सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयहां एक बात और ध्यान देने योग्य है कि आज 'वेद' शब्द भले ही चार वेदों—ऋक्, यजु, अथर्व और साम के साथ जुड़ कर ग्रंथवाची हो गया हो, किंतु मूल रूप में यह ज्ञान का ही बोधक रहा है. आरंभ में इन चारों को मिला कर एक ही 'वेद ग्रंथ' माना जाता था, जैसा कि महाभारत में कहा भी गया है— एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्मयः. बाद में आकारगत विशालता को देखते हुए इस के चार भाग किए गए—ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद और सामवेद. इन्हें 'चतुर्वेद' कहा जाता है. श्रुति परंपरा से पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर विकसित होते रहने वाले इस ज्ञान के भंडार का संभवतया प्रथम विभाजन व्यास ने किया था. यह विभाजन प्रमुखतया साहित्यिक विधाओं पर आधारित है—पद्य, गद्य और गान. सामान्यतया किसी भी भाषा का साहित्य इन्हीं तीन रूपों में पाया जाता है. इस दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद पद्य प्रधान, यजुर्वेद गद्य प्रधान और सामवेद गान प्रधान हैं. सामवेद की आचार्य परंपरा सामवेद के आदि आचार्य जैमिनि माने जाते हैं. वायु, भागवत, विष्णु आदि पुराणों से भी इस कथन की पुष्टि होती है. पुराणों के अनुसार, वेदव्यास ने अपने शिष्य जैमिनि को सामवेद की शिक्षा दी थी. जैमिनि के बाद सुमंतु, सुन्वान, स्वकीय सूनु सुकर्मा तक पीढ़ी दर पीढ़ी यह अध्ययन परंपरा जारी रही. सुकर्मा ने सामवेद संहिता का व्यापक विस्तार किया. पौराणिक उल्लेखों के अनुसार सामवेद की एक हजार शाखाएं थीं. आचार्य पतंजलि ने भी इस की पुष्टि की है—'सहस्रवर्त्मा सामवेदः.' आज इन में से केवल तीन ही शाखाएं मिलती हैं—कौथुमीय, राणायणी और जैमिनीय. तीनों शाखाओं में उपलब्ध सामवेद की ऋचाओं की संख्या तो अलगअलग है ही, उन में पाठभेद भी मिलता है. ब्राह्मण तथा पुराण ग्रंथों के अनुसार, साम मंत्रों (ऋचाओं) के पदों की संख्या एक लाख से भी अधिक है लेकिन सामवेद की कुल उपलब्ध ऋचाओं की संख्या अधिक नहीं है. सामवेद के मुख्यतया दो भाग हैं—आर्चिक और गान. आर्चिक का अर्थ है ऋचाओं का समूह. इस के दो भाग हैं—पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक. पूर्वार्चिक में छह अध्याय हैं. हर अध्याय में कईकई खंड हैं. इन्हें 'दशति' भी कहा गया है. 'दशति' से दस (संख्या) का बोध होता है. किंतु हर खंड में ऋचाओं की संख्या १० नहीं है. किसी में यह संख्या १० से कम है तो किसी में ज्यादा भी. इसीलिए इसे 'दशति' न कह कर खंड कहना अधिक उचित प्रतीत होता है. सामवेद के पहले अध्याय में अग्नि से संबंधित ऋचाएं हैं. इसलिए इसे 'आग्नेय पर्व' कहा गया है. दूसरे से चौथे अध्याय तक इंद्र की स्तुति की गई है. इसलिए यह 'ऐंद्र पर्व' ebook converter DEMO Watermarks*