ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 769, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओं की हिंसा से बचकर उनके पीछे चलें. (३) शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम्. शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय.. (४) हमारे बैल सुखपूर्वक भार वहन करें, सेवकगण सुखपूर्वक खेती का काम करें, हमारे हल सुखपूर्वक धरती जोतें, हमारी रस्सियां सुखपूर्वक बांधी जावें एवं पशुओं को हांकने वाला चाबुक सुखपूर्वक चलाया जावे. (४) शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यदिवि चक्रथुः पयः. तेनेमामुप सिञ्चतम्.. (५) हे शुन एवं सीर! तुम हमारी स्तुति को स्वीकार करो. तुमने आकाश में जिस जल का निर्माण किया था, उसीसे तुम इस धरती को सींचो. (५) अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा. यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि.. (६) हे सौभाग्यवती सीता अर्थात् हल की नोक! तुम धरती के नीचे जाओ. हम तुम्हारी वंदना करते हैं, जिससे तुम हमें शोभन फल एवं शोभन धन प्रदान करो. (६) इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषानु यच्छतु. सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्.. (७) इंद्र सीता को ग्रहण करें एवं पूषा उसकी रक्षा करें. धरती जलपूर्ण बनकर हमें आने वाले वर्षों में फसलें दें. (७) शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहैः. शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्.. (८) हमारे फाल सुखपूर्वक धरती को जोतें. हलवाहे बैलों के साथ भी सुखपूर्वक चलें. बादल मधुर जल से धरती को सींचें. हे शुन एवं सीर! हमें सुख दो. (८) सूक्त—५८ देवता—अग्नि आदि समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारदुपांशुना सममृतत्वमानट्. घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानांममृतस्य नाभिः.. (१) गायों के थन से दूध की मधु भरी धाराएं निकलती हैं. मनुष्य उनके कारण मरणरहित बनते हैं. घृत का नाम रक्षणीय इसीलिए है कि वह देवों की जीभ एवं अमृत का केंद्र है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*