भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1072, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1072

सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव महिमा गभीरः. वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वसिष्ठा अन्वेत्तवे वः.. (८) हे वसिष्ठपुत्रो! तुम्हारी महिमा सूर्य के समान प्रकाशित एवं सागर के समान गंभीर है. वायुवेग के समान तुम्हारी महिमा का भी दूसरा कोई अनुमान नहीं कर सकता. (८) त इन्निण्यं हृदयस्य प्रकेतैः सहस्रवल्शमभि सं चरन्ति. यमेन ततं परिधिं वयन्तोऽप्सरस उप सेदुर्वसिष्ठाः.. (९) वे वसिष्ठपुत्र अपने हृदय के ज्ञान द्वारा अंतर्हित होकर हजार शाखाओं वाले संसार में घूमते हैं. वे यम द्वारा विस्तारित वस्त्र को बुनते हुए अप्सरा के पास गए. (९) विद्युतो ज्योतिः परि सञ्जिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा. तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विश आजभार.. (१०) हे वसिष्ठ! तुम्हें बिजली के समान ज्योतिरूप आत्मा का त्याग करते हुए मित्र व वरुण ने देखा था. वह तुम्हारा एक जन्म था. इससे पहले अगस्त्य तुम्हें तुम्हारे वासस्थान से लाए थे. (१०) उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्मनसोऽधि जातः. द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाददन्त.. (११) हे वसिष्ठ! तुम मित्र व वरुण के पुत्र हो. हे ब्रह्मन्! तुम उर्वशी के मन से उत्पन्न हुए हो. उर्वशी को देखकर मित्र व अरुण का वीर्य स्खलित हुआ था. उस समय सभी देवों ने दिव्य स्तोत्र बोलते हुए तुम्हें पुष्कर में धारण किया था. (११) स प्रकेत उभयस्य प्रतिद्वान्र्त्सहस्रदान उत वा सदानः. यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः.. (१२) उत्तम ज्ञान वाले वसिष्ठ स्वर्ग एवं धरती दोनों को जानकर हजार दान करने वाले अथवा सर्वस्व दान करने वाले हुए थे. यम के द्वारा विस्तृत वस्त्र को बुनने की अभिलाषा से वसिष्ठ अप्सरा से उत्पन्न हुए थे. (१२) सत्रे ह जाताविषितो नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम्. ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्.. (१३) यज्ञ में दीक्षित मित्र और वरुण ने दूसरे लोगो की स्तुतियां एवं प्रार्थनाएं मान कर अपना वीर्य एक साथ घड़े में स्खलित किया था. उस घड़े से अगस्त्य उत्पन्न हुए. लोग वसिष्ठ ऋषि को भी उसी घड़े से उत्पन्न बताते हैं. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*