रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
श्री सद्गुरु वे नमः
रोगों की पहचान
सद्गुरु नाम की औषधि, खरी नीयत से खाय। अंग रोग व्यापै नहीं, महान् रोग मिट जाय ॥
—सत्तगुरु मधु परमहंस जी
साहिब
बन्दगी
सन्त आश्रम रंजड़ी, पोस्ट राया, ज़िला जम्मू
रोगों की पहचान
— सतगुरु मधुपरमहंस जी
प्रचार अधिकारी
— राम रतन, जम्मू
© SANT ASHRAM RANJARI (JAMMU )
ALL RIGHTS RESERVED
| First Edition | — | 2007 |
|---|---|---|
| Copies | — | 5000 |
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*santashram@ sahib-bandgi.org
*sadgurusahib@ sahib-bandgi.org
Editor
Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri
Post -Raya, Tehsil -Samba
Distt. - Jammu
Ph. (01923) 242695, 242602
Mudrak: Sartaj Printing Press
विषय सूची
पृष्ठ संख्या
| 1. रोगों के मुख्य कारण | 9 |
|---|---|
| 2. शरीर में दोषयुक्त पदार्थ का आगमण | 10 |
| 3. स्वस्थ शरीर की पहचान | 11 |
| 4. अस्वस्थ शरीर की पहचान | 12 |
| 5. रोगों के सामान्य चिह्न | 13 |
| 6. रोगों को दबाएँ मत | 14 |
| 7. दूषित पदार्थ के जमाव का स्थान और रोगों की संभावना | 15 |
| 8. कुछ खतरनाक रोगों के चिह्न | 20 |
| □ क्षय रोगों के चिह्न | 20 |
| □ ज़िगर की खराबी के चिह्न | 21 |
| □ कैंसर के चिह्न | 21 |
| □ गुर्दे की बीमारी के चिह्न | 21 |
| □ बाँझपन के चिह्न | 22 |
| □ गठिया की बीमारी के चिह्न | 22 |
| □ अँधेपन की बीमारी के चिह्न | 22 |
| □ हृदय की बीमारी के चिह्न | 22 |
| □ पागलपन की बीमारी के चिह्न | 23 |
| □ कुछ रोग के चिह्न | 23 |
| □ गले के ट्यूमर के चिह्न | 24 |
| □ दाँतों के रोग के चिह्न | 24 |
| □ बवासीर के चिह्न | 24 |
| 9. रोगों के उपचार में जल-चिकित्सा का महत्व | 25 |
| □ मेहन स्नान (जन्म के बाद बच्चे का पहला स्नान) | 25 |
| □ कटि स्नान (जन्म के बाद बच्चे का दूसरा स्नान) | 26 |
| □ पूर्ण टब का गर्म स्नान | 27 |
| □ भाप स्नान | 28 |
| □ नेत्र स्नान | 29 |
| □ नासिका स्नान | 29 |
| □ पैर का गर्म स्नान | 29 |
| □ स्थानीय भाप स्नान | 30 |
| □ गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान | 30 |
| □ गर्म सेंक | 31 |
| □ धूप स्नान | 31 |
3
| 0 | साधारण स्नान | 32 |
|---|
- | बीमारियों के बच्चे रहने के सरल और बेहतरीन उपाय | 33
- | रोगों से बच्चे रहने के पाँच सर्वोत्तम फार्मूले | 37
- | आयुर्वेद का महत्व | 41
- | रोगों के उपचार में आयुर्वेद के फार्मूले | 45 0 | कुछ रोग होने पर | 45 0 | क्षय रोग होने पर | 46 0 | हैजा होने पर | 46 0 | जुकाम होने पर | 46 0 | आँखों से दिखना कम हो जाने पर | 47 0 | आँखें दुखने पर | 48 0 | आँख आने पर | 49 0 | पोथकी (रोहें) रोग होने पर | 49 0 | अण्डकोषों में दर्द होने पर | 49 0 | पीलिया रोग होने पर | 50 0 | लू लगने पर | 51 0 | निमोनिया होने पर | 51 0 | आँव आने पर | 51 0 | बवासीर होने पर | 52 0 | अजीर्ण (बदहजमी) होने पर | 53 0 | मूत्र न आने पर | 53 0 | रुक-रुक कर पेशाब आने पर | 54 0 | बार-बार पेशाब आने पर | 54 0 | पेट में दर्द होने पर | 54 0 | पेट में सूजन होने पर | 54 0 | नाभि स्थान में दर्द होने पर | 54 0 | पेट में कीड़े होने पर | 54 0 | मंदाग्रि होने पर | 55 0 | पेट में गैस होने पर | 55 0 | गुर्दे की पथरी होने पर | 55 0 | माथे में दर्द होने पर | 57 0 | अल्मपित्त होने पर | 57 0 | पायरिया होने पर | 57 0 | खाँसी होने पर | 58 0 | दमा होने पर | 58 0 | ग्रहणी रोग होने पर | 59
4
| □ | प्रसव न होने पर | 60 |
|---|---|---|
| □ | प्रदर (लकोरिया) होने पर | 60 |
| □ | रक्त प्रदर होने पर | 60 |
| □ | श्वेत प्रदर होने पर | 61 |
| □ | बंध्यत्व होने पर | 61 |
| □ | गर्भ धारण के समय होने वाली पीड़ा पर | 61 |
| □ | कान के बहने पर | 62 |
| □ | कान में दर्द होने पर | 62 |
| □ | बहरापन होने पर | 62 |
| □ | गला बैठने पर | 63 |
| □ | दाँत दर्द होने पर | 63 |
| □ | दाँतों में बदबू आने पर | 64 |
| □ | दाँतों में कीड़े होने पर | 64 |
| □ | मसूड़ों में सूजन होने पर | 64 |
| □ | लीवर में वृद्धि होने पर | 64 |
| □ | पिती की बीमारी होने पर | 64 |
| □ | दस्त होने पर | 65 |
| □ | प्लीहा वृद्धि होने पर | 65 |
| □ | सिर दर्द होने पर | 65 |
| □ | आधे सिर में दर्द होने पर | 65 |
| □ | लकवा होने पर | 65 |
| □ | बच्चों के दाँत निकलते समय होने वाली पीड़ा | 66 |
| □ | बिस्तर पर मूत्र करने पर | 66 |
| □ | टॉसिल होने पर | 66 |
| □ | हिचकियाँ आने पर | 66 |
| □ | काली खाँसी होने पर | 66 |
| □ | मुँह में छाले होने पर | 67 |
| □ | चेचक होने पर | 67 |
| □ | उल्टियाँ होने पर | 67 |
| □ | खून बहने पर | 67 |
| □ | स्वप्रदोष होने पर | 67 |
| □ | नपुंसकता होने पर | 68 |
| □ | वीर्य की कमी होने पर | 68 |
| □ | दाद होने पर | 68 |
| □ | सुजाक होने पर | 68 |
| □ | मुँहासे होने पर | 69 |
| □ | खाज-खुजली होने पर | 70 |
5
| शरीर से दुर्गंध आने पर | 70 |
|---|---|
| जोड़ों में दर्द होने पर | 70 |
| गठिया होने पर | 70 |
| गंजापन होने पर | 71 |
| बाल झड़ने पर | 71 |
| घाव हो जाने पर | 71 |
| घाव में कीड़े होने पर | 71 |
| बाल सफेद होने पर | 71 |
| प्रमेह होने पर | 72 |
| मधुमेह रोग होने पर | 72 |
| बदन में दर्द होने पर | 74 |
| विषैले कीड़ों के काटने पर | 74 |
| सामान्य ज्वर | 75 |
| कफ का बुखार होने पर | 75 |
| पित्त से बुखार होने पर | 75 |
| वायु से बुखार होने पर | 76 |
| कैंसर होने पर | 76 |
| आग से जल जाने पर | 76 |
| उच्च रक्तचाप होने पर | 77 |
| निम्न रक्तचाप होने पर | 77 |
| 14. रोगों के निदान में कुछ लाजवाब फार्मूले | 78 |
|---|---|
| गुर्द की पीड़ा होने पर | 78 |
| बहरापन होने पर | 78 |
| क्षय रोग होने पर | 78 |
| 15. भोजन द्वारा रोगों का निदान | 80 |
|---|---|
| बादाम से रोगों का निदान | 80 |
| नीबू से रोगों का निदान | 81 |
| तुलसी से रोगों का निदान | 83 |
| सौंफ से रोगों का निदान | 84 |
| गन्ने से रोगों का निदान | 85 |
| शहद से रोगों का निदान | 85 |
| लहसुन से रोगों का निदान | 87 |
| अदरक से रोगों का निदान | 88 |
| आँवले से रोगों का निदान | 89 |
| प्याज से रोगों का निदान | 90 |
| सहजन से रोगों का निदान | 91 |
| हींग से रोगों का निदान | 92 |
| टमाटर से रोगों का निदान | 92 |
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| □ | धनिये से रोगों का निदान | 93 |
|---|---|---|
| □ | नारियल से रोगों का निदान | 94 |
| □ | लौकी से रोगों का निदान | 95 |
| □ | पपीते से रोगों का निदान | 95 |
| □ | सेब द्वारा रोगों का निदान | 96 |
| □ | जामुन द्वारा रोगों का निदान | 96 |
| □ | बथुआ से रोगों का निदान | 97 |
| □ | फालसे से रोगों का निदान | 98 |
| □ | मौसमी से रोगों का निदान | 98 |
| □ | दूध से रोगों का निदान | 99 |
| □ | अनन्नास से रोगों का निदान | 99 |
| □ | करेले से रोगों का निदान | 99 |
| □ | अजवायन से रोगों का निदान | 100 |
| □ | आम से रोगों का निदान | 101 |
| □ | नीम से रोगों का निदान | 102 |
| □ | लौंग से रोगों का निदान | 104 |
| □ | अमरूद से रोगों का निदान | 104 |
| □ | मुनक्के से रोगों का निदान | 105 |
| □ | हल्दी से रोगों का निदान | 105 |
| □ | पोदीने से रोगों का निदान | 106 |
| □ | गाजर से रोगों का निदान | 106 |
| □ | जीरे से रोगों का निदान | 108 |
| □ | अंगूर से रोगों का निदान | 108 |
| □ | चने से रोगों का निदान | 109 |
| □ | अनार से रोगों का निदान | 109 |
| □ | नारंगी से रोगों का निदान | 110 |
| □ | देसी घी से रोगों का निदान | 110 |
| □ | अखरोट से रोगों का निदान | 111 |
| □ | आलू से रोगों का निदान | 112 |
| □ | मूली से रोगों का निदान | 112 |
| □ | मैथी से रोगों का निदान | 113 |
| □ | गेहूँ से रोगों का निदान | 114 |
| □ | छाछ से रोगों का निदान | 114 |
| □ | तिल से रोगों का निदान | 115 |
| □ | काली मिर्च से रोगों का निदान | 115 |
| □ | राई से रोगों का निदान | 116 |
| □ | फिटकरी से रोगों का निदान | 116 |
16. जन्म-मरण का महारोग
7
117
8
साहिब बन्दगी
सतलोक अमरलोक बेगमपुरा
सत्य पुरुष
परम पुरुष, अविनाशी पुरुष ज्ञानी पुरुष और साहिब
मन के देहा
काल पुरुष निराकार, निरंजन अथवा मन की भूल भलाईया
सहस्रसागर चक्र अथवा गिरिजन लोक
पांचवा आकाश तत्व जो रारंकार से पैदा होता है, यह शरीर में मन रूप में समाया हुआ है। जो के सब का काल है सारा संसार इसी को ही सत्य पुरुष मान कर खोज रहा है।
अतल
वितल
सुतल
तलातल
महातल
रसातल
पाताल
- ● → सहज लोक
- ● → वार्णी लोक
- ● → इच्छा लोक
- ● → अंकुर लोक
- ● → मूल सुरति लोक
- ● → सोहेंग लोक
- ● → अचिन्त लोक
आज्ञा चक्र दो दल कमल यहाँ आत्मा का वास है।
कंठ चक्र-यहाँ आद्य शक्ति का वास है
शिवलोक - यहाँ शिव और पार्वती जी का वास है, 70 प्रकार की अनहद धुने यहाँ से उठती है तथा भंवर गुफा में सुनाई देती है। यही पर अग्नि तत्व है, जो ज्योति निरंजन (अलख निरंजन) से पैदा होता है।
विष्णु लोक - यहाँ विष्णु जी और लक्ष्मी जी का वास है। नाभि स्थान पर संपूर्ण शरीर का संचालन पेट हो करता है। वायु तत्व यहाँ पर है, जो सोहें शब्द से पैदा होता है।
ब्रह्मलोक - (स्वादिष्टान चक्र) यहाँ ब्रह्मा और सावत्री जी का वास है। यहाँ से संपूर्ण मैथुन सृष्टि का संचालन होता है। यहाँ जल तत्व है, जो ओंकार (ॐ) से पैदा होता है।
मूलाधार चक्र - (गुहा स्थान) यहाँ गणेश जी का वास है पृथ्वी तत्व यहाँ पर है, जो सत् शब्द से पैदा होता है।
मानव शरीर में लोकों की रचना
रोगों के मुख्य कारण
रोगों के मुख्य कारण
शरीर में दूषित पदार्थ का जमाव ही रोगों का मुख्य कारण है। रोग यानी शरीर में कोई दोष आ गया। यह दोष सर्वप्रथम पेड़ स्थान में पहुँचता है, फिर वहीं से शरीर के बाकी हिस्सों में चल पड़ता है। यानी रोग सबसे पहले पेड़ स्थान में ही पनपता है। फिर वहीं से अन्य जगहों की ओर चल पड़ता है और धीरे-धीरे इकट्ठा होकर रोग का रूप धारण कर लेता है।
मल-मूत्र के द्वारों के पास जमा यह दोष पहले-पहल तो पेशाब, मल आदि के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है, पर जब लगातार मनुष्य का खान-पान और रहने का वातावरण ठीक न होगा, तो कुछ-न-कुछ दोष बचा रह जाता है, जो धीरे-धीरे जमा होता जाता है।
जब भी मनुष्य के शरीर में दोष उत्पन्न हो जाते हैं तो उसकी शक्ल-सूरत में बदलाव आ जाता है, उसके शरीर का रंग, मुख की आकृति बदल जाती है। इस बदलाव को देखकर हम जान सकते हैं कि उसमें कुछ दोष है और वो रोगों की तरफ बढ़ रहा है। नज़रिया वैद्य इन्हीं बदलाव को देखकर जान जाते हैं कि रोगी को भविष्य में कौन से रोग हो सकते हैं।
इसे मुखाकृति विज्ञान भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें खासतौर पर मुख की आकृति को देखकर आने वाले रोगों को समझा जा सकता है।
इस परख का बहुत बड़ा लाभ यह है कि आम इंसान भी दोषयुक्त पदार्थ के जमाव को देखकर जान सकता है कि आगे रोग होने वाला है और समय रहते ही उससे बच सकता है।
इसमें रोगों के डाक्टरों नामों का कोई संबंध नहीं है। इसमें दूषित पदार्थ का जमाव ही मुख्य बात है। शरीर के एक हिस्से में दूषित पदार्थ का जमाव कई तरह के रोग उत्पन्न करता है।
9
शरीर में दोषयुक्त पदार्थ का आगमन
शरीर में दोषयुक्त पदार्थ का आगमन
शरीर में दोषयुक्त पदार्थ मुख्य, नाक और त्वचा के रोम-छिद्रों से अंदर आ जाता है। साधारणतया स्वाँस प्रक्रिया से या खाने की प्रक्रिया से अगर गंदा पदार्थ अंदर आ जाता है, तो वो बाहर भी स्वयं ही हो जाता है। फेफड़े, आँतें, मूत्राशय आदि अंग बेकार पदार्थ को बाहर निकालने में लगे रहते हैं। पर जब दूषित पदार्थ अधिक मात्रा में अंदर आ जाता है तो फिर शरीर के ये अंग उसे पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकाल पाते हैं और वही रोग का कारण बन जाता है। मुख्य रूप से दूषित भोजन, दूषित हवा और दूषित पानी से दोषयुक्त पदार्थ हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।
गुरु कीजिये जानि के, पानी पीजै छानि। बिना बिचारे गुरु करे, पैरै चौरासी खानि ॥
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स्वस्थ शरीर की पहचान
स्वस्थ शरीर की पहचान
यदि हमें एक तंदुरुस्त शरीर की आकृति, रंग-रूप और क्रिया-कलापों का ठीक-ठीक ज्ञान होगा, तभी हम रोगी को पहचान सकते हैं। एक स्वस्थ शरीर की निम्नलिखित पहचान होती है—
- ❑ स्वस्थ शरीर में सभी अंग सुंदर और सुडौल होते हैं।
- ❑ स्वस्थ शरीर में छाती धनुषाकार होती है।
- ❑ मस्तक सपाट होता है; उसमें चर्बी से बनी गद्दी नहीं होती।
- ❑ पैरों को टाँगों से अलग करने वाली रेखा बिलकुल स्पष्ट होती है।
- ❑ पैर पूर्ण विकसित होते हैं।
- ❑ नाक भी सुंदर और सुगठित होती है; न अधिक मोटी होती है, न अधिक पतली।
- ❑ आँखें साफ और बड़ी होती हैं।
- ❑ हाँठ भी सुंदर होते हैं; वे ज्यादा मोटे नहीं होते।
- ❑ दुड्डी भी सुंदर और गोल होती है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में मल-विसर्जन आसानी से होता है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में भोजन भी आसानी से पच जाता है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में भूख अच्छी लगती है और खाने के बाद भारीपन नहीं लगता।
- ❑ स्वस्थ शरीर में अधिक परिश्रम करने के बाद सुख की अनुभूति होती है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में नींद भी गहरी आती है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में नाक के नीचे की सीमा रेखा साफ-साफ दिखाई देती है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में तेज झलकता है।
- ❑ स्वस्थ शरीर में सिर निर्बाध रूप से दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे घुमाया जा सकता है।
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अस्वस्थ शरीर की पहचान
अस्वस्थ शरीर की पहचान
मोटापा अस्वस्थ शरीर की सबसे बड़ी और आसान पहचान है।
अस्वस्थ शरीर की आकृति सुंदर न होकर भद्दी होती है, उसके अंग भी सुडौल न होकर बेडौल होते हैं।
अस्वस्थ शरीर में पैर धड़ के मुकाबले छोटे और मोटा आकार लिए हुए होते हैं।
अस्वस्थ शरीर में सिर को गर्दन से अलग करने वाली रेखा साफ दिखाई नहीं देती।
अस्वस्थ शरीर में मस्तक ऊँचा न होकर झुका हुआ होता है।
अस्वस्थ शरीर में सिर चर्बी से भरा होता है।
अस्वस्थ शरीर में सिर मस्तक के ऊपर गंज लिए हुए होता है।
अस्वस्थ शरीर में आँखें भी पूरी खुली हुई नहीं होतीं, उनमें तनाव भी बराबर दिखाई देता है।
अस्वस्थ शरीर में मुँह खुला-सा होता है।
कंधों का ढीला होना भी अस्वस्थ शरीर की निशानी है।
अस्वस्थ शरीर की नाक भी सुंदर न होकर मोटी-सी होती है।
बाल वाले स्थानों पर बालों का न होना भी अस्वस्थ शरीर की निशानी है।
अस्वस्थ शरीर की त्वचा रूखी होती है।
अस्वस्थ शरीर की त्वचा से बदबू आती है।
शरीर का रंग बहुत पीला होना या बहुत लाल होना भी अस्वस्थ शरीर की निशानी है।
गर्दन इतनी छोटी हो कि दिखाई न पड़े या इतनी लंबी हो कि अजीब-सी लगे तो यह भी अस्वस्थ शरीर की निशानी है।
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रोगों के सामान्य चिह्न
रोगों के सामान्य चिह्न
किसी के शरीर में मौजूद निम्नलिखित में से एक या एक से अधिक चिह्नों को देखकर हम साधारण रूप से यह जान सकते हैं कि यह व्यक्ति रोगी है, इसे कोई-न-कोई रोग अवश्य है।
- ❑ जब भी पेशाब ठीक से न हो, उसमें कष्ट का अनुभव हो, उसका रंग लाल, हरा, काला या गाढ़ा हो तो समझ लेना चाहिए कि कुछ रोग है।
- ❑ जब भी भोजन के बाद भारीपन लगे, कुछ बेचैनी लगे तो समझ लेना चाहिए कि कुछ रोग है।
- ❑ यदि आप सोकर जगने पर परेशानी महसूस करते हैं तो यह भी रोग का चिह्न है।
- ❑ प्यास लगने पर पानी पीने का दिल न करे, बल्कि कुछ और लेने का दिल करे तो समझ लेना चाहिए कि रोग है।
- ❑ जब चाल में अंतर आ जाए तो समझ लेना चाहिए कि कुछ बीमारी है।
- ❑ यदि मल पतला, काला या सख्त हो तो यह भी रोग की निशानी है।
- ❑ यदि आप सिर को दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे घुमाने में तकलीफ महसूस करते हैं तो यह रोग का ही चिह्न है।
- ❑ यदि सोते समय आपका मुँह खुला रहता है तो यह भी रोग का ही चिह्न है।
- ❑ यदि अधिक शारीरिक परिश्रम करने के बाद बेचैनी हो, कष्ट की अनुभूति हो तो यह भी रोग की निशानी है।
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रोगों को दबाएँ मत
रोगों को दबाएँ मत
दूषित पदार्थ को शरीर स्वयं ही बाहर निकालने का प्रयास करता है। यदि पाचन-शक्ति अच्छी है तो दूषित पदार्थ बड़े आराम से बाहर हो जाता है। जब दूषित पदार्थ का जमाव अधिक हो जाता है तो रक्त-पित्त, फोड़ा, घाव, पाँव-पसीजना, खूनी बवासीर आदि की परेशानी हो जाती है। यह सब इसलिए होता है कि शरीर को उस दोषयुक्त पदार्थ को बाहर निकालने का रास्ता नहीं मिल रहा होता है। ऐसे में यह सब हो जाता है। शरीर इनके माध्यम से दूषित पदार्थ को निकालने की कोशिश करता है। पर हम डाक्टर की दवा से इन्हें दबा देते हैं, जिसका परिणाम कभी तो तुरंत बाद और कभी आगे चलकर हानिकारक होता है। यह पदार्थ कहीं ओर चलकर नयी मुसीबत खड़ी कर देता है और हम सोचते हैं कि आसमान से गिरे और खजूर में अटके। वास्तविकता यह थी कि हमने सही इलाज नहीं किया और प्राकृतिक चिकित्सा भी रोक दी।
कफ का होना इस बात का संकेत है कि शरीर में मौजूद दूषित पदार्थ को शरीर बाहर करने का प्रयास कर रहा है। यदि दवा द्वारा उसे दबा देंगे तो टी. बी. जैसे भयंकर रोग का भी जन्म हो सकता है। फेफड़ों के लिए यह काम बड़ा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। क्योंकि ऐसे में दूषित पदार्थ सीधा रक्त में मिल सकता है।
दूषित पदार्थ को बाहर करने में जीवनी-शक्ति का बहुत योगदान होता है। फिर ऊपर से उम्र भी इस पर अपना वजन रखती है यानी बूढ़े शरीर से दोष को बाहर करना कठिन हो जाता है। पर यदि जीवनी-शक्ति हो तो बड़ी उम्र भी आड़े नहीं आती, समय जरूर ज्यादा लग सकता है। कभी भी रोग को दबाने का प्रयास न करें, हमेशा उसे बाहर करने के सरल और प्राकृतिक उपाय समझें।
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दूषित पदार्थ के जमाव का स्थान और रोगों की संभावना
दूषित पदार्थ के जमाव का स्थान और रोगों की संभावना
शरीर में दोषयुक्त पदार्थ का जमाव शरीर के अगले भाग में हो सकता है, दाएँ या बाएँ भी हो सकता है, पीछे के भाग में भी हो सकता है और पूरे शरीर में भी।
पीछे के भाग में दूषित पदार्थ का जमाव सबसे खतरनाक माना जाता है, दाएँ और बाएँ स्थान में उससे कम और आगे के भाग में दोषयुक्त पदार्थ का जमाव सबसे कम हानिकारक होता है।
शरीर में जमा हुआ दूषित पदार्थ ही शरीर की आकृति को बिगाड़ता है।
सबसे पहले दूषित पदार्थ पेड़ में इकट्ठा होता है। फिर वहाँ से सिर, हाथ या पैरों की ओर बढ़ता जाता है। यह इतनी धीरे-धीरे बढ़ता है कि इंसान को पता नहीं चल पाता है। जब यह गर्दन जैसे तंग मार्ग से निकलता है और वहाँ इसका जमाव स्पष्ट दिखाई पड़ जाता है। वहाँ या तो सूजन होगी या फिर छोटे-छोटे पिण्ड बन जायेंगे, जिन्हें देखकर कोई भी रोग होने की संभावना को समझ सकता है। कभी-कभी यह गले की सूजन भी आसानी से दिखाई नहीं देती है। इसके लिए गर्दन को आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ घुमाकर देखना पड़ता है। सूजन और पिण्डों के अलावा त्वचा का रंग भी बदल जाता है। कभी तो त्वचा बहुत लाल हो जाती है, कभी भूरी, कभी बदरंग, कभी स्लेटी रंग की तो कभी बड़ी पीली।
अब समझने की बात यह है कि दूषित पदार्थ पीछे की ओर, दाएँ-बाएँ में कैसे जाता है! दोष का मुख्य स्थान तो पेट था, पर किसी का दोष पीछे की ओर, किसी का बाईं ओर से तो किसी का सामने की
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साहिब बन्दगी
ओर से बढ़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सभी आदमी एक तरह नहीं सोते। कुछ दाईं करवट लेकर ज्यादा सोते हैं तो कुछ बाईं करवट लेकर। कुछ सीधा सोते हैं तो कुछ लगातार समय-समय पर करवट बदलते रहते हैं। ऐसे में सोने की स्थिति अनुसार ही उसका दोष उन दिशाओं में बढ़ सकता है। ऐसे में कुछ के शरीर में दूषित द्रव्य मिला-जुला हो जाता है यानी दाएँ और सामने की ओर या फिर बाएँ और पीछे की ओर या फिर कभी पूरे शरीर में भी वो दूषित द्रव्य फैल जाता है।
सामने के भाग में दूषित पदार्थ के जमाव से रंग-रूप में पड़ने वाले अंतर
जब दूषित पदार्थ का जमाव सामने की ओर होता है तो शरीर में निम्नलिखित में से कुछ बदलाव आ सकते हैं—
- ❑ चेहरा भारी-सा लगने लगता है।
- ❑ गर्दन आगे की तरफ से कुछ बड़ी हो जाती है।
- ❑ चेहरे और गर्दन को अलग करने वाली सीमा-रेखा कुछ पीछे चली जाती है।
- ❑ माथे पर चर्बीदार गद्दी बन जाती है।
- ❑ गर्दन पर छोटे-छोटे पिण्ड या बड़ा-सा पिण्ड भी बन जाता है।
- ❑ गाल पर सिकुड़न पड़ जाती है।
- ❑ सिर साइड से गंजा हो जाता है।
- ❑ नीचे का होंठ मोटा हो जाता है।
- ❑ टुट्टी बढ़ जाती है।
- ❑ चमड़ी का रंग बहुत पीला हो जाता है या फिर बहुत लाल हो जाता है।
- ❑ आँखें दब-सी जाती हैं।
- ❑ सिर का ऊपरी हिस्सा बड़ा हो जाता है।
रोगों की पहचान
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- ❑ पेट बाहर की ओर निकल आता है।
- ❑ मुँह खुला-सा हो जाता है।
रोग होने की संभावना
- ❑ फेफड़े खराब होने की संभावना रहती है।
- ❑ दाँतों के खराब होने की संभावना रहती है।
- ❑ आँख के रोग होने की संभावना रहती है।
- ❑ सिर में गंज पड़ सकती है।
- ❑ खसरा (एक प्रकार का दानेदार संक्रामक रोग) हो सकता है।
- ❑ ज्वर हो सकता है।
सामने के भाग में यदि दूषित पदार्थ जमा हो जाए तो उसे निकालना मुश्किल नहीं होता है। इससे उत्पन्न रोग दाएँ-बाएँ के जमाव से भयंकर नहीं होते।
दाएँ या बाएँ भाग में दूषित पदार्थ के जमाव से रंग-रूप में आने वाले बदलाव
जब गंदे पदार्थ का जमाव दाएँ या बाएँ भाग में होता है तो शरीर में निम्नलिखित में से कुछ बदलाव आ सकते हैं-
- ❑ सिर दाएँ या बाएँ, जहाँ भी दूषित पदार्थ इकट्ठा होगा, वहाँ की तरफ झुक जाता है।
- ❑ जिस ओर जमाव होगा, उस तरफ की गर्दन फूली हुई और सख्त हो जाती है।
- ❑ दाएँ या बाएँ में से, जहाँ दूषित पदार्थ का जमाव होगा, केवल वहाँ का हिस्सा बड़ा और चौड़ा हो जाने की वजह से पूरा शरीर बेडौल हो जाता है।
- ❑ दूषित पदार्थ के जमाव वाली साइड से चेहरा ज्यादा लंबा हो जाता है।
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साहिब बन्दगी
- ▯ दूषित पदार्थ के जमाव वाली तरफ से सिर और गर्दन की मध्य की रेखा साफ दिखाई नहीं पड़ती है।
- ▯ एक साइड का पैर भी दूसरे पैर की अपेक्षा अधिक मोटा होगा।
- ▯ पेट भी बाहर की ओर हो सकता है। यह तो रोग का महा चिह्न है। फिर दोष किस तरफ है, यह भी कभी-कभी स्पष्ट दिख पड़ता है।
रोग की संभावना
- ▯ वर्षों तक रहने वाला आधे सिर का दर्द हो जाता है।
- ▯ आँखें खराब हो जाती हैं। मोतियाबिंद हो जाता है।
- ▯ दाँत खराब होकर टूट जाते हैं।
- ▯ ज्वर की संभावना बाईं तरफ के जमाव में ज्यादा रहती है।
पीछे के भाग में गंदे द्रव्य के जमाव से
रंग-रूप में आने वाले बदलाव
जब शरीर में गंदे पदार्थ का जमाव पीछे की ओर हो जाता है तो निम्नलिखित में से कुछ बदलाव स्पष्ट दिख सकते हैं—
- ▯ कंधे गोल हो जाते हैं।
- ▯ माथे पर चर्बी की गद्दी बन जाती है।
- ▯ पीछे की तरफ से सिर बड़ा हो जाता है।
- ▯ चाल डगमगा जाती है।
- ▯ गर्दन दाएँ-बाएँ नहीं घुमाए जा सकती है।
- ▯ गर्दन और सिर के पीछे के भाग की रेखा दिखाई नहीं पड़ती।
- ▯ कभी-कभी गर्दन सिर जितनी बड़ी हो जाती है।
- ▯ कूबड़ निकल जाता है।
रोगों की संभावना
- ▯ याददाश्त कमज़ोर हो सकती है।
रोगों की पहचान
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- ❑ दिमागी नुक्स हो सकता है।
- ❑ बच्चों को तेज बुखार हो सकते हैं।
- ❑ पति-पत्नी दोनों के पिछले भाग में यह जमाव होने से संतान उत्पत्ति नहीं हो सकती है।
पीछे के भाग में दूषित पदार्थ का जमाव मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है। यह बड़ा खतरनाक सिद्ध होता है। इससे शीघ्र ही सही विधि से बचने का प्रयास करना चाहिए।
मिश्रित भागों में रोगों के जमाव से होने वाले रोग और बदलाव
अधिकतर गंदे पदार्थ का जमाव मिश्रित भागों में होता है। जैसे पीछे और बाईं या दाईं ओर। कभी आगे और दाईं ओर। फिर जब ये दोनों तरफ के जमाव आपस में मिल जाते हैं तब कई भयंकर रोगों की उत्पत्ति होती है। तो बदलाव इस तरह के हो सकते हैं-
- ❑ मुँह खुला-सा हो जाता है।
- ❑ नाक बहुत पतली या मोटी हो जाती है।
- ❑ सिर बहुत बड़ा हो जाता है।
- ❑ आँखें दब-सी जाती हैं
- ❑ कंधे ढीले हो जाते हैं।
विभिन्न भागों के जमाव में जो बदलाव आते हैं, उनमें से कोई भी बदलाव आ सकता है।
रोगों की संभावना
- ❑ बहरापन आ सकता है।
- ❑ आँख से अंधापन आ सकता है।
- ❑ दाँत खराब होकर टूटने लग सकते हैं।
कुछ खतरनाक रोगों के चिह्न
कुछ खतरनाक रोगों के चिह्न
क्षय रोग के चिह्न
जब भी पेट में पिण्ड बनने लगे, चेहरे का रंग लाल और चमकदार होने लगे और चेहरा चौरस शक्ल लेने लगे तो समझ जाना चाहिए कि इंसान क्षय रोग की ओर बढ़ रहा है।
ऐसे में नाक पहले फूलती है और फिर बाद में पतली होती जाती है। गले में पिण्ड बनने लगते हैं और गला लंबा होने लगता है। मुँह खुला-सा हो जाता है। नाक पुरानी बलगम से भर जाती है और भीतर से काली पड़ने लगती है।
क्षय रोग सामने और पीछे दोनों में से किसी भी तरफ के जमाव से हो सकता है। पर यदि पीछे के जमाव से हुआ तो खतरनाक होता है। ऐसे में छाती या पीठ पर फोड़े भी निकलते हैं, जो शरीर द्वारा दूषित द्रव्य को बाहर निकालने का प्रयास होता है। पर उष्ण या जीवनी-शक्ति की कमजोरी आड़े आती है तो दोष बाहर नहीं हो पाता और यही दोष सख्त होकर गाँठों की शक्ल ले लेता है। दर्द न होने से मनुष्य को इस रोग का पता भी नहीं चल पाता है।
जिन बच्चों को गंठमाल होता है, वे क्षय रोग की ओर बढ़ रहे होते हैं।
इसका एक और लक्षण है कि ऐसे बच्चों को प्रायः सर्दी और खाँसी की शिकायत होती रहती है। यदि यह सर्दी और खाँसी लंबे समय तक समय-समय पर होती है तो क्षय रोग का संकेत समझा जा सकता है।
जिस मनुष्य के शरीर का रंग पीला या निर्जीव हो, सिर आगे की
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