भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 468

आता. (१) तस्मिन्ना वेशया गिरो य एकश्चर्षणीनाम्. अनु स्वधा यमुप्यते यवं न चर्कृषद्वृषा.. (२) हे होता! अपनी स्तुतिरूपी वाणी को इंद्र में स्थापित करो. वे ज्ञान वाले मनुष्यों के एकमात्र आश्रय हैं. स्वधा शब्द के बाद उन्हें भी हव्य अन्न दिया जाता है. किसान जिस प्रकार पके जौ को ग्रहण करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारा हव्य स्वीकार करते हैं. (२) यस्य विश्वानि हस्तयोः पञ्च क्षितीनां वसु. स्पाशयस्व यो अस्मध्रुग्दिव्येनाशनिर्जहि.. (३) जिन इंद्र के हाथों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद पांचों प्रकार के जनों को प्रसन्न करने वाला सभी प्रकार का अन्न है, वे इंद्र हमसे द्रोह करने वाले को वज्र बनकर नष्ट करें. (३) असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न ते मयः. अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते.. (४) हे इंद्र! सोमरस न निचोड़ने वालों, दुःसाध्य विनाश वालों एवं सुख न पहुंचाने वालों का नाश करो. ऐसे लोगों का धन हमें दो. तुम्हारा स्तोता ही धन पाता है. (४) आवो यस्य द्विबर्हसोऽर्केषु सानुषगसत्. आजाविन्द्रस्येन्दो प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (५) हे सोम! उस यजमान की रक्षा करो, जिसके स्तोत्र और हव्य संबंधी मंत्रों में तुम सदा स्थित रहते हो. हे सोम! धन के लिए होने वाले युद्धों में अन्न के स्वामी इंद्र की रक्षा करो. (५) यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयइवापो न तृष्यते बभूथ. तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार जल प्यासे को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुमने प्राचीन स्तुतिकर्त्ता पर कृपा की थी. इसीलिए मैं तुम्हारी सुखदायक स्तुति बार-बार कर रहा हूं. मैं अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करूं. (६) सूक्त—१७७ देवता—इंद्र आ चर्षणिप्रा वृषभो जनानां राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः. स्तुतः श्रवस्यन्नवसोप मद्रिग्र्युक्त्वा हरी वृषणा याह्यर्वाङ्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*