ये.. (२) हे मरणरहित, सोने के रथ वाली, प्रिय एवं सत्य वाणी बोलती हुई उषा! तुम सूर्यकिरणों से प्रकाशित बनो. महान् बलशाली, लाल रंग वाले एवं रथ में सरलता से जोड़ने योग्य घोड़े तुझ सुनहरे रंग वाली को बुलावें. (२) उषः प्रतीची भुवनानि विश्वोर्ध्वा तिष्ठस्यमृतस्य केतुः. समानमर्थं चरणीयमाना चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्व.. (३) हे समस्त प्राणियों के सामने आनेवाली एवं मरणरहित सूर्य का ज्ञान कराने वाली उषा! तुम आकाश में ऊंची ठहरती हो. हे अति नवीन उषा! एक ही मार्ग में चलने की इच्छुक तुम बार-बार उसी मार्ग में इस तरह चलो जैसे आकाश में सूर्य का पहिया एक ही मार्ग पर चलता है. (३) अव स्यूमेव चिन्वती मघोन्युषा याति स्वसरस्य पत्नी. स्वर्जनन्ती सुभगा सुदंसा आन्ताद्दिवः पप्रथ आ पृथिव्याः.. (४) धन की स्वामिनी उषा कपड़े के समान फैले अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य की पत्नी बनकर चलती है. अपना तेज उत्पन्न करती हुई, शोभन-धन वाली एवं अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों से युक्त उषा आकाश ओर धरती के अंत तक प्रकाशित होती है. (४) अच्छा वो देवीमुषसं विभातीं प्र वो भरध्वं नमसा सुवृक्तिम्. ऊर्ध्वं मधुधा दिवि पाजो अश्रेत्प्र रोचना रुरुचे रण्वसन्दृक्.. (५) हे स्तोताओ! तुम अपने सामने शोभन पाती हुई उषा की सुंदर स्तुति नमस्कार सहित करो. स्तुति धारण वाली उषा आकाश में ऊपर जाने वाला तेज धारण करती है. तेजस्विनी एवं देखने में सुंदर उषा अच्छी तरह चमकती है. (५) ऋतावरी दिवो अर्कैर्बोध्या रेवती रोदसी चित्रमस्थात्. आयतीमग्न उषसं विभातीं वाममेषि द्रविणं भिक्षमाणः.. (६) सत्ययुक्त उषा को दिव्य तेज के कारण सब जानते हैं. धनवाली उषा अपने विविध रूपों से धरती-आकाश को भर देती है. हे अग्नि! तुम्हारे सामने आती हुई एवं प्रकाशयुक्त उषा से मांगते हुए तुम सुंदर धन पाते हो. (६) ऋतस्य बुध्न उषसामिषण्यन्वृषा मही रोदसी आ विवेश. ebook converter DEMO Watermarks*