भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 761, कुल 1855 में से

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चमकती हैं. (३) उच्चन्तीरद्य चितयन्त भोजानाधोदेयायोषसो मघोनीः. अचित्रे अन्तः पणयः ससन्त्वबुध्यमानास्तमसो विमध्ये.. (३) आज अंधकार का नाश करती हुईं एवं धन की स्वामिनी उषाएं भोजन देने वाले यजमानों को सोमरस आदि दान करने के हेतु उत्साहित करती हैं. चेतनारहित गाढ़े अंधकार में दान न देने वाले पणि लोग चेतनारहित होकर पड़े रहे. (३) कुवित्स देवीः सनयो नवो वा यामो बभूयादुषसो वो अद्य. येना नवग्वे अङ्गिरे दशग्वे सप्तास्ये रेवती रेवदूष.. (४) हे प्रकाशयुक्त एवं धनशालिनी उषाओ! तुम्हारा वही पुराना या नया रथ आज यज्ञ में अनेक बार आवे, जिस रथ के द्वारा तुमने सात छंदरूप मुख वाले, नौ गायों अथवा दस गायों वाले अंगिरावंशीय ऋषियों को दीप्त किया था. (४) यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः. प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम्.. (५) दे दीप्तियुक्त उषाओ! तुम सोते हुए मनुष्य एवं पशुरूप जीवों को गमन के लिए जगाती हुई यज्ञ में जाने वाले घोड़ों की सहायता से सारे विश्व का तुरंत भ्रमण कर लो. (५) क्व स्विदासाम् कतमा पुराणी यया विधाना विदधुर्ऋभूणाम्. शुभं यच्छुभ्रा उषसश्चरन्ति न वि ज्ञायन्ते सदृशीरजुर्याः.. (६) वे प्राचीन उषाएं कहां हैं, जिनके लिए ऋभुओं ने चमस बनाने का काम किया था? जब तेजोविशिष्ट उषाएं प्रकाश फैलाती हैं, तब एक समान होने के कारण वे नई या पुरानी नहीं जान पड़तीं. (६) ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः. यास्वीजानः शशमान उक्थैः स्तुवञ्छंसन्द्रविणं सद्य आप.. (७) अपने आगमन मात्र से धन देने वाली, यज्ञ के निमित्त एवं सत्व फल देने वाली उषाएं कल्याणकारीरूप में पहले उत्पन्न हुई थीं। यज्ञ करने वाले मंत्रों द्वारा उन उषाओं की स्तुतियां करके एवं छंदों द्वारा प्रशंसा करके तुरंत धन लाभ करते थे. (७) ता आ चरन्ति समना पुरस्तात्समानतः समना पप्रथानाः. ऋतस्य देवीः सदसो बुधाना गवां न सर्गा उषसो जरन्ते.. (८) सर्वत्र समान एवं प्रसिद्ध उषाएं पूर्व दिशा में केवल आकाश से सब जगह घूमती हैं एवं ebook converter DEMO Watermarks*