भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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[ ४ ]

‘सम्बन्ध-विच्छेद होकर सीधे परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है।’

(४) करण-सापेक्ष-शैलीमें कभी तत्काल सिद्धि नहीं मिलती, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर, अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर अथवा भगवान्के शरण होनेपर तत्काल सिद्धि मिलती है।

पातंजलयोगदर्शनमें तो योगकी सिद्धिके लिये करण-सापेक्ष-शैलीको महत्त्व दिया गया है, पर गीतामें योगकी सिद्धिके लिये करण-निरपेक्ष-शैलीको ही महत्त्व दिया गया है। परमात्मामें मन लग गया, तब तो ठीक है, पर मन नहीं लगा तो कुछ नहीं हुआ—यह करण-सापेक्ष-शैली है। परमात्मामें मन लगे या न लगे, कोई बात नहीं, पर स्वयं परमात्मामें लग जाय—यह करण-निरपेक्ष-शैली है। तात्पर्य यह है कि करण-सापेक्ष-शैलीमें परमात्माके साथ मन-बुद्धिका सम्बन्ध है और करण-निरपेक्ष-शैलीमें मन-बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक परमात्माके साथ स्वयंका सम्बन्ध है। इसलिये करण-सापेक्ष-शैलीमें अभ्यासके द्वारा क्रमसे सिद्धि होती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है। कारण कि स्वयंका परमात्माके साथ स्वतःसिद्धि नित्य-सम्बन्ध (नित्ययोग) है। अतः भगवान्ने सम्बन्ध मानने अथवा जाननेमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है; जैसे—विवाह होनेपर स्त्री पुरुषको अपना पति मान लेती है, तो ऐसा माननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता। इसी तरह किसीके बतानेपर ‘यह गंगाजी हैं’—ऐसा जाननेके लिये भी कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता१। करण-सापेक्ष-शैलीमें तो अपने लिये साधन करने—(क्रिया-) की मुख्यता रहती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जानने (विवेक) और मानने—(भाव-) की मुख्यता रहती है।

‘मेरा जड़ता—(शरीरादि-—)से सम्बन्ध है ही नहीं’—ऐसा अनुभव न होनेपर भी जब साधक इसको आरम्भसे

ही दृढ़तापूर्वक मान लेता है, तब उसे ऐसा ही स्पष्ट अनुभव हो जाता है। जैसे वह ‘मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है’—इस प्रकार गलत मान्यता करके बँधा था, ऐसे ही ‘मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है’—इस प्रकार सही मान्यता करके मुक्त हो जाता है; क्योंकि मानी हुई बात न माननेसे मिट जाती है—यह सिद्धान्त है। इसी बातको भगवान्ने गीतामें कहा है कि अज्ञानी मनुष्य शरीरसे सम्बन्ध जोड़कर उससे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (३। २७)। परन्तु ज्ञानी मनुष्य उन क्रियाओंका कर्ता अपनेको नहीं मानता—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ (५। ८)। तात्पर्य यह हुआ कि अवास्तविक मान्यताको मिटानेके लिये वास्तविक मान्यता करनी जरूरी है।

‘मैं हिन्दू हूँ’, ‘मैं ब्राह्मण हूँ’, ‘मैं साधु हूँ’ आदि मान्यताएँ इतनी दृढ़ होती हैं कि जबतक इन मान्यताओंको स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक इनको कोई दूसरा नहीं छोड़ा सकता। ऐसे ही ‘मैं शरीर हूँ’, ‘मैं कर्ता हूँ’ आदि मान्यताएँ भी इतनी दृढ़ हो जाती हैं कि उनको छोड़ना साधकको कठिन मालूम देता है। परन्तु ये लौकिक मान्यताएँ अवास्तविक, असत्य होनेके कारण सदा रहनेवाली नहीं हैं, प्रत्युत मिटनेवाली हैं। इसके विपरीत ‘मैं शरीर नहीं हूँ’, ‘मैं भगवान्का हूँ’ आदि मान्यताएँ वास्तविक, सत्य होनेके कारण कभी मिटती ही नहीं, प्रत्युत उनकी विस्मृति होती है, उनसे विमुखता होती है। इसलिये वास्तविक मान्यता दृढ़ होनेपर मान्यतारूपसे नहीं रहती, प्रत्युत बोध—(अनुभव-—)में परिणत हो जाती है।

यद्यपि गीतामें करण-सापेक्ष-शैलीका भी वर्णन किया गया है (जैसे चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवेंतक तथा चौतीसवों श्लोक, छठे अध्यायके दसवेंसे अठ्ठाईसवेंतक, आठवें अध्यायके आठवेंसे सोलहवेंतक और पन्द्रहवें

१-अगर करण-सापेक्ष-शैली—(चित्तवृत्तिनिरोध-—)से सीधे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती, तो पातंजलयोगदर्शनका ‘विभूतिपाद’ (जिसमें सिद्धियोंका वर्णन है) व्यर्थ हो जाता। करण-सापेक्ष-शैलीसे जिन सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है, वे तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विघ्न हैं। पातंजलयोगदर्शनमें भी उन सिद्धियोंको विघ्नरूपसे माना गया है—‘ते समाधावृत्तिसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः’ (३। ३७) अर्थात् वे (सिद्धियाँ) समाधिकी सिद्धिमें विघ्न हैं और व्युत्थान—(व्यवहार-—)में सिद्धियाँ हैं; ‘स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गमयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्’ (३। ५१) अर्थात् लोकपाल देवताओंके द्वारा (अपने लोकोंके भोगोंका लालच देकर) बुलानेपर न तो उन भोगोंमें राग करना चाहिये और न अभिमान करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट (पतन) होनेकी सम्भावना है।

२-वास्तवमें परमात्माको मानने अथवा जाननेके विषयमें संसारका कोई भी दृष्टान्त पूरा नहीं घटता। कारण कि संसारको मानने अथवा जाननेमें तो मन-बुद्धि साथमें रहते हैं, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेमें मन-बुद्धि साथमें नहीं रहते अर्थात् परमात्माका अनुभव स्वयंसे होता है, मन-बुद्धिसे नहीं। दूसरी बात, संसारको मानने अथवा जाननेका तो आरम्भ और अन्त होता है, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेका आरम्भ और अन्त नहीं होता। कारण कि वास्तवमें संसारके साथ हमारा (स्वयंका) सम्बन्ध है ही नहीं, जबकि परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध सदासे ही है और सदा ही रहेगा।

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