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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव

उक्थभृतं सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत्प्र वदात्यग्रे. उपैनमाध्वं सुमनस्यमाना आ वो गच्छाति प्रतृदो वसिष्ठः.. (१४) हे तृत्सुओ! वसिष्ठ तुम्हारे पास आ रहे हैं. तुम प्रसन्नचित होकर उनकी पूजा करना. वसिष्ठ सबसे आगे रहकर मंत्रसमूह एवं सोम को धारण करते हैं. पत्थरों द्वारा सोम कूटने वाले अध्वर्यु को धारण करते हैं एवं कर्त्तव्य बताते हैं. (१४) सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव प्र शुक्रैतु देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी.. (१) दीप्त व सब अभिलाषाओं को देने वाली स्तुति वेगशाली एवं सुसंस्कृत रथ के समान हमारे पास से देवों के पास जावे. (१) विदुः पृथिव्या दिवो जनित्रं शृण्वन्त्यापो अध क्षरन्तीः.. (२) बहने वाला जल स्वर्ग और धरती दोनों की उत्पत्ति जानता है एवं स्तुतियां सुनता है. (२) आपश्चिदस्मै पिन्वन्त पृथ्वीर्वृत्रेषु शूरा मंसन्त उग्राः.. (३) विस्तृत जल इन इंद्र को तृप्त करते हैं. शत्रुबाधा होने पर उग्र एवं शूर लोग इंद्र की स्तुति करते हैं. (३) आ धूर्ष्वस्मै दधाताश्वानिन्द्रो न वज्री हिरण्यबाहुः.. (४) इंद्र के आगमन के लिए घोड़ों को रथ के आगे जोड़ो. इंद्र वज्रधारी एवं सोने के हाथों वाले हैं. (४) अभि प्र स्थाताहेव यज्ञं यातेव पत्मन्त्मना हिनोत.. (५) हे मनुष्यो! यज्ञ के सामने जाओ एवं यात्री के समान यज्ञमार्ग पर स्वयं ही चलो. (५) त्मना समत्सु हिनोत यज्ञं दधात केतुं जनाय वीरम्.. (६) हे सेवको! युद्धों में अपने आप जाओ. लोगों को ज्ञान कराने वाले एवं पापनाशक यज्ञों को धारण करो. (६) उदस्य शुष्माद्भानुर्नार्त बिभर्ति भरं पृथिवी न भूम.. (७) इस यज्ञ के बल के कारण ही सूर्य उदित होता है. धरती जिस प्रकार प्राणियों का भार वहन करती है, उसी प्रकार यज्ञ भी करता है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

ह्वयामि देवाँ अयातुरग्ने साधन्नृतेन धियं दधामि.. (८) हे अग्नि! मैं अहिंसादि नियमों से युक्त यज्ञ द्वारा अपनी अभिलाषाएं पूर्ण करता हुआ देवों को बुलाता हूं एवं उनके निमित्त यज्ञकर्म करता हूं. (८) अभि वो देवीं धियं दधिध्वं प्र वो देवत्रा वाचं कृणुध्वम्.. (९) हे मनुष्यो! तुम भी देवों को लक्ष्य करके उज्ज्वल कर्म करो एवं देवों से संबंधित स्तुतिवचन बोलो. (९) आ चष्ट आसां पाथो नदीनां वरुण उग्रः सहस्रचक्षाः.. (१०) उग्र एवं हजार आंखों वाले वरुण इन नदियों का जल देखते हैं. (१०) राजा राष्ट्रानां पेशो नदीनामनुत्तमस्मै क्षत्रं विश्वायु.. (११) वरुण राष्ट्रों के राजा एवं नदियों को रूप देने वाले हैं. इनका बल बाधारहित एवं सर्वत्र जाने वाला है. (११) अविष्टो अस्मान्विश्वासु विश्वधृं कृणोत शंसं निनित्सोः .. (१२) हे देवो! समस्त प्रजाओं में हमारी रक्षा करो एवं हमारी निंदा के इच्छुक व्यक्ति को तेजहीन बनाओ. (१२) व्येतु दिद्युद् द्विषामशेवा युयोत विश्वग्रपस्तनूताम्.. (१३) शत्रुओं के असुखकारी आयुध सब ओर हट जावें. हे देवो! शरीर का पाप हमसे दूर करो. (१३) अवीन्नो अग्निर्हव्यान्रमोभिः प्रेष्ठो अस्मा अधायि स्तोमः.. (१४) हव्य भक्षण करने वाले अग्नि हमारे नमस्कारों से अधिक प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करें. हम अग्नि की स्तुतियां करते हैं. (१४) सजूर्देवेभिरपां नपातं सखायं कृध्वं शिवो नो अस्तु.. (१५) हे स्तोताओ! जल के पुत्र अग्नि को देवों के साथ अपना मित्र बनाओ. वे हमारे लिए कल्याणकारी हों. (१५) अब्जामुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन्.. (१६) जल से उत्पन्न, नदियों के जल में स्थित और जल के पुत्र अग्नि की स्तुति मंत्रों द्वारा की जाती है. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

मा नोऽहर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः.. (१७) अग्नि हमें हिंसक के हाथ में न सौंपे. यज्ञ की कामना करने वाले का यज्ञ क्षीण न हो. (१७) उत न एषु नृषु श्रवो धुः प्र राये यन्तु शर्धन्तो अर्यः.. (१८) देवगण हमारे मनुष्यों के लिए अन्नधारण करें एवं धन के लिए उत्साहित शत्रु मर जावें. (१८) तपन्ति शत्रुं स्वर्णि भूमा महासेनासो अमेभिरेषाम्.. (१९) जैसे सूर्य धरती को तप्त करता है, उसी प्रकार विशाल सेना वाले राजा देवों के बल से अपने शत्रु को बाधा पहुंचाते हैं. (१९) आ यन्नः पत्नीर्गमन्त्यच्छा त्वष्टा सुपाणिर्दधातु वीरान्.. (२०) जब देवपत्नियां हमारे सामने आती हैं, तब शोभनहाथ वाले त्वष्टा हमें पुत्र दें. (२०) प्रति नः स्तोमं त्वष्टा जुषेत स्यादस्मे अरमतिर्वसूह्युः.. (२१) त्वष्टा हमारे स्तोत्रों को स्वीकार करें. पर्याप्त बुद्धि वाले त्वष्टा हमें धन देने के इच्छुक हों. (२१) ता नो रासन्नातिषाचो वसून्या रोदसी वरुणानी शृणोतु. वरूत्रीभिः सुशरणो नो अस्तु त्वष्टा सुदत्रो वि दधातु रायः.. (२२) दान देने में कुशल देवपत्नियां हमें धन दें. द्यावा-पृथिवी और वरुणपत्नी हमारा स्तोत्र सुनें. कल्याण देने वाले त्वष्टा उपद्रवों का निवारण करने वाली देवपत्नियों के साथ हमारे लिए शरण बनें एवं हमें धन दें. (२२) तन्नो रायः पर्वतास्तन्न आपस्तद्रातिषाच ओषधीरुत द्यौः. वनस्पतिभिः पृथिवी सजोषा उभे रोदसी परि पासतो नः.. (२३) पर्वत समूह, समस्त जल, दानकुशल देवपत्नियां, ओषधियां एवं स्वर्ग हमारे उस धन का पालन करें. द्यावा-पृथिवी हमारी रक्षा करें. (२३) अनु तदुर्वी रोदसी जिहातामनु द्युक्षो वरुण इन्द्रसखा. अनु विश्वे मरुतो ये सहासो रायः स्याम धरुणं धियध्यै.. (२४) हम धारण करने योग्य धन के पात्र हों. विस्तृत द्यावा-पृथिवी दीप्ति के निवास इंद्र, इंद्र के मित्र वरुण एवं शत्रु का पराभव करने वाले मरुद्गण हमारा अनुगमन करें. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३५        देवता—विश्वेदेव

तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निरप ओषधीर्वनिनो जुषन्त. शर्मन्त्स्याम मरुतामुपस्थे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५) इंद्र, वरुण, मित्र, अग्नि, जल, ओषधियां एवं वृक्ष हमारे इस स्तोत्र को सुनें. मरुतों के समीप रहकर हम सुखी रहेंगे. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (२५) सूक्त—३५        देवता—विश्वेदेव शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या. शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ.. (१) इंद्र एवं अग्नि अपने रक्षासाधनों द्वारा हमारे लिए शांतिकारक हों. यजमानों द्वारा हव्य प्राप्त करने वाले इंद्र एवं वरुण हमारे लिए शांतिदाता हों. इंद्र एवं सोम हमारे लिए शांति तथा सुख के कारण बनें. इंद्र तथा पूषा हमें युद्ध में शांतिकारक हों. (१) शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरन्धिः शमु सन्तु रायः. शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु.. (२) भग एवं नराशंस हमारे लिए शांति देने वाले हों. पुरंधि एवं समस्त संपत्तियां हमें शांति दें. शोभन यम से युक्त सत्य का वचन हमें शांतिदाता हो. अनेक बार उत्पन्न अर्यमा हमारे लिए शांति दें. (२) शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः. शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु.. (३) धाता देव एवं धर्ता वरुण हमें शांति दें. अन्नों के साथ धरती हमें शांति दे. विशाल द्यावा- पृथिवी हमें शांति दें. देवों की उत्तम स्तुतियां हमें शांति दें. (३) शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्. शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः.. (४) ज्योतिरूपी मुख वाले अग्नि हमें शांति दें. मित्र, वरुण एवं अश्विनीकुमार हमें शांति दें. उत्तम कर्म करने वाले के उत्तम कर्म हमें शांति दें. चलने वाली हवा हमें शांति दे. (४) शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु. शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः.. (५) द्यावा-पृथिवी पहली बार पुकारने पर ही हमें शांति दें. अंतरिक्ष हमारे देखने के लिए शांतिदाता हो. ओषधियां तथा वृक्ष हमें शांति दें. लोक के पति इंद्र हमें शांति दें. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः. शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु.. (६) वसुओं के साथ इंद्र देव हमें शांति दें. शोभनस्तुति वाले वरुण आदित्यों के साथ हमें शांति दें. दुःखनाशक रुद्र रुद्रों के साथ हमें शांति दें. इस यज्ञ में त्वष्टादेव पत्नियों के साथ हमें शांति दें एवं हमारी स्तुतियां सुनें. (६) शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः. शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्व१: शम्वस्तु वेदिः.. (७) सोम एवं स्तुतिसमूह हमें शांति दें. सोम कूटने के साधन पत्थर एवं यज्ञ हमें शांति दें. यूपों के नाम हमें शांति दें. ओषधियां एवं यज्ञदेवी हमारे लिए शांतिकारक हों. (७) शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नश्चतस्रः प्रदिशो भवन्तु. शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः.. (८) विस्तृत तेज वाला सूर्य हमारी शांति के लिए उदित हो. चारों महादिशाएं हमारी शांति के लिए हों. दृढ़ पर्वत हमें शांति दें. नदियां एवं जल हमें शांति दें. (८) शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः. शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः.. (९) यज्ञकर्मों के साथ अदिति हमें शांति दें. शोभनस्तुति वाले मरुद्गण हमारे लिए शांतिकारक हों. विष्णु एवं पूषा हमारे लिए शांति दें. अंतरिक्ष एवं वायु हमारे लिए शांति दें. (९) शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः. शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः.. (१०) रक्षा करते हुए सविता देव हमें शांति दें. अंधकार का नाश करती हुई उषाएं हमें शांति दें. बादल हमारी प्रजा के लिए शांतिकारक हों. सुख देने वाले क्षेत्रपति हमें शांति दें. (१०) शं नो देवा विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु. शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः.. (११) दीप्तियुक्त विश्वेदेव हमें शांति दें. सरस्वती यज्ञकर्मों के साथ हमें शांति दें. यज्ञ एवं दान करने वाले हमें शांति दें. स्वर्ग, पृथिवी एवं अंतरिक्ष हमें शांति दें. (११) शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः. शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

सत्यपालक देव हमारे लिए शांति के कारण हों. घोड़े एवं गाएं हमें शांति दें. शोभनकर्म एवं हाथों वाले ऋभु हमें शांति दें. स्तुतियां बोली जाने पर पितर हमें शांति दें. (१२) शं नो अज एकपाद्देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्यः शं समुद्रः. शं नो अपां नपात्पेरुरस्तु शं नः पृश्रिर्भवतु देवगोपा.. (१३) अजएकपाद देव हमें शांति दें. अहिर्बुध्न्य एवं समुद्र हमें शांति दें. उपद्रव से पार पहुंचाने वाले अपांनपात् हमें शांति दें. देवों द्वारा रक्षित पृश्नि हमें शांति दें. (१३) आदित्या रुद्रा वसवो जुषन्तेदं ब्रह्म क्रियमाणं नवीयः. शृण्वन्तु नो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता उत ये यज्ञियासः.. (१४) आदित्यों, रुद्रों एवं वसुओं का समूह हमारे इस नए बनाए हुए स्तोत्र को सुने. स्वर्ग में उत्पन्न, धरती पर उत्पन्न एवं पृश्नि से उत्पन्न यज्ञपात्र अन्य देव भी इसे सुनें. (१४) ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः. ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५) जो देव यज्ञपात्र देवों के भी यज्ञपात्र एवं मनु के यजनीय हैं, जो मरणरहित एवं सत्य जानने वाले हैं, वे आज हमें विशाल कीर्ति वाला पुत्र दें एवं कल्याणसाधनों से सदा हमारी रक्षा करें. (१५) सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव प्र ब्रह्मैतु सदनादृतस्य वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गाः. वि सानुना पृथिवी सस्र उर्वी पृथु प्रतीकमध्येधे अग्निः.. (१) हमारा स्तोत्र यज्ञशाला से सूर्य आदि देवों के पास भली प्रकार जावें. सूर्य ने अपनी किरणों से वर्षा का जल बनाया है. पृथिवी अपने पर्वतों की चोटियों द्वारा विस्तृतस्वरूप में फैली है. धरती के विस्तृत अंगों के ऊपर अग्नि प्रज्वलित होते हैं. (१) इमां वां मित्रावरुणा सुवृक्तिमिषं न कृण्वे असुरा नवीयः. इनो वामन्यः पदवीरदब्धो जनं च मित्रो यतिति ब्रुवाणः.. (२) हे शक्तिशाली मित्र एवं वरुण! मैं हव्यरूप अन्न के समान नवीन स्तुति तुम्हें सुनाता हूं. तुम में एक वरुण सबके स्वामी, शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं धर्माधर्म के निर्णायक हैं एवं दूसरे मित्र हमारी स्तुति सुनकर प्राणियों को अपने काम में लगाते हैं. (२) आ वातस्य ध्रजतो रन्त इत्या अपीपयन्त धेनवो न सूदाः. महो दिवः सदने जायमानोऽचिक्रदद् वृषभः सस्मिन्नूधन्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

वायु की गतियां सब ओर शोभा पाती हैं. दूध देने वाली गायों की वृद्धि होती है. महान् एवं सूर्य के स्थान अंतरिक्ष में उत्पन्न वर्षाकारक मेघ अंतरिक्ष में गरजता है. (३) गिरा य एता युनजद्धरी त इन्द्र प्रिया सुरथा शूर धायू. प्र यो मन्युं रिरिक्षतो मिनात्या सुक्रतुमर्यमणं ववृत्याम्.. (४) हे शूर इंद्र! जो व्यक्ति तुम्हारे प्यारे, शोभनगति एवं भारवाहक हरि नामक घोड़ों को स्तुति करता हुआ रथ में जोड़ता है, तुम उसके यज्ञ में आओ. मैं उन शोभनकर्म वाले अर्यमा को स्तुति के द्वारा बुलाता हूं, जो हिंसा करने वाले मेरे शत्रु का क्रोध नष्ट करते हैं. (४) यजन्ते अस्य सख्यं वयश्च नमस्विनः स्व ऋतस्य धामन्. वि पृक्षो बाबधे नृभिः स्तवान इदं नमो रुद्राय प्रेष्ठम्.. (५) अन्न वाले यजमान अपने यज्ञ में स्थित रहकर कर्म करते हुए रुद्र की मित्रता चाहते हैं. रुद्र नेताओं को स्तुति सुनकर अन्न देते हैं. मैं रुद्र को नमस्कार करता हूं. (५) आ यत्साकं यशसो वावशानाः सरस्वती सप्तथी सिन्धुमाता. याः सुष्वयन्त सुदुघाः सुधारा अभि स्वेन पयसा पीप्यानाः.. (६) जिन नदियों में सिंधु जलों की माता है, सरस्वती जिन में सातवीं हैं, वे अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ एवं शोभनधाराओं वाली सरिताएं प्रवाहित होती हैं. अपने जल से भरी हुई अन्न वाली एवं कामना करती हुई नदियां एक साथ आवें. (६) उत त्ये नो मरुतो मन्दसाना धियं तोकं च वाजिनोऽवन्तु. मा नः परि ख्यदक्षरा चरन्त्यवीवृधन्न्युज्यं ते रयं नः.. (७) प्रसन्न एवं वेगशाली मरुद्गण हमारे यज्ञ और पुत्र की रक्षा करें. व्याप्त एवं संचरण करने वाली वाग्देवी सरस्वती हमारे अतिरिक्त किसी को न देखें. ये दोनों मिलकर हमारे धन को बढ़ावें. (७) प्र वो महीमरमतिं कृणुध्वं प्र पूषणं विदथ्यं१ न वीरम्. भगं धियोऽवितारं नो अस्याः सातौ वाजं रातिषाचं पुरन्धिम्.. (८) हे स्तोताओ! तुम सोमरहित एवं विस्तृत धरती को बुलाओ. यज्ञ के योग्य एवं वीर पूषा को बुलाओ. तुम इस यज्ञ में हमारे कर्मों के रक्षक भग एवं दानकुशल व प्राचीन बाज को बुलाओ. (८) अच्छांयं वो मरुतः श्लोक एत्वच्छा विष्णुं निषिक्तमपामवोभिः. उत प्रजायै गृणते वयो धुर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव

हे मरुतो! हमारी ये स्तुतियां तुम्हारे सामने जावें. ये हमारे रक्षक एवं गर्भपालक विष्णु के पास जावें. वे स्तोता को संतान एवं अन्न दें. तुम अपने कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा करो. (९) सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव आ वो वाहिष्ठो वहतु स्तवध्यै रथो वाजा ऋभुक्षणो अमृक्तः. अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमैर्मदे सुशिप्रा महभिः पृणध्वम्.. (१) हे विस्तीर्ण तेज के आधाररूप ऋभुआे! ढोने में अधिक समर्थ, प्रशंसा के योग्य एवं अबाधित रथ तुम्हें वहन करे. हे सुंदर ठोड़ी वाले ऋभुआे! तुम हमारे यज्ञ में आनंद के लिए दूध, दही एवं सत्तू से मिला महान् सोम पीकर अपना पेट भरो. (१) यूयं ह रत्नं मघवत्सु धत्थ स्वर्द्दश ऋभुक्षणो अमृक्तम्. सं यज्ञेषु स्वधावन्तः पिबध्वं वि नो राधांसि मतिभिर्द्यध्वम्.. (२) हे स्वर्गदर्शी ऋभुआे! हम हव्यरूप अन्न वालों को नाशरहित रत्न दो. इसके पश्चात् तुम शक्तिशाली बनकर सोमपान करो. तुम अपनी कृपा से हमें धन दो. (२) उवोचिथ हि मघवन्देष्वां महो अर्भस्य वसुनो विभागे. उभा ते पूर्णा वसुना गभस्ती न सूनृता नि यमते वसव्या.. (३) हे धनवान् इंद्र! तुम महान् एवं अल्प धन के विभाग के समय धन का सेवन करते हो. तुम्हारे दोनों हाथ धन से पूर्ण हैं. तुम्हारी वाणी भुजाओं को नहीं रोकती. (३) त्वमिन्द्र स्वयशा ऋभुक्षा वाजो न साधुरस्तमेष्युक्वा. वयं नु ते दाश्वांसः स्याम ब्रह्म कृण्वन्तो हरिवो वसिष्ठाः.. (४) हे असाधारण यशस्वी, ऋभुओं के स्वामी एवं यज्ञसाधक इंद्र! तुम अन्न के समान स्तोता के घर जाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम वसिष्ठपुत्र तुम्हें हव्य देते हुए तुम्हारी स्तुति करें. (४) सनितासि प्रवतो दाशुषे चिद्याभिर्विवेषो हर्यश्व धीभिः. ववन्मा नु ते युज्याभिरूती कदा न इन्द्र राय आ दशस्येः.. (५) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं हमारी स्तुतियों से व्याप्त इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान को पर्याप्त धन देते हो. हे इंद्र! तुम हमें धन कब दोगे? आज हम तुम्हारे योग्य रक्षण से युक्त हों. (५) वासयसीव वेधसस्त्वं नः कदा न इन्द्र वचसो बुबोधः.

अस्तं तात्या धिया रयिं सुवीरं पृक्षो नो अर्वा न्युहीत् वाजी.. (६) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुतियों को कब समझोगे? हम स्तोताओं को तुम इसी समय अपने स्थान में आश्रय दो. तुम्हारा शक्तिशाली घोड़ा हमारी स्तुति के कारण संतानसहित अन्न हमारे घर लावे. (६) अभि यं देवी निर्ऋतिश्चिदीशे नक्षन्त इन्द्रं शरदः सुपृक्षः. उप त्रिबन्धुर्जरदष्टिमेत्यस्ववेशं यं कृणवन्त मर्ताः.. (७) देवी निर्ऋति स्वामी बनाने के लिए इंद्र को व्याप्त करती है. शोभन अन्न वाले वर्ष इंद्र को व्याप्त करते हैं. मरणशील स्तोता इंद्र को अपने घर में बैठाता है. तीनों लोकों को धारण करने वाले इंद्र अन्न को पचाने वाला बल देते हैं. (७) आ नो राधांसि सवितः स्तवध्या आ रायो यन्तु पर्वतस्य रातौ. सदा नो दिव्यः पायुः सिषक्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे सविता! स्तुतियोग्य धन तुम्हारे पास से हमारे समीप आवे. मेघ द्वारा धन देने पर धन हमें प्राप्त हो. दिव्य एवं रक्षक इंद्र हमारी सदा रक्षा करें. तुम कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी रक्षा करो. (८) सूक्त—३८ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता ययाम हिरण्ययीममतिं यामशिश्रेत्. नूनं भगो हव्यो मानुषेभिर्वि यो रत्ना पुरूवसुर्दधाति.. (१) सविता जिस स्वर्णमय रूप का आश्रय लेते हैं, उसीको उत्पन्न करते हैं। सूर्य निश्चय ही मनुष्यों द्वारा स्तुतियोग्य हैं. विविध संपत्तियों वाले सविता स्तोताओं को रमणीय धन देते हैं. (१) उदु तिष्ठ सवितः श्रुध्य१स्य हिरण्यपाणे प्रभृतावृतस्य. व्यु१र्वी पृथ्वीममतिं सृजान आ नृभ्यो मर्तभोजनं सुवानः.. (२) हे सविता! तुम उदय करो. हे सोने के हाथों वाले सविता! तुम हमारी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए हमारा स्तोत्र सुनो. तुम विस्तृत एवं असीमित प्रभा उत्पन्न करते हो एवं स्तोताओं को मानवभोग योग्य धन देते हो. (२) अपि ष्टुतः सविता देवो अस्तु यमा चिद्विश्वे वसवो गृणन्ति. स नः स्तोमान्नमस्य१श्नो धाद्विश्वेभिः पातु पायुभिर्नि सूरीन्.. (३) हम सविता देव की स्तुति करें. सब देव जिनकी स्तुति करते हैं, वे ही नमस्कारयोग्य ebook converter DEMO Watermarks*

सविता हमारे स्तोत्रों एवं अन्नों को धारण करें तथा समस्त रक्षासाधनों द्वारा स्तोताओं की रक्षा करें. (३) अभि यं देव्यदितिर्गृणाति सवं देवस्य सवितुर्जषाणा. अभि सम्राजो वरुणो गृणन्त्यभि मित्रासो अर्यमा सजोषाः.. (४) सविता देव की आज्ञा का पालन करती हुई अदिति देवी उनकी स्तुति करती हैं. भली प्रकार सुशोभित वरुण आदि उनकी स्तुति करते हैं. मित्र एवं अर्यमा समान प्रेम द्वारा उनकी स्तुति करते हैं. (४) अभि ये मिथो वनुषः सपन्ते रातिं दिवो रातिषाचः पृथिव्याः. अहिर्बुध्न्य उत नः शृणोतु वरूत्र्येकधेनुभिर्नि पातु.. (५) दान करने वाले एवं सेवानिपुण यजमान परस्पर संगत होकर स्वर्ग एवं धरती के मित्र सविता की सेवा करते हैं. अहिर्बुध्न्य हमारा स्तोत्र सुनें. सरस्वती प्रमुख धेनुओं द्वारा हमारा भली-भांति पालन करें. (५) अनु तन्नो जास्पतिर्मंसीष्ट रत्नं देवस्य सवितुरियानः. भगमुग्रोऽवसे जोहवीति भगमनुग्रो अध याति रत्नम्.. (६) प्रजापालक सविता देव हमारी याचना सुनकर अपना प्रसिद्ध धन हमें दें. उग्र स्तोता हमारी रक्षा के लिए भग नामक देव को बार-बार बुलाता है. असमर्थ स्तोता भग से रत्न मांगता है. (६) शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः. जम्भयन्तोऽहिं वृकं रक्षांसि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः.. (७) यज्ञ के स्तोत्रों के समय सीमित गति एवं शोभन अन्न वाले वाजी नामक देव हमें सुख देने वाले हों. वे हननकर्त्ता एवं चोर राक्षसों को नष्ट करते हुए पुराने रोगों को हमसे पृथक् करें. (७) वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः. अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः.. (८) हे बुद्धिमान्, मरणरहित एवं सत्य को जानने वाले वाजी नामक देवो! तुम धन के कारण होने वाले प्रत्येक युद्ध में हमारी रक्षा करो. तुम इस सोम को पीकर प्रमुदित बनो एवं देवयान मार्गों द्वारा जाओ. (८) सूक्त—३९ देवता—विश्वेदेव ebook converter DEMO Watermarks*

ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत्प्रतीची जूर्णिर्देवतातिमेति. भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति.. (१) ऊपर की ओर गति करने वाले अग्नि मुझ स्तोता की शोभनस्तुति को सुनें. सब लोगों को बूढ़ा बनाने वाली एवं पूर्व की ओर मुंह करने वाली उषा यज्ञ में जाती है. श्रद्धायुक्त यजमान एवं उसकी पत्नी रथस्वामियों के समान यज्ञमार्ग पर आते हैं. हमारे द्वारा भेजा हुआ स्तोता यज्ञ करता है. (१) प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विशपतीव बीरिट इयाते. विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान्.. (२) इन यजमानों का शोभन अन्न से युक्त कुश प्राप्त होता है. इस समय हमारी प्रजाओं के पालक एवं घोड़ियों के स्वामी वायु एवं पूषा प्रजाओं के कल्याण के लिए रात्रिसंबंधी उषा की पहली पुकार सुनकर अंतरिक्ष में आते हैं. (२) जम्या अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुभ्राः. अर्वाक् पथ उरुज्रयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य जग्मुषो नो अस्य.. (३) वसुगण इस यज्ञ में धरती पर रमण करें. विस्तृत अंतरिक्ष में स्थित एवं दीप्तिशाली मरुतों की सेवा होती है. हे तेज चलने वाले वसुओ एवं मरुतो! तुम अपना मार्ग हमारे सामने करो. अपने समीप गए हुए हमारे इस दूत की पुकार सुनो. (३) ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमाः सधस्थं विश्वे अभि सन्ति देवाः. ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रुष्टी भगं नासत्या पुरन्धिम्.. (४) वे प्रसिद्ध, यज्ञपात्र एवं रक्षक विश्वेदेव यज्ञों में एक साथ ही आते हैं. हे अग्नि! हमारे यज्ञ में हमारी अभिलाषा करने वाले देवों का यज्ञ करो तथा भग, अश्विनीकुमारों एवं इंद्र का शीघ्र यजन करो. (४) आग्ने गिरो दिव आ पृथिव्या मित्रं वह वरुणमिन्द्रमग्निम्. आर्यमणमदितिं विष्णुमेषां सरस्वती मरुतो मादयन्ताम्.. (५) हे अग्नि! तुम स्तुतियोग्य मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि, अर्यमा, अदिति एवं विष्णु को स्वर्ग एवं धरती से हमारे यज्ञ में बुलाओ. सरस्वती एवं मरुद्गण हम यजमानों से प्रसन्न हों. (५) ररे हव्यं मतिभिर्यज्ञियानां नक्षत्कामं मर्त्यानामसिन्वन्. धाता रयिमविदस्यं सदासां सक्षीमहि युज्येभिर्नु देवैः.. (६) हम यज्ञपात्र देवों के लिए अपनी स्तुतियों के साथ हव्य देते हैं. अग्नि हमारी कामनाओं का विरोध न करते हुए हमारे यज्ञ में फैलें. हे देवो! तुम उपेक्षा न करने एवं सदा उपभोग करने ebook converter DEMO Watermarks*

योग्य धन हमें दो. हम आज अपने सहायक देवों से मिलेंगे. (६) नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः. यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों ने आज धरती एवं आकाश की भलीप्रकार स्तुति की है. उन्होंने यज्ञ वाले वरुण, मित्र एवं अग्नि की भी स्तुति की है. प्रमुदित करने वाले देव हमें प्रजा के योग्य एवं सबसे अच्छा अन्न दें एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करें. (७) सूक्त—४० देवता—विश्वेदेव ओ श्रुष्टिर्विदथ्या३ समेतु प्रति स्तोमं दधीमहि तुराणाम्. यदद्य देवः सविता सुवाति स्यामास्य रत्निनो विभागे.. (१) हे देवो! तुम्हारे मन द्वारा संपादित होने वाला सुख हमें प्राप्त हो. हम तेज चलने वाले देवों के लिए स्तोत्र बनाते हैं. रत्नों के स्वामी सविता आज जो धन हमारे पास भेजेंगे, हम उसी धन के भागी होंगे. (१) मित्रस्तन्नो वरुणो रोदसी च द्युभक्तमिन्द्रो अर्यमा ददातु. दिदेष्टु देव्यदिति रेक्णो वायुश्च यन्नियुवैते भगश्च.. (२) मित्र एवं वरुण, द्यावा-पृथिवी, इंद्र एवं अर्यमा हमें वही स्तोताओं द्वारा प्रशंसित धन दें. अदिति देवी हमें धन दें. वायु एवं भग हमारे लिए उसी धन की योजना करें. (२) सेदुग्रो अस्तु मरुतः स शुष्मी यं मर्त्यं पृषदश्वा अवाथ. उतेमग्निः सरस्वती जुनन्ति न तस्य रायः पर्येतास्ति.. (३) हे हरिणरूप वाहनसाधनों वाले मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह उग्र एवं बलवान् हो. अग्नि, सरस्वती आदि देवगण जिस यजमान को यज्ञ की प्रेरणा देते हैं, उसके धन का कोई बाधक नहीं है. (३) अयं हि नेता वरुण ऋतस्य मित्रो राजानो अर्यमापो धुः. सुहवा देव्यदितिरनर्वा ते नो अंहो अति पर्षन्नरिष्टान्.. (४) यज्ञ को प्राप्त करने वाले ये शक्तिशाली वरुण, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे यज्ञकर्म को धारण करते हैं. किसी के द्वारा न रुक सकने वाली अदिति देवी हमारी पुकार सुने. ये देव हमें बाधा पहुंचाए बिना हमारे पापों को नष्ट करें. (४) अस्य देवस्य मीळुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः. विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

अन्य देव यज्ञ में हव्यों द्वारा प्राप्त करने योग्य एवं अभिलाषापूरक विष्णु के अंशरूप हैं. रुद्र हमें अपना सुख एवं महत्त्व देते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे हव्य वाले घर में आओ. (५) मात्र पूषन्नघृण इरस्यो वरूत्री यद्रातिषाचश्च रासन्. मयोभुवो नो अर्वन्तो नि पान्तु वृष्टिं परिज्मा वातो ददातु.. (६) हे दीप्तिशाली पूषा! सबकी वरणीय सरस्वती एवं दानकुशल देवपत्नियां इस यज्ञ में हमें जो धन दें, उसका विघात मत करना. सुख देने वाले एवं गतिशील देव हमारी रक्षा करें एवं सब ओर जाने वाले वायु हमें वर्षारूपी जल दें. (६) नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः. यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों ने आज धरती एवं आकाश की भली प्रकार स्तुति की है. उन्होंने यज्ञ वाले वरुण, मित्र एवं अग्नि की भी स्तुति की है. प्रमुदित करने वाले देव हमें पूजा के योग्य एवं सबसे अच्छा अन्न दें एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करें. (७) सूक्त—४१ देवता—इंद्रादि प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना. प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम.. (१) हम स्तोता अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण एवं अश्विनीकुमारों को प्रातःकाल बुलाते हैं. हम प्रातःकाल भग, पूषा, ब्रह्मणस्पति, सोम एवं रुद्र का आह्वान करते हैं. (१) प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता. आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह.. (२) जो विश्व के धारक, जयशील, उग्र एवं अदितिपुत्र हैं, हम प्रातःकाल उन्हीं भगदेव को बुलाते हैं. दरिद्र स्तोता एवं धनसंपन्न राजा दोनों ही भगदेव की स्तुति करते हुए कहते हैं —“हमें भोग के योग्य धन दो.” (२) भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः. भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम.. (३) हे भग! तुम उत्तम नेता एवं सत्यधन हो. हमें अभिलषित धन देकर हमारी स्तुति सफल करो. हे भग! हमें गायों एवं घोड़ों द्वारा उन्नत बनाओ. हे भग! हम पुत्रादि द्वारा मनुष्यों वाले हों. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम्. उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम.. (४) हे भगदेव! हम इस समय एवं दिन का मध्य प्राप्त होने पर धनी बनें. हे धनस्वामी भग! हम सूर्योदय के समय देवों की कृपा प्राप्त करें. (४) भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम. तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह.. (५) हे देवो! भग ही धनवान् हों. उसी धन से हम भी धनवान् हों. हे भग! सब लोग तुम्हें बार-बार बुलाते हैं. इस यज्ञ में तुम हमारे अनुगामी बनो. (५) समध्वरायोपसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय. अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन आ वहन्तु.. (६) घोड़ा जिस प्रकार चलने योग्य मार्ग पर जाता है, उसी प्रकार उषा देवी हमारे यज्ञ में आवें. तेज चलने वाले घोड़े जैसे रथ को लाते हैं, उसी प्रकार उषा भग को हमारे सामने लावें. (६) अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः. घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) भद्रा, अश्वों, गायों एवं पुत्रादि जन से युक्त जल बरसाती हुई तथा सभी गुणों वाली उषा हमारा रात का अंधकार मिटावें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—४२ देवता—विश्वेदेव प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनुर्नभन्यस्य वेतु. प्र धेनव उदप्रुतो नवन्त युज्यतामद्री अध्वरस्य पेशः.. (१) अंगिरा नाम के ऋषि सब जगह व्याप्त हों. पर्जन्य हमारे स्तोत्र की विशेषरूप से अभिलाषा करें. नदियां जल सींचती हुई प्रवाहित हों. यजमान एवं उसकी पत्नी यज्ञ का रूप बनावें. (१) सुगस्ते अग्ने सनवित्तो अध्वा युक्ष्वा सुते हरितो रोहितश्च. ये वा सद्मन्नरुषा वीरवाहो हुवे देवानां जनिमानि सत्त:.. (२) हे अग्नि! चिरकाल से प्राप्त तुम्हारा मार्ग सुगम हो. तुम्हारे काले और लाल रंग के जो घोड़े तुम्हें यज्ञशाला में ले जाते हुए शोभा पाते हैं, उन्हें तुम रथ में जोड़ो. मैं यज्ञशाला में बैठा हुआ देवों को बुलाता हूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके. यजस्व सु पूर्वणीक देवाना यज्ञियामरमतिं ववृत्याः.. (३) हे देवो! नमस्कार करते हुए ये स्तोता तुम्हारे यज्ञ की भली प्रकार पूजा करते हैं. हमारे पास बैठा हुआ एवं स्तुतिशील होता दूसरे होताओं से श्रेष्ठ है. हे यजमान! तुम देवों का यज्ञ करो. हे अधिक तेज वाले अग्नि! तुम यज्ञयोग्य भूमि को परिवर्तित करो. (३) यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्योनशीरतिथिराचिकेतत्. सुप्रीतो अग्निः सुधितो दम आ स विशे दाति वार्यमियत्यै.. (४) सबके अतिथि अग्नि जब वीर एवं धनी यजमान को घर में सुखपूर्वक सोए हुए जान पड़ते हैं तथा यज्ञशाला में भली प्रकार रखे हुए अग्नि प्रसन्न होते हैं, उस समय वे अपने समीप वाले लोगों को धन देते हैं. (४) इमं नो अग्ने अध्वरं जुषस्व मरुत्स्विन्द्रे यशसं कृधी नः. आ नक्ता बर्हिः सदतामुषासोशान्ता मित्रावरुणा यजेह.. (५) हे अग्नि! हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करो. हमें इंद्र एवं मरुद्गण के सामने यशस्वी बनाओ, रात में एवं उषाकाल में कुशों पर बैठो तथा यज्ञ के अभिलाषी मित्र व वरुण की इस यज्ञ में पूजा करो. (५) एवाग्निं सहस्यं वसिष्ठो रायस्कामो विश्वप्स्न्यस्य स्तौत्. इषं रयिं पप्रथद्वाजमस्मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) धन की अभिलाषा वाले वसिष्ठ ने इसी प्रकार शक्तिपुत्र अग्नि की स्तुति धनलाभ के लिए की थी. अग्नि हमारे अन्न, धन और बल की वृद्धि करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (६) सूक्त—४३ देवता—विश्वेदेव प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अर्चन्द्यावा नमोभिः पृथिवी इषध्यै. येषां ब्रह्माण्यसमानि विप्रा विष्वग्वियन्ति वनिनो न शाखाः.. (१) हे देवो! जिन मेधावियों के स्तोत्र वृक्ष की शाखाओं के समान सब ओर विशेष रूप से जाते हैं, वे ही देवाभिलाषी स्तोता यज्ञों में अपनी स्तुतियों द्वारा सभी देवों की अर्चना करते हैं. वे ही देवों को प्राप्त करने के लिए द्यावा-पृथिवी की अर्चना करते हैं. (१) प्र यज्ञ एतु हेत्वो न सप्तिरुद्यच्छध्वं समनसो घृताचीः. स्तृणीत बर्हिरध्वराय साधूर्ध्वा शोचींषि देवयून्यस्थुः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हमारा यज्ञ शीघ्रगामी अश्व के समान देवों के पास जावे. हे ऋत्विजो! तुम एकमत होकर स्रुच को उठाओ एवं यज्ञ के निमित्त कुशों को भली-भांति बिछाओ. हे अग्नि! तुम्हारी देवाभिलाषिणी लपटें ऊपर की ओर उठें. (२) आ पुत्रासो न मातरं विभृत्राः सानौ देवासो बर्हिषः सदन्तु. आ विश्वाची विदथ्यामनक्त्वग्ने मा नो देवतात म्ध्रस्कः.. (३) विशेष रूप से पालनीय पुत्र जिस प्रकार माता की गोद में बैठता है, उसी प्रकार देवगण कुश बिछी हुई वेदी के ऊंचे स्थान पर बैठें. हे अग्नि! जुहू तुम्हारी यज्ञ के योग्य ज्वाला को भली प्रकार सींचे. तुम युद्ध में हमारे शत्रुओं की सहायता मत करना. (३) ते सीषपन्त जोषमा यजत्रा ऋतस्य धाराः सुदुघा दुहानाः. ज्येष्ठं वो अद्य मह आ वसूनामा गन्तन समनसो यति ष.. (४) यज्ञ के पात्र इंद्रादि देव जल की सुख से दुहने योग्य धाराओं को बरसाते हुए हमारी सेवा को पर्याप्त रूप में स्वीकार करें. हे देवो! आज तुम सब धनों में पूज्य अपना धन लाओ तथा स्वयं भी समान रूप से प्रसन्न होकर आओ. (४) एवा नो अग्ने विश्वा दशस्य त्वया वयं सहसावन्नासक्राः. राया युजा सधमादो अरिष्टा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हे अग्नि! तुम इसी प्रकार हमें प्रजाओं के मध्य धन दो. हे शक्तिशाली अग्नि! हम तुम्हारे द्वारा त्यागे न जावें तथा नित्ययुक्त धन के साथ प्रसन्न एवं अपराजित हों. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (५) सूक्त—४४ देवता—दधिक्रा दधिक्रां वः प्रथममश्विनोषसमग्निं समिद्धं भगमूतये हुवे. इन्द्रं विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमादित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः.. (१) हे स्तोताओ! तुम्हारी रक्षा के लिए सबसे पहले मैं दधिक्रा देव को बुलाता हूं. इसके बाद अश्विनीकुमारों, उषा, प्रज्वलित अग्नि और भग नामक देव को बुलाता हूं. मैं इंद्र, विष्णु, पूषा, ब्रह्मणस्पति, आदित्यों, द्यावा-पृथिवी, जलों एवं सूर्य को बुलाता हूं. (१) दधिक्रामु नमसा बोधयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः. इळां देवीं बर्हिषि सादयन्तोऽश्विना विप्रा सुहवा हुवेम.. (२) हम स्तोत्रों द्वारा दधिक्रा देव को जगाते एवं प्रेरित करते हुए यज्ञ के समीप जाते हैं, कुशों पर इडा देवी को स्थापित करते हैं एवं शोभन आह्वान वाले उन मेधावी अश्विनीकुमारों ebook converter DEMO Watermarks*

को बुलाते हैं. (२) दधिक्रावाणं बुबुधानो अग्निमुप ब्रुव उषसं सूर्यं गाम्. ब्रध्नं मँश्चतोर्वरुणस्य बभ्रुं ते विश्वास्मद् दुरिता यावयन्तु.. (३) दधिक्रा देव को जगाता हुआ मैं अग्नि, उषा, सूर्य एवं भूमि की स्तुति करता हूं. मैं अभिमानियों को नष्ट करने वाले वरुण के महान् एवं पीले रंग के घोड़े की स्तुति करता हूं. वे हमसे सभी पाप दूर करें. (३) दधिक्रावा प्रथमो वाज्यर्वाग्रे रथानां भवति प्रजानन्. संविदान उषसा सूर्येणादित्येभिर्वसुभिरङ्गिरोभिः.. (४) सभी अश्वों में प्रमुख, शीघ्रगामी एवं गतिशील दधिक्रा जानने योग्य बातों को भली प्रकार जानकर उषा, सूर्य, आदित्यों, वसुओं और अंगिराओं के साथ सहमत होकर बैठते हैं. (४) आ नो दधिक्राः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्थामन्वेतवा उ. शृणोतु नो दैव्यं शर्धो अग्निः शृण्वन्तु विश्वे महिषा अमूराः.. (५) दधिक्रा देव यज्ञमार्ग पर अनुगमन करने के इच्छुक हम लोगों के मार्ग को सींचें. अग्नि हमारे दैवी बल एवं स्तोत्र को सुनें. मूढ़तारहित एवं महान् विश्वेदेव मेरी स्तुति सुनें. (५) सूक्त—४५ देवता—सविता आ देवो यातु सविता सुरत्नोऽन्तरिक्षप्रा वहमानो अश्वैः. हस्ते दधानो नर्या पुरूणि निवेशयञ्च प्रसुवञ्च भूम.. (१) शोभनरत्नों से युक्त, अपने तेज से अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाले एवं अपने घोड़ों द्वारा ढोए जाते हुए सविता देव अनेक मानवहितकारी धनों को हाथ में धारण करते हैं. वे प्राणियों को स्थापित करते हैं एवं कर्म में लगाते हैं. वे यहां आवें. (१) उदस्य बाहू शिथिरा बृहन्ता हिरण्यया दिवो अन्ताँ अनष्टाम्. नूनं सो अस्य महिमा पनिष्ट सूरश्चिदस्मा अनु दादपस्याम्.. (२) दान के निमित्त फैलाई हुई, विशाल एवं सोने की भुजाओं को सविता देव अंतरिक्ष में व्याप्त करें. हम सविता की उसी महिमा की आज प्रशंसा कर रहे हैं. सूर्य भी सविता को कर्म की इच्छा दें. (२) स घा नो देवः सविता सहावा साविषद्ध्वसुपतिर्वसूनि. विश्रयमाणो अमतिमुरूचीं मर्तभोजनमध रासते नः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

तेजस्वी व धनों के पालक सविता देव हमारे लिए सब ओर से धनों को प्रेरित करते हैं. वे विस्तीर्ण गति वाले रूप को धारण करते हुए इस समय हमें मानवों के भोग में आने वाला धन दें. (३) इमा गिरः सवितारं सुजिह्वं पूर्णगभस्तिमूळते सुपाणिम्. चित्रं वयो बृहदस्मे दधातु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) ये वाणियां शोभनजिह्वा वाले, संपूर्ण धनयुक्त एवं शोभनपाणि वाले सविता की स्तुति करती हैं. वे हमें विचित्र एवं महान् धन दें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (४) सूक्त—४६ देवता—रुद्र इमा रुद्राय स्थिरधन्वने गिरः क्षिप्रेषवे देवाय स्वधान्वे. अषाळहाय सहमानाय वेधसे तिग्मायुधाय भरता शृणोतु नः.. (१) हे स्तोताओ! तुम दृढ़ धनुष वाले, शीघ्रगामी बाणों वाले, अन्नयुक्त अपराजित, सबको जीतने वाले, बनाने वाले तथा तीक्ष्ण आयुधों के स्वामी रुद्र की स्तुति करो. वे हमारी स्तुति सुनें. (१) स हि क्षयेण क्षम्यस्य जन्मनः साम्राज्येन दिव्यस्य चेतति. अवन्नवन्तीरुप नो दुरश्चरानमीवो रुद्र जासु नो भव.. (२) रुद्र को स्वर्ग एवं पृथ्वी पर रहने वाले ऐश्वर्य द्वारा जाना जा सकता है. हे रुद्र! हमारी प्रजाएं तुम्हारी स्तुतियां करती हैं. तुम उनकी रक्षा करते हुए हमारे घर आओ एवं उसे रोगहीन बनाओ. (२) या ते दिद्युदवसृष्टा दिवस्परि क्षमया चरिति परि सा वृणक्तु नः. सहस्त्रं ते स्वपिवात भेषजा मा नस्तोकेषु तनयेषु रीरिषः.. (३) हे रुद्र! अंतरिक्ष से छोड़ी गई बिजली जो धरती पर घूमती है, वह हमें त्याग दे. हे स्वपिवात रुद्र! तुम्हारी हजारों ओषधियां हमें मिलें. तुम हमारे पुत्र-पौत्रों की हत्या मत करना. (३) मा नो वधी रुद्र मा परा दा मा ते भूम प्रसितौ हीळितस्य. आ नो भज बर्हिषि जीवशंसे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) हे रुद्र! तुम हमें मत मारना एवं हमारा त्याग मत करना. हम तुम्हारे क्रोध के बंधन में न रहें. तुम प्राणियों द्वारा प्रशंसित यज्ञ का हमें भागी बनाओ. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४७ देवता—जल

हमारी रक्षा करो. (४) सूक्त—४७ देवता—जल आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्निमकृण्वतेळः. तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतप्रुषं मधुमन्तं वनेम.. (१) हे जलरूप देवो! देवाभिलाषी अध्वर्युओं ने तुम्हारी सहायता से इंद्र के पीने के योग्य, धरती से उत्पन्न जो सोमरस पहले तैयार किया था, इस समय हम भी तुम्हारे उसी शुद्ध, पापरहित, वर्षारूपी जल से सींचने योग्य एवं मधुर सोमरस का सेवन करेंगे. (१) तमूर्मिमापो मधुमत्तं वोऽपां नपादवत्वाशुहेमा. यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य.. (२) हे अप देवो! तुम्हारे उस मधुर सोम नामक रस की शीघ्रगति वाले अपांनपात् अर्थात् अग्नि रक्षा करें. वसुओं के साथ इंद्र जिस में प्रसन्न होते हैं, हम आज देवों की कामना करते हुए उसी का सेवन करेंगे. (२) शतपवित्राः स्वधया मदन्तीर्देवीर्देवानामति यन्ति पाथः. ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिन्धुभ्यो हव्यं घृतवज्जुहोत.. (३) सैकड़ों पवित्र रूपों वाले एवं अपने अन्न के द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न करते हुए जल देव इंद्रादि देवों के भी स्थान में प्रवेश करते हैं. वे इंद्र के यज्ञकर्मों का विनाश नहीं करते हैं. हे अध्वर्युजनो! सिंधु के लिए घी से मिले हव्य का हवन करो. (३) याः सूर्यो रश्मिभिराततान याभ्य इन्द्रो अरदद् गातुमूर्मिम्. ते सिन्धवो वारिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) हे सिंधुरूप जलो! सूर्य अपनी किरणों द्वारा जिनका विस्तार करते हैं एवं जिनके लिए इंद्र ने गमनयोग्य मार्ग का उद्घाटन किया है, तुम वे ही हो. तुम हमारे लिए धन धारण करो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४) सूक्त—४८ देवता—ऋभु ऋभुक्षणो वाजा मादयध्वमस्मे नरो मघवानः सुतस्य. आ वोऽर्वाचः क्रतवो न यातां विभ्वो रथं नर्यं वर्तयन्तु.. (१) हे नेता एवं धनस्वामी ऋभुओ! तुम हमारा सोमरस पीकर मतवाले बनो. अब तुम जाओ. तुम्हारे कार्यकर्त्ता एवं समर्थ अश्व तुम्हारे मानवहितकारी रथ को हमारी ओर मोड़ें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋभुऋभुभिरभि वः स्याम विभ्वो विभुभिः शवसा शवांसि. वाजो अस्माँ अवतु वाजसाताविन्द्रेण युजा तरुषेम वृत्रम्.. (२) हे ऋभुओ! हम तुम्हारी सहायता से विस्तृत एवं धनवान् बनें. हम तुम्हारी शक्ति से शत्रुओं को पराजित करें. युद्ध में वाज हमारी रक्षा करें. हम इंद्र को पाकर शत्रुओं से पार पा लेंगे. (२) ते चिद्धि पूर्वीर्भि सन्ति शासा विश्वाँ अर्य उपरताति वन्वन्. इन्द्रो विभ्वाँ ऋभुक्षा वाजो अर्यः शत्रोर्मिंथत्या कृणवन्वि नृम्णम्.. (३) इंद्र एवं ऋभु हमारे शत्रुओं की अनेक सेनाओं को अपनी आज्ञा से मार डालते हैं. वे युद्ध में समस्त शत्रुओं का हनन करते हैं. शत्रुनाशक इंद्र, ऋभुक्षा एवं वाज शत्रु के बल को समाप्त करेंगे. (३) नू देवासो वरिवः कर्तना नो भूत नो विश्वेऽवसे सजोषाः. समस्मे इषं वसवो ददीरन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) दीप्तिशाली ऋभुओ! हमें आज धन दो. तुम सब समानरूप से प्रसन्न होकर हमारे रक्षक बनो. प्रसिद्ध ऋभु हमें अन्न दें. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४) सूक्त—४९ देवता—जल समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनाना यन्त्यनिविशमानाः. इन्द्रो या वज्री वृषभो रराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (१) समुद्र जिन में बड़ा है, ऐसे जल सबको शुद्ध करते हैं, सदा गतिशील हैं एवं अंतरिक्ष के मध्य से जाते हैं. वज्रधारी एवं अभिलाषापूरक इंद्र ने जिन्हें रुका होने पर स्वच्छंद किया था, वे जल देवता इस स्थान में हमारी रक्षा करें. (१) या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वाप याः स्वयञ्जाः. समुद्रार्था याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (२) जो जल अंतरिक्ष से उत्पन्न होते हैं, नदी के रूप में बहते हैं, जो खोद कर निकाले जाते हैं अथवा जो अपने आप उत्पन्न होकर सागर की ओर गति करते हैं, जो दीप्तियुक्त एवं पवित्र करने वाले हैं, वे देवीरूप जल यहां हमारी रक्षा करें. (२) यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम्. मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*