रोगों की पहचान

रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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रोगों के उपचार में जल-
चिकित्सा का महत्व
जल-चिकित्सा द्वारा मनुष्य के शरीर के भीतर मौजूद गंदे पदार्थ को निकाला जा सकता है। इसमें निम्नलिखित स्थानों का खास महत्व है—
मेहन स्नान (जन्म के बाद बच्चे का पहला स्नान)
- ❑ बड़ा-सा टब लें।
- ❑ टब में एक काठ या प्लास्टिक की चौकी रख लें, जो एक तरफ से चंद्रकार हो। (इसी पर आपको बैठना है)
- ❑ उस टब में ठंडा पानी भरें। पानी इतना भरें कि चौकी पर आधा इंच तक आ जाए, ज्यादा ऊपर न आए।
अथवा
(यदि टब न हो)
- ❑ बाल्टी में पानी भर लें और खुद किसी स्टूल पर बैठ जाएँ। अब कपड़े खोलकर उस चौकी पर या स्टूल पर बैठें। फिर मूत्रेन्द्रिय की ऊपरी खाल को एक हाथ की उँगलियों से पकड़कर आगे खींच लें ताकि अंदर वाला भाग पूरी तरह ढक जाए और फिर अत्यन्त मुलायम कपड़े से बहुत धीरे-धीरे रगड़ें। यह क्रिया आप 20-25 मिनट तक कर लें। फिर पीठ में रीढ़ की हड्डी को ऊपर से नीचे तक लगभग दो मिनट तक गीले तौलिये से रगड़ें। ध्यान रहे कि बाकी अंग सूखे रहें और पानी मूत्रेन्द्रिय के अंदर न जाए।
अगर स्त्री है तो वो मेहन-स्नान के लिए एक हाथ से योनि के दोनों ओठों को पकड़कर अत्यन्त मुलायम कपड़े से योनि के दोनों तरफ
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