भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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प्राप्तिको ही गीताने 'योग' नामसे कहा है, और इसीको 'नित्ययोग' कहते हैं।

गीतामें केवल कर्मयोगका, केवल ज्ञानयोगका अथवा केवल भक्तियोगका ही वर्णन हुआ हो—ऐसी बात भी नहीं है। इसमें उपर्युक्त तीनों योगोंके अलावा यज्ञ, दान, तप, ध्यानयोग, प्राणायाम, हठयोग, लययोग आदि साधनोंका भी वर्णन किया गया है। इसका खास कारण यही है कि गीतामें अर्जुनके प्रश्न युद्धके विषयमें नहीं हैं, प्रत्युत कल्याणके विषयमें हैं और भगवान्के द्वारा गीता कहनेका उद्देश्य भी युद्ध

साधनकी दो शैलियाँ

जीवमें एक तो चेतन परमात्माका अंश है और एक जड़ प्रकृतिका अंश है। चेतन-अंशकी मुख्यतासे वह परमात्माकी इच्छा करता है और जड़-अंशकी मुख्यतासे वह संसारकी इच्छा करता है। इन दोनों इच्छाओंमें परमात्माकी इच्छा तो पूरी होनेवाली है, पर संसारकी इच्छा कभी पूरी होनेवाली है ही नहीं। कुछ सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति होती हुई दीखनेपर भी वास्तवमें उनकी निवृत्ति नहीं होती, प्रत्युत संसारकी आसक्तिके कारण नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती रहती हैं। वास्तवमें सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति अर्थात् सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति इच्छाके अधीन नहीं है, प्रत्युत कर्मके अधीन है। परन्तु परमात्माकी प्राप्ति कर्मके अधीन नहीं है। स्वयंकी उत्कट अभिलाषामात्रसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक कर्मका आदि और अन्त होता है; इसलिये उसका फल भी आदि-अन्तवाला ही होता है। अतः आदि-अन्तवाले कर्मोंसे अनादि-अनन्त परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? परन्तु साधकोंने प्रायः ऐसा समझ रखा है कि जैसे क्रियाकी प्रधानतासे सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति होती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्ति भी उसी प्रकार क्रियाकी प्रधानतासे ही होगी और जैसे सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी उसी प्रकार शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ेगी। इसलिये ऐसे साधक जडता-(शरीरादि)-की सहायतासे अभ्यास करते हुए परमात्माकी तरफ चलते हैं।

जैसे ध्यानयोगमें दीर्घकालतक अभ्यास करते-करते अर्थात् परमात्मामें चित्तको लगाते-लगाते जब चित्त निरुद्ध हो जाता है, तब उसमें संसारकी कोई इच्छा न रहनेसे और स्वयं जड़ होनेके कारण परमात्माको ग्रहण न कर सकनेसे वह (चित्त) संसारसे उपराम हो जाता है। चित्तके उपराम

करानेका बिलकुल नहीं है। अर्जुन अपना निश्चित कल्याण चाहते थे (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। इसलिये शास्त्रोंमें जितने कल्याणकारक साधन कहे गये हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंका गीतामें संक्षेपसे विशद वर्णन मिलता है। उन साधनोंको लेकर ही साधक-जगत्में गीताका विशेष आदर है। कारण कि साधक चाहे किसी मतका हो, किसी सम्प्रदायका हो, किसी सिद्धान्तको माननेवाला हो, पर अपना कल्याण तो सबको अभीष्ट है।

होनेसे साधकका चित्तसे अर्थात् जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और वह स्वयंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है (गीता—छठे अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो साधक आरम्भसे ही परमात्माके साथ अपना स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्ध मानकर और जडतासे अपना किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न मानकर साधन करता है, उसको बहुत जल्दी और सुगमतापूर्वक परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।

इस प्रकार परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधकोंके लिये साधनकी दो शैलियाँ हैं। जिस शैलीमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है अर्थात् जिसमें साधक जडताकी सहायता लेकर साधन करता है, उसको 'करण-सापेक्ष-शैली' नामसे और जिस शैलीमें स्वयंकी प्रधानता रहती है अर्थात् जिसमें साधक आरम्भसे ही जडताकी सहायता न लेकर स्वयंसे साधन करता है, उसको 'करण-निरपेक्ष-शैली' नामसे कह सकते हैं। यद्यपि इन दोनों ही साधन-शैलियोंसे परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति कारण-निरपेक्षतासे अर्थात् स्वयंसे (जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर) ही होती है, तथापि 'करण-सापेक्ष-शैली'से चलनेपर उसकी प्राप्ति देरीसे होती है और 'करण-निरपेक्ष-शैली'से चलनेपर उसकी प्राप्ति शीघ्रतासे होती है। साधनकी इन दोनों शैलियोंमें चार मुख्य भेद हैं—

(१) कारण-सापेक्ष-शैलीमें जडता-(शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-का) आश्रय लेना पड़ता है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें जडताका आश्रय नहीं लेना पड़ता, प्रत्युत जडतासे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करना पड़ता है।

(२) कारण-सापेक्ष-शैलीमें एक नयी अवस्थाका निर्माण होता है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें अवस्थाओंसे सम्बन्धविच्छेद होकर अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव होता है।

(३) कारण-सापेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियों-(सिद्धियों-)की प्राप्ति होती है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियोंसे

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