श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या प्राकथन ..... ६-५
पहला अध्याय
१-११ पाण्डव और कौरव-सेनाके मुख्य-मुख्य महारथियोंके नामोंका वर्णन (विशेष बात ३५) ..... २५-३६ १२-१९ दोनों पक्षोंकी सेनाओंके शंखवादनका वर्णन ..... ३७-४२ २०-२७ अर्जुनके द्वारा सेना-निरीक्षण ..... ४३-४८ २८-४७ अर्जुनके द्वारा कायरता, शोक और पश्चातापयुक्त वचन कहना तथा संजयद्वारा शोकाविष्ट अर्जुनकी अवस्थाका वर्णन ..... ४८-६३ (विशेष बात ५५, ६१) पहले अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... ६४ पहले अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... ६४
दूसरा अध्याय
१-१० अर्जुनकी कायरताके विषयमें संजय-द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका वर्णन ..... ६५-७६ (विशेष बात ७०) ११-३० सांख्ययोगका वर्णन ..... ७६-१११ (विशेष बात ८०, ८७; मार्मिक बात ८९; विशेष बात ९३, ९३, ९९, १०२; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात १०९) ३१-३८ क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन ..... १११-११७ (प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ११६) ३९-५३ कर्मयोगका वर्णन ..... ११७-१४० (समता-सम्बन्धी विशेष बात १२०; विशेष बात १२४; मार्मिक बात १२८; बुद्धि और समता-सम्बन्धी विशेष बात १३२) ५४-७२ स्थितप्रज्ञके लक्षणों आदिका वर्णन ..... १४०-१६६ (मार्मिक बात १५३; अहंता-ममतासे रहित होनेका उपाय १६१; विशेष बात १६४) दूसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... १६६ दूसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... १६६
तीसरा अध्याय
१-८ सांख्ययोग और कर्मयोगकी दृष्टिसे
श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या
कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता-का निरूपण ..... १६८-१८२ (मार्मिक बात १७१, १७३; विशेष बात १७५; साधन-सम्बन्धी मार्मिक बात १८१) ९-१९ यज्ञ और सृष्टिचक्रकी परम्परा सुरक्षित रखनेके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण ..... १८२-२०८ (मार्मिक बात १८४; कर्तव्य और अधिकार-सम्बन्धी मार्मिक बात १८८; कर्तव्य-सम्बन्धी विशेष बात १९१; मार्मिक बात २०१; विशेष बात २०२, २०५; मार्मिक बात २०८)
२०-२९ लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण ... २०८-२२८ (परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी मार्मिक बात २०९; विशेष बात २१३, २१८, २१९, २२२, २२३; गुण-कर्मविभागको तत्वसे जाननेका उपाय २२५; प्रकृति-पुरुष-सम्बन्धी मार्मिक बात २२६; विशेष बात २२७)
३०-३५ राग-द्वेषरहित होकर स्वधर्मके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा. २२९-२५१ (अर्पण-सम्बन्धी विशेष बात २२९; कामना-सम्बन्धी विशेष बात २३०; विशेष बात २३२; राग-द्वेषपर विजय पानेके उपाय २४०; सेवा-सम्बन्धी मार्मिक बात २४३; मार्मिक बात २४८; स्वधर्म और परधर्म-सम्बन्धी मार्मिक बात २५०)
३६-४३ पापोंके कारणभूत 'काम'को मारनेकी प्रेरणा ..... २५१-२७१ (कामना-सम्बन्धी विशेष बात २५३; विशेष बात २५६, २५९, २६२; मार्मिक बात २६७, २६९) तीसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... २७१ तीसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... २७१
चौथा अध्याय
१-१५ कर्मयोगकी परम्परा और भगवान्के जन्मों तथा कर्मोंकी दिव्यताका वर्णन ..... २७४-३१०