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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished310 pages
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भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित्. मारे अस्मन्मघवं ज्योक्क:.. (११) हे इंद्र! मनुष्य आप के लिए सोमयज्ञ करते रहे हैं. मनीषी आप के लिए हवन भी करते रहे हैं. यज्ञ करने वालों को आप अपनेआप से कभी दूर मत कीजिए. (११) चौथा खंड प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत. अभीके चिदु लोककृत्सङ्गे समत्सु वृत्रहा. अस्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (१) हे यजमानो! आप इंद्र के रथ के सामने उपासना करिए. आप शक्ति की उपासना कीजिए. इंद्र संसार के पालक, वृत्रहंता व प्रेरक हैं. हमारी हार्दिक इच्छा है कि हमारे शत्रुओं के धनुष की प्रत्यंचा टूट जाए. (१) त्व ꣳ सिंधु ꣳ र्वासृजो ऽ धराचो अहन्नहिम्. अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यम्. तं त्वा परि ष्वजामहे नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (२) हे इंद्र! आप मेघों को भेदते हैं. आप नदियों के बहाव में आने वाली रुकावटों को दूर करते हैं. हम आप को हवि भेंट करते हुए प्रसन्न होते हैं. हमारी इच्छा है कि हमारे शत्रुओं के धनुष की प्रत्यंचा टूट जाए. (२) वि षु विश्वा अरातयो ऽ र्यो नशन्त नो धिय:. अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघा ꣳ सति. या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (३) हे इंद्र! हम पर आक्रमण करने वाले को आप स्वयं अपने शस्त्रों से मार डालते हैं. हमारी बुद्धि को आप प्रेरणा दीजिए. आप हमें धनादि दान कीजिए. हमारी हार्दिक इच्छा है कि हमारे शत्रुओं के धनुष की प्रत्यंचा टूट जाए. (३) रेवाँ इद्रेवत स्तोता स्यात्त्वावतो मघोन: प्रेदु हरिव: सुतस्य.. (४) हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप के उपासक भी धनवान हो जाते हैं. आप के उपासकों को सब प्रकार का धन प्राप्त होता है. (४) उक्थं च न शस्यमानं नागो रयिरा चिकेत. न गायत्रं गीयमानम्.. (५) हे इंद्र! आप वाणी से स्तुति न करने वाले अज्ञानी के भी मन की भावना जानते हैं. स्तुति करने वालों के मन की भावना को भी जानते हैं. आप गाया जाता हुआ साम गायन भी जानते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः. शिक्षा शचीवः शचीभिः.. (६) हे इंद्र! आप हमें दुष्टों और अपमान करने वालों के भरोसे मत छोड़िए. आप पवित्र शिक्षा के द्वारा शची की तरह पवित्र धन प्रदान कीजिए. (६) एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम्. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (७) हे इंद्र! आप घोड़ों के द्वारा पधारिए. आप कण्व की स्तुति सुनिए. हे स्वर्गलोकवासी! हम आप के राज में सुखी हैं. (७) अत्रा वि नेमिरेषामुरां न धूनुते वृकः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (८) हे इंद्र! सोम को कूटने वाले पत्थर भी मानो बोलते हुए आप को बुला रहे हैं. हे स्वर्गलोकवासी! हम आप के राज में सुखी हैं. (८) आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण वक्षतु. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (९) हे सोम! कूटने वाला पत्थर आवाज करता हुआ सोमरस निकाल रहा है. उस से निकलने वाली सोम की धारा वैसे ही कांप रही है, जैसे भेड़िए के डर से भेड़ कांपती है. हम स्वर्गलोकवासी इंद्र के राज में सुखी हैं. आप पधारिए. (९) पवस्व सोम मन्दयन्निन्द्राय मधुमत्तमः.. (१०) हे सोम! आप पवित्र हैं. आप मदमाते हुए इंद्र के लिए श्रेष्ठ रस झरने की कृपा कीजिए. (१०) ते सुतासो विपश्चितः शुक्रा वायुमसृक्षत.. (११) हे सोम! आप प्रकाशमान व बुद्धिवर्द्धक हैं. आप को वायु देव के लिए परिष्कृत किया जाता है. (११) असृग्रं देववीतये वाजयन्तो रथा इव.. (१२) हे सोम! आप को अन्न धन के इच्छुक यजमान ऐसे तैयार करते हैं, जैसे रथ को तैयार किया जाता है. (१२) पांचवां खंड अग्नि ॡ होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनु ॡ सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्. य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. ebook converter DEMO Watermarks*

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घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः.. (१) हे अग्नि! आप को हम होता, धनवान, सर्वज्ञाता और ब्राह्मण (यज्ञवेत्ता) मानते हैं. आप ऊंचाई की ओर स्वयं अपना मार्ग बनाते हैं. आप घी की आहुतियों से चमकीले हो जाते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (१) यजिष्ठं त्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमङ्गिरसां विप्र मन्मभिर्विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः. परिज्मानमिव द्या ॐ होतारं चर्षणीनाम्. शोचिष्केशं वृषणं यमिमा विशः प्रावन्तु जूतये विशः.. (२) हे अग्नि! आप मनीषी हैं. ब्राह्मणों द्वारा रचे गए मंत्रों से हम यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. आप होता, सर्वद्रष्टा व ऊंची लपटों वाले हैं. हम अपनी रक्षा के लिए आप की रक्षा करते हैं. (२) स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः. वीळु चिद्यस्य समृत्तौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम्. निष्षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते.. (३) हे अग्नि! परशु (फरसे) से जैसे शत्रुओं का नाश किया जाता है, वैसे ही आप की सामर्थ्य से शत्रुओं में भय फैल जाता है, उन का नाश हो जाता है. आप की कृपा से कितना ही बलशाली शत्रु क्यों न हो, वह आप के वशीभूत हो जाता है. आप धनुषधारी वीर जैसे हैं. आप पत्थर जैसे कठोर शत्रुओं का भी नाश कर देते हैं. (३) अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो. बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं ३ दधासि दाशुषे कवे.. (४) हे अग्नि! आप की हवि सराहनीय है. आप कवि (विद्वान्) और प्रकाशमान हैं. आप की विशाल लपटें सुशोभित होती हैं. आप यजमानों को धन देते हैं. (४) पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना. पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (५) हे अग्नि! आप की किरणें पवित्र, चमकीली व प्रखर हैं. आप सूर्य जैसे उदय होते हैं, फिर आकाश में पूर्ण प्रकाशमय हो जाते हैं. माता के साथ घूमते हुए पुत्र की तरह आप यजमानों के साथ रहते हैं. (५) ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः. त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (६) हे अग्नि! आप शक्तिमान व सर्वज्ञाता हैं. आप हमारी प्रशस्तियों को सुनिए, हमारी सेवा से संतुष्ट होइए. आप विलक्षण व असंख्य रूपधारी हैं. आप यजमानों द्वारा दी गई हवि को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

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इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य. स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि दर्शंतं क्रतुम्.. (७) हे अग्नि! आप अमर हैं. आप प्रज्वलित होइए. आप हमारे धन की बढ़ोतरी कीजिए. आप यज्ञ में तेजस्वी स्वरूप धारण करते हैं. आप हमारे यज्ञ पर पूर्ण दृष्टि रखते हुए सुशोभित होते हैं. (७) इष्कर्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्त ॐ राधसो मह:. रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसि रयिम्.. (८) हे अग्नि! आप यज्ञ के कर्ताधर्ता हैं. आप विशिष्ट चेतना से संपन्न हैं. आप अपार धन के स्वामी हैं. हम आप की उपासना करते हैं. आप हमें महिमा, सौभाग्य, अन्न व धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (८) ऋतावानं महिषं विश्वदर्शत मग्नि ॐ सुम्नाय दधिरे पुरो जना:. श्रुत्कर्णं ॐ सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा.. (९) हे अग्नि! आप सत्यवान व विश्वद्रष्टा हैं. आप हमारी स्तुति सुनने वाले हैं. सुख्यात व आप दिव्य हैं. हम वाणी से आप की प्रार्थना करते हैं. यजमान सुखवृद्धि के लिए आप को प्रतिष्ठित करते हैं. (९) छठा खंड प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः. यस्य त्व ॐ सख्यमाविथ.. (१) हे अग्नि! जो आप को मैत्री भाव से पा लेता है, वह यजमान श्रेष्ठ वीर और श्रेष्ठ कर्मवान हो जाता है. आप की रक्षा (आशीर्वाद) से उस का बेड़ा पार हो जाता है. (१) तव द्रप्सो नीलवान्वाश ऋत्विय इन्धानः सिष्णवा ददे. त्वं महीनामुषसामसि प्रियः क्षपो वस्तुषु राजसि.. (२) हे अग्नि! आप को सोमरस से सींचा जाता है. वह प्रवहमान, इच्छित व प्रकाशमान है. उस को आप के लिए तैयार किया जाता है. आप महिमा वाली उषा देवियों के प्रिय हैं. आप रात को वस्तुओं में शोभित होते हैं. (२) तमोषधीर्दधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मातरः. तमित्समानं वनिनश्च वीरुधो ऽ न्त्तर्वतीश्च सुवते च विश्वहा.. (३) हे अग्नि! जलधाराएं मां की तरह आप को मानती हैं. आप को ओषधियां गर्भ में धारण करती हैं. वनस्पतियां आप को गर्भ में धारण करती हैं और संसार के सम्मुख प्रकट करती हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

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अग्निरिन्द्राय पवते दिवि शुक्रो वि राजति। महिषीव वि जायते.. (४) अग्नि इंद्र के लिए प्रज्वलित होती है. वह स्वर्गलोक में विशेष रूप से चमकती हुई शोभित होती है. वह महारानी के समान दिखाई देती है. (४) यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति. यो जागार तमय २४ सोम आह तवाहम्स्मि सख्ये न्योकाः.. (५) जो जाग्रत हैं, ऋचाएं उन की कामना करती हैं. जो जाग्रत हैं, उन्हें ही सोम प्राप्त होते हैं. जो जाग्रत हैं, उन्हीं से सोम कहते हैं कि मैं तुम्हारा मित्र हूं. (५) अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते ऽ ग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति. अग्निर्जागार तमय २४ सोम आह तवाहम्स्मि सख्ये न्योकाः.. (६) अग्नि जाग्रत हैं, अतः ऋचाएं उन की कामना करती हैं, सोम उन्हें प्राप्त होते हैं. अग्नि जाग्रत हैं, अतः उन्हीं से सोम कहते हैं कि मैं तुम्हारा मित्र हूं. (६) नमः सखिभ्यः पूर्वसद्भ्यो नमः साकंनिषेभ्यः. युञ्जे वाच २४ शतपदीम्.. (७) यज्ञ में शुरू से प्रतिष्ठित देवताओं को हमारा नमस्कार. मित्र देवताओं को नमस्कार. सैकड़ों पदों वाली ऋचाएं देवताओं तक पहुंचने की कृपा करें. (७) युञ्जे वाच २४ शतपदीं गाये सहस्रवर्तनि. गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्.. (८) गायत्री, त्रिष्टुप् एवं जगती छंद में सामों को हजारों प्रकार से गाते हैं. सैकड़ों पदों वाली ऋचाएं देवताओं के लिए गाई जाती हैं. (८) गायत्रं त्रैष्टुभं जगद्विश्वारूपाणि सम्भृता. देवा ओका २४ सि चक्रिरे.. (९) हे अग्नि! गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती छंद में निबद्ध सामों को अनेक रूपों में (अनेक प्रकार से) आप के लिए गाया जाता है. (९) अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निरिन्द्रो ज्योतिर्ज्योतिरिन्द्रः. सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः.. (१०) हे अग्नि! अग्नि ज्योति है, ज्योति अग्नि है. इंद्र ज्योति है, ज्योति इंद्र है. सूर्य ज्योति है, ज्योति ही सूर्य है. (१०) पुनरूर्जा नि वर्तस्व पुनरग्न इषायुषा. पुनर्नः पाह्य २४ हंसः.. (११) हे अग्नि! आप ऊर्जा रूप में पधारिए. आप हमें अन्न प्रदान कीजिए. आप हमें दीर्घायु दीजिए. आप बारबार पापों से हमें बचाइए. (११) सह रय्या नि वर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (१२) हे अग्नि! आप सभी धनों को साथ ले कर पधारने की कृपा कीजिए. संसार में आनंद ebook converter DEMO Watermarks*

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की धारा से हमें सींचने की कृपा कीजिए. (१२) सातवां खंड यदिन्द्रा्हं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत्. स्तोता मे गोसखा स्यात्.. (१) हे इंद्र! आप धन के एकमात्र ईश्वर हैं. हम भी आप जैसे हो जाएं तो हमारे उपासक गायों के साथ हमारी प्रशंसा करेंगे. (१) शिक्षेयमस्मै दित्सेय ꣲ शचीपते मनीषिणे. यदहं गोपतिः स्याम्.. (२) हे शचीपति (इंद्र)! यदि हम गोपति हो जाएं तो अपने इन मनीषी उपासकों को धन देने की इच्छा करें और उन्हें धन भी दें. (२) धेनुष्ट इन्द्र सूनृता यजमानाय सुन्वते. गामश्वं पिप्युषी दुहे.. (३) हे इंद्र! आप अपने पुत्र यजमानों को इष्ट पदार्थ गाय, घोड़े आदि प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३) आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (४) हे जल! आप ऊर्जा धारक व सुखदायी हैं. आप हमें संग्राम के लिए बल प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४) यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (५) हे जल! मां जैसे बालक को दूध (रस) से पोसती है, उसी तरह आप अपने कल्याणकारी रस से हमें पोसने की कृपा कीजिए. (५) तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (६) हे जल! आप हमें पुत्रपौत्र सहित क्षयकारी रोगों को जीतने की शक्ति उपजाने की कृपा कीजिए. (६) वात आ वातु भेषज ꣲ शम्भु मयोभु नो हृदे. प्र न आयू ꣲ षि तारिषत्.. (७) हे वायु! आप पधारिए. आप हमारे हृदय को खिलाइए (खुश रखिए). आप हमारे लिए कल्याणकारी ओषधियां ले कर आइए. आप हमें दीर्घायु प्रदान कीजिए. (७) उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा. स नो जीवातवे कृधि.. (८) हे वायु! आप के सिवाय कोई हमारा पिता, भाई व मित्र नहीं है. आप हमारे जीवन को सामर्थ्यवान बनाने की कृपा कीजिए. (८) यददो वात ते गृहे ३ ऽ मृतं निहितं गुहा. तस्य नो धेहि जीवसे.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे वायु! आप के पास गुप्त रूप से अमृत है. आप हमें जीने के लिए छिपा कर रखा हुआ वह गुप्त अमृत प्रदान करने की कृपा कीजिए. (९) अभि वाजी विश्वरूपो जनित्र २४ हिरण्ययं बिभ्रदत्क २४ सुपर्ण:. सूर्यस्य भानुमृतुथा वसान: परि स्वयं मेधमृज्रो जजान.. (१०) हे अग्नि! आप विश्वरूप व सुपर्ण (गरुड़) जैसे वेगवान हैं. आप उत्पत्ति स्थान (यज्ञवेदी) को सोने सा चमका देते हैं. आप ऋतु के अनुकूल सूर्य व मेघ को धारण करते हैं. (१०) अप्सु रेत: शिश्रिये विश्वरूपं तेज: पृथिव्यामधि यत्संबभूव. अन्तरिक्षे स्वं महिमानं मिमान: कनिक्रन्ति वृष्णो अश्वस्य रेत:.. (११) हे अग्नि! आप का वीर्य घोड़े के वीर्य की तरह है, विश्वरूप है, तेजोमय है, जल में (बादल रूप में) आश्रय पाता है, पृथ्वी पर जीवन शक्ति के रूप में है. अंतरिक्ष में अपनी व्यापक महिमा को फैलाए हुए है. वह सर्वत्र अपनी व्यापकता लिए हुए है. (११) अय २४ सहस्रा परि युक्ता वसान: सूर्यस्य भानुं यज्ञो दाधार. सहस्रदा: शतदा भूरिदावा धर्ता दिवो भुवनस्य विशपति:.. (१२) हे यजमानो! अग्नि हजारों किरणों वाले सूर्य के तेज को धारण करते हैं. वे यज्ञ का मूल आधार है. वे स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को धारण करते हैं. वे सैकड़ोंहजारों प्रकार के ऐश्वर्यदाता व विश्वपति हैं. (१२) नाके सुपर्णमुप यत्पतन्त २४ हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा. हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्.. (१३) हे वेन! उपासक आप को हृदय से पाने की इच्छा करते हैं. इस इच्छा से वे ऊपर देखते हैं. तब वे आप को अंतरिक्षलोक में अग्नि (विद्युत् रूपधारी) के पास पाते हैं. आप वरुण के दूत हैं, सोने के पंखों वाले हैं, यम की योनि में हैं व विश्व का भरणपोषण करने वाले हैं. (१३) ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्कचित्रा बिभ्रदस्यायुधानि. वसानो अत्क २४ सुरभिं दृशे क २४ स्वा ३ र्ण नाम जनत प्रियाणि.. (१४) हे वेन! आप ऊंचे स्वर्गलोक के पास रहते हैं. आप अद्भुत आयुध धारण कर के सुशोभित होते हैं. आप सूर्य की तरह प्राणियों के लिए जल धारण कर के उसे बरसाते हैं. (१४) द्रप्स: समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन् गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन्. भानु: शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (१५) हे वेन! जब आप समुद्र के जल को ले कर गिद्ध जैसी दृष्टि से देखते हुए मेघों के पास ebook converter DEMO Watermarks*

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पहुंचते हैं तब सूर्य की तरह चमकते हुए तीसरे लोक से प्राण जल बरसाते हैं. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

इक्कीसवां अध्याय

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इक्कीसवां अध्याय आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. सङ्क्रन्दनो ऽ निमिष एकवीरः शत २४ सेना अजयत्साकमिन्द्रः.. (१) हे इंद्र! आप बैल की तरह भीमकाय, दुष्टनाशक, वैरियों के लिए क्षोभदायी, स्फूर्तिवान व आलस्यरहित हैं. अकेले आप ही ऐसे वीर हैं, जो सारी शत्रु की सेना को पराजित कर देते हैं. (१) सङ्क्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा.. (२) हे इंद्र! आप शत्रुओं को क्रंदन करा (रुला) देने वाले हैं. आप आलस्यरहित हैं. आप विजेता व निपुण हैं. योद्धा इंद्र की सहायता से युद्ध जीत कर शत्रुओं को भगाते हैं. (२) स इषुहस्तैः स निष्षङ्गिभिर्वशी स २४ स्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन. स २४ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्यू ३ ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३) इंद्र युद्ध (विद्या) में दक्ष हैं. वे सृष्टि के विजेता, सोमरस पीने वाले, बाहुबली, धनुर्धारी व शत्रुओं के नाशक हैं. वे तलवार और बाण धारण करने वाले योद्धाओं के सहयोग से शत्रुओं को वशीभूत कर लेते हैं. (३) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ अपबाधमानः. प्रभञ्जन्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (४) हे इंद्र! आप सब के पालनहार, राक्षसों के नाशक, शत्रुओं के बाधक, सेना के विध्वंसक व हमारे रथों के रक्षक हैं. युद्ध में हम विजयी हों. (४) बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः. अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (५) हे इंद्र! आप सब के बल को जानते हैं. आप अत्यंत वीर, स्थविर और उग्रता सहन करने वाले हैं. आप बल सहित ही पैदा हुए हैं. आप महावीर व गोपालक हैं. आप विजयी रथ में बैठने की कृपा कीजिए. (५) गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा. इम २४ सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्र २४ सखायो अनु स २४ रभध्वम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे इंद्र! आप दुश्मनों के गढ़ भेद देते हैं. आप वज्रबाहु, शत्रुनाशक, विजेता, गोपालक, नेता और पराक्रमशील हैं. शत्रु पर क्रोध करने में आप इंद्र का अनुगमन कीजिए. (६) अभि गोत्राणि सहसा गाहमानो ऽ दयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाडयुध्यो ३ स्माक ॐ सेना अवतु प्र युत्सु.. (७) हे इंद्र! आप हमारी व सेनाओं की रक्षा कीजिए. आप अद्भुत युद्धवीर, शत्रुजित्, स्थिर, वीर, अनीति के प्रति क्रोधी व शत्रु पर दया न करने वाले हैं. आप शत्रु के गढ़ भेदने वाले हैं. (७) इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (८) हे इंद्र! आप हमारे नेता होइए. बृहस्पति सब से आगे होने की कृपा करें. सोम दक्षिण यज्ञ के संचालक हैं. वे भी अग्रगामी हों. मरुद्गण शत्रुनाशक हैं. वे देवताओं की सेना में सब से आगे होने की कृपा करें. (८) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुता ॐ शर्ध उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (९) हे इंद्र! आप शक्तिमान हैं. वरुण राजा हैं. मरुद्गण तीव्र बल वाले हैं. आप शत्रु के डेरों के नाशक, महान मन वाले व विजयशील हैं. देवताओं का जयघोष सर्वत्र व्याप्त हो, सर्वत्र गूंजे. सभी देवताओं का हमें सहयोग प्राप्त हो. (९) उद्वर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां मामकानां मना ॐ सि. उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषाः.. (१०) हे इंद्र! आप क्षमतावान हैं. आप अस्त्रशस्त्रधारी युद्धवीरों के मन में उत्साह भरें. आप हमारे मन में भी जोश भरें. आप हमारे युद्धरथ के घोड़ों को वेगवान बनाइए. विजयी हो कर आते हुए हमारे रथों के जयघोष गूंजें. (१०) अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु.. (११) हे इंद्र! आप युद्धों में हमारी सेना के रक्षक होइए. हमारे बाण शत्रुविजय करें. हमारे वीर युद्धों में विजय प्राप्त करें. यज्ञ में देवता हमारी रक्षा करें. हमारे ध्वजों पर विजय अंकित हो. (११) असौ या सेना मरुतः परेषामभ्येति न ओजसा स्पर्धमाना. तां गूह्त तमसापव्रतेन यथैतेषामन्यो अन्यं न जानात्.. (१२) हे मरुद्गणो! बल से स्पर्धा करती हुई शत्रुसेना हम पर आक्रमण करे तो आप उस सेना ebook converter DEMO Watermarks*

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को घने अंधकार से घेर लीजिए, जिस से वे एकदूसरे को पहचान तक न सकें और अपनी ही सेना का संहार कर दें. (१२) अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि. अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकेरन्धेनामित्रामस्तमसा सचन्ताम्.. (१३) हे पाप के देवता! आप शत्रुओं के चित्त प्रति लोभी बनाइए. आप शत्रुओं के अंगों को भी कस लीजिए. आप शोकों की ज्वालाओं से शत्रुओं का हृदय दहलाइए. आप घनघोर अंधेरा कर के शत्रु को अचेत (बेहोश) बना दीजिए. (१३) प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु. उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (१४) हे वीर मनुष्यो! इंद्र आप को सुखशांतिमय बनाने की कृपा करें. आप के बाहु उग्र हों. आप को शत्रु अधीन न बना सके. आप उन पर आक्रमण कर के विजय प्राप्त कीजिए. (१४) अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं ꣪ शिते. गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं च नोच्छिषः.. (१५) हमारे बाण वेदमंत्रों और स्तुतियों से प्रेरित किए गए हैं. वे बाण जब हम छोड़ें तो शत्रु कितना ही दूर क्यों न हो, उस पर जा कर गिरें. उन शत्रुओं में से कोई भी बच न पाए. (१५) कङ्काः सुपर्णा अनु यन्त्वेनान् गृध्राणामन्नमसावस्तु सेना. मैषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र वया ꣪ श्येनाननुसंयन्तु सर्वान्.. (१६) हे इंद्र! बाण मांसाहारी बाज की तरह शत्रुओं का अनुगमन (पीछा) करें. शत्रुओं की सेना गिद्धों का भोजन हो जाए. उन का कोई अवशेष न रह पाए. पाप में लगे पापी भी बच न पाएं. मांसाहारी पक्षी उन का भी अनुगमन (पीछा) करें. (१६) अमित्रसेनां मघवन्न्रस्मां छत्रयतीमभि. उभौ तामिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च दहतं प्रति.. (१७) हे इंद्र! आप अमित्रों की सेना का नाश कीजिए. आप वृत्रहंता व धनवान हैं. आप और अग्नि मिल कर शत्रुओं की सेना को भस्म करने की कृपा करें. (१७) यत्र बाणाः संपतन्ति कुमारु विशिखा इव. तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (१८) जहां बाण इस तरह गिरते हैं, जैसे बिना चोटी वाले चंचल बालक गिर रहे हों, वहां अदिति और ब्रह्मणस्पति हमें सुख देने की कृपा करें. वे सदैव हमारा कल्याण करने की कृपा करें. (१८) वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज. वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे इंद्र! आप राक्षसों व हिंसकों का विनाश करने की कृपा कीजिए. आप वृत्रासुर जैसे राक्षसों की ठोड़ी तोड़ दीजिए. आप अमित्रों का क्रोध और घमंड दूर करने की कृपा कीजिए. (१९) वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. यो अस्माँ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (२०) हे इंद्र! हमारी सेना युद्धों में शत्रुओं को पराजित कर दे. हमारे शत्रु मुंह नीचा कर के हमारे सामने आएं. आप उन शत्रुओं को पतन के गर्त में डाल दीजिए, जो हमें अपने अधीन (वश में) करना चाहते हैं. (२०) इन्द्रस्य बाहू स्थविरौ युवानावनाधृष्यौ सुप्रतीकावसह्यौ. तौ युञ्जीत प्रथमौ योग आगते याभ्यां जितमसुराणा १४ सहो महत्.. (२१) इंद्र के बाहु हाथी की सूंड की तरह हैं. आप सर्वप्रथम उन भुजाओं को युद्ध में प्रेरित करने की कृपा कीजिए. आप बलजित्, स्थिर व जवान हैं. आप पर किसी का वश नहीं चल सकता. (२१) मर्माणि ते वर्मणा च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्. उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वामु देवा मदन्तु.. (२२) हे इंद्र! हम आप के मर्म स्थानों को कवच से ढकते हैं. राजा सोम आप को अमृतमय बनाने की कृपा करें. वरुण आप को सुख प्रदान करने की कृपा करें. देवता आप को प्रसन्नता प्रदान करें. (२२) अन्धा अमित्र भवताशीर्षाणो ऽ हय इव. तेषां वो अग्निनुन्नानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्.. (२३) हे इंद्र! सिर रहित सांप जैसे अंधा होता है, वैसे ही हमारे अमित्र हो जाएं. उन में से जो अग्नि की ज्वाला से बच जाएं, उन बचे हुए शत्रुओं को आप स्वयं नष्ट करने की कृपा कीजिए. (२३) यो नः स्वो ऽ रणो यश्च निष्ठ्यो जिघा १४ सति. देवास्त १४ सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरं १४ शर्म वर्म ममान्तरम्.. (२४) जो हमारे अपने हो कर विश्वासपूर्वक छल से हमें मारना चाहते हैं, देवगण उन सभी धूर्तों को नष्ट करने की कृपा करें. वेदों के मंत्र हमारे मर्मस्थान के कवच हैं. वे हमें सुख प्रदान करने की कृपा करें. (२४) मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः. सृक १४ स १४ शाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रूं ताढि विमृधो नुदस्व.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे इंद्र! आप पर्वत में रहने वाले शेर के समान भयंकर हैं. दूर से यहां आ कर दूर तक मारक तीखे वज्र से शत्रुओं का नाश करने की कृपा कीजिए. आप लड़ाकू शत्रुओं को दूर करने की कृपा कीजिए. (२५) भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः. स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः.. (२६) हे देवगणो! आप की कृपा से कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, आंखों से मंगलमय दृश्य देखने को मिलें. हम स्वस्थ हाथपैर और अंगों से आप की स्तुति कर सकें. आप देवताओं की कृपा से हमें जो भी आयु प्राप्त हुई है, उस का हम स्तुतिपूर्वक सदुपयोग कर सकें. (२६) स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः. स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु.. (२७) इंद्र हमारा कल्याण करने की कृपा करें. सर्वज्ञाता पूषा हमारा कल्याण करने की कृपा करें. अहिंसक अस्त्रशस्त्र वाले गरुड़ व ज्ञान धारण करने वाले बृहस्पति हमारा कल्याण करने की कृपा करें. (२७) (सामवेद पूर्ण)

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अथर्ववेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ ... वेद ॥ अथर्ववेद ॥ ेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद , ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ '॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुव वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ र्वेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ... सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ... सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद । ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य '॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ ेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे र्वेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवे अथर्ववेद ॥ डा. गंगा सहाय शर्मा एम.ए. (हिंदी, संस्कृत), पी-एच.डी., व्याकरणाचार्य