भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1073, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1073

उक्थभृतं सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत्प्र वदात्यग्रे. उपैनमाध्वं सुमनस्यमाना आ वो गच्छाति प्रतृदो वसिष्ठः.. (१४) हे तृत्सुओ! वसिष्ठ तुम्हारे पास आ रहे हैं. तुम प्रसन्नचित होकर उनकी पूजा करना. वसिष्ठ सबसे आगे रहकर मंत्रसमूह एवं सोम को धारण करते हैं. पत्थरों द्वारा सोम कूटने वाले अध्वर्यु को धारण करते हैं एवं कर्त्तव्य बताते हैं. (१४) सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव प्र शुक्रैतु देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी.. (१) दीप्त व सब अभिलाषाओं को देने वाली स्तुति वेगशाली एवं सुसंस्कृत रथ के समान हमारे पास से देवों के पास जावे. (१) विदुः पृथिव्या दिवो जनित्रं शृण्वन्त्यापो अध क्षरन्तीः.. (२) बहने वाला जल स्वर्ग और धरती दोनों की उत्पत्ति जानता है एवं स्तुतियां सुनता है. (२) आपश्चिदस्मै पिन्वन्त पृथ्वीर्वृत्रेषु शूरा मंसन्त उग्राः.. (३) विस्तृत जल इन इंद्र को तृप्त करते हैं. शत्रुबाधा होने पर उग्र एवं शूर लोग इंद्र की स्तुति करते हैं. (३) आ धूर्ष्वस्मै दधाताश्वानिन्द्रो न वज्री हिरण्यबाहुः.. (४) इंद्र के आगमन के लिए घोड़ों को रथ के आगे जोड़ो. इंद्र वज्रधारी एवं सोने के हाथों वाले हैं. (४) अभि प्र स्थाताहेव यज्ञं यातेव पत्मन्त्मना हिनोत.. (५) हे मनुष्यो! यज्ञ के सामने जाओ एवं यात्री के समान यज्ञमार्ग पर स्वयं ही चलो. (५) त्मना समत्सु हिनोत यज्ञं दधात केतुं जनाय वीरम्.. (६) हे सेवको! युद्धों में अपने आप जाओ. लोगों को ज्ञान कराने वाले एवं पापनाशक यज्ञों को धारण करो. (६) उदस्य शुष्माद्भानुर्नार्त बिभर्ति भरं पृथिवी न भूम.. (७) इस यज्ञ के बल के कारण ही सूर्य उदित होता है. धरती जिस प्रकार प्राणियों का भार वहन करती है, उसी प्रकार यज्ञ भी करता है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*