श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक आदि) तथापि मुख्यरूपसे करण-निर्पेक्ष-शैलीका ही वर्णन हुआ है। (जैसे दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ तथा पचपनवाँ, तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ, चौथे अध्यायका अड़तीसवाँ, पाँचवें अध्यायके बारहवेंका पूर्वार्ध, छठे अध्यायका पाँचवाँ, नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ, बारहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवें अध्यायका बासठवाँ, छाछठवाँ तथा तिहतरवाँ श्लोक आदि-आदि)। इसका कारण यह है कि भगवान् साधकोंको शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक अपनी प्राप्ति कराना चाहते हैं। दूसरी बात, अर्जुनने युद्धकी परिस्थिति प्राप्त होनेके समय अपने कल्याणका उपाय पूछा है। अतः उनके कल्याणके लिये करण-निर्पेक्ष-शैली ही काममें आ सकती है; क्योंकि करण-निर्पेक्ष-शैलीमें मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें और सम्पूर्ण शास्त्रविहित कर्म करते हुए भी अपना कल्याण कर सकता है। इसी शैलीके अनुसार (अभ्यास किये बिना) अर्जुनका मोह नाश हुआ और उनको स्मृतिकी प्राप्ति हुई (अठारहवें अध्यायका तिहतरवाँ श्लोक)।
साधनकी करण-निर्पेक्ष-शैली सबके लिये समानरूपसे उपयोगी है; क्योंकि इसमें किसी विशेष योग्यता, परिस्थिति आदिकी आवश्यकता नहीं है। इस शैलीमें केवल परमात्म-प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होनेसे ही तत्काल जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होकर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। जैसे कितने ही वर्षोंका अँधेरा हो, एक दियासलाई जलाते ही वह नष्ट हो जाता है, ऐसे ही जड़ताके साथ कितना ही पुराना (अनन्त जन्मोंका) सम्बन्ध हो, परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही वह मिट जाता है। इसलिये उत्कट अभिलाषा करण-सापेक्षतासे होनेवाली समाधिसे भी ऊँची चीज है। ऊँची-से-ऊँची निर्विकल्प समाधि हो, उससे भी व्युत्थान होता है और फिर व्यवहार होता है अर्थात् समाधिका भी आरम्भ और अन्त होता है। जबतक आरम्भ और अन्त होता है, तबतक जड़ताके साथ सम्बन्ध है। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर साधनका आरम्भ और अन्त नहीं होता, प्रत्युत परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है*।
वास्तवमें देखा जाय तो परमात्मासे वियोग कभी हुआ ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं। केवल संसारसे माने हुए संयोगके कारण परमात्मासे वियोग प्रतीत हो रहा है। संसारसे माने हुए संयोगका त्याग करते ही परमात्मतत्त्वके अभिलाषी मनुष्यको तत्काल नित्ययोगका अनुभव हो जाता है और उसमें स्थायी
स्थिति हो जाती है।
अन्तःकरणको शुद्ध करनेकी आवश्यकता भी करण-सापेक्ष-शैलीमें ही है, करण-निर्पेक्ष-शैलीमें नहीं। जैसे कलम बढ़िया होनेसे लिखाई तो बढ़िया हो सकती है, पर लेखक बढ़िया नहीं हो जाता, ऐसे ही करण (अन्तःकरण) शुद्ध होनेसे क्रियार्थ तो शुद्ध हो सकती है, पर कर्ता शुद्ध नहीं हो जाता। कर्ता शुद्ध होता है—अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे; क्योंकि अन्तःकरणसे अपना सम्बन्ध मानना ही मूल अशुद्धि है।
नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वके साथ जीवका नित्ययोग स्वतःसिद्ध है; अतः उसकी प्राप्तिमें करणकी अपेक्षा नहीं है। केवल उधर दृष्टि डालनी है, जैसा कि श्रीरामचरितमानसमें आया है—‘संकर सहज सरूपु सम्हारा’ (१।५८।४) अर्थात् भगवान् शंकरने अपने सहज स्वरूपको सँभाला, उसकी तरफ दृष्टि डाली। सँभाली चीज वह होती है, जो पहलेसे ही हमारे पास हो और केवल दृष्टि डालनेसे पता लग जाय कि यह है। ऐसे ही दृष्टि डालनेमात्रसे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। परन्तु सांसारिक सुखकी कामना, आशा और भोगके कारण उधर दृष्टि डालनेमें, उसका अनुभव करनेमें कठिनता मालूम देती है। जबतक सांसारिक भोग और संग्रहकी तरफ दृष्टि है, तबतक मनुष्यमें यह ताकत नहीं है कि वह अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि डाल सके। अगर किसी कारणसे, किसी खास विवेचनसे उधर दृष्टि चली भी जाय, तो उसका स्थायी रहना बड़ा कठिन है। कारण कि नाशवान् पदार्थकी जो प्रियता भीतरमें बैठी हुई है, वह प्रियता भगवान्के स्वतःसिद्ध सम्बन्धको समझने नहीं देती; और समझमें आ जाय तो स्थिर नहीं रहने देती। हाँ, अगर उत्कट अभिलाषा जाग्रत हो जाय कि उस तत्त्वका अनुभव कैसे हो? तो इस अभिलाषामें यह ताकत है कि यह संसारकी आसक्तिका नाश कर देगी।
गीतोक्त कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही साधन करण-निर्पेक्ष अर्थात् स्वयंसे होनेवाले हैं। कारण कि क्रिया और पदार्थ अपने और अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत दूसरोंके और दूसरोंकी सेवाके लिये हैं; मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है, मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं—इस प्रकार विवेकपूर्वक क्रिया गया विचार अथवा मान्यता करण-सापेक्ष (अभ्यास) नहीं है; क्योंकि इसमें जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद है। अतः कर्मयोगमें स्वयं ही जड़ताका
- जबतक जड़ताका सम्बन्ध रहता है, तबतक दो अवस्थाएँ रहती हैं; क्योंकि परिवर्तनशील होनेसे जड़ प्रकृति कभी एकरूप नहीं रहती। अतः समाधि और व्युत्थान—ये दोनों अवस्थाएँ जड़ताके सम्बन्धसे ही होती हैं। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘सहजावस्था’ होती है, जिसे सन्तोने ‘सहज समाधि’ कहा है। इससे फिर कभी व्युत्थान नहीं होता।