साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ९३
ऋषियों से ऊर्ध्व में ध्रुव का आसन है। यह विद्वान् लोग कहते हैं। रविमण्डल में राहु अवस्थित है, जो कदाचित् सोम के पथ पर गमन करता है। सूर्यमण्डल-स्थित केतु नित्य सोममण्डल में गमन करता है। सूर्य का विस्तार ९००० योजन है। इस विस्तार से तीन गुणा परिणाह वाला मण्डल है। सूर्य के विस्तार का दूना चन्द्र का विस्तार कहा गया है॥५१-५३॥
विशेष— सूर्य से चन्द्र को दूना बताया गया है, यह सम्भव नहीं है।
त्रिगुणं मण्डलं चास्य यथैव सवितुस्तथा।
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते ॥५४॥
भार्गवात् पादहीनो वै विज्ञेयस्तु बृहस्पतिः।
बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौम्यावुदाहृतौ ॥५५॥
विस्तारमण्डलाभ्यां च पादहीनस्तयोर्बुधः।
बुधतुल्यानि ऋक्षाणि सर्वह्रस्वानि यानि तु ॥५६॥
चन्द्र का मण्डल सूर्य से तिगुना (?) विस्तृत है। चन्द्र के सोलहवें भाग की विस्तृति शुक्र की है। शुक्र का पादहीन विस्तार बृहस्पति का है। बृहस्पति के एक पादहीन विस्तार के बराबर मंगल तथा बुध हैं। बुध के समान ही समस्त नक्षत्रों का विस्तार है॥५४-५६॥
योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।
राहुः सूर्यप्रमाणस्तु कदाचित् सोऽपि सम्मितः।
तस्माद् ग्रहप्रमाणन्तु केतुस्त्वनियत: स्मृतः ॥५७॥
जो सब से हीन नक्षत्र है, उसका विस्तार आधा योजन प्रमाण है। उससे ह्रस्व कोई नक्षत्र नहीं है। राहु कभी-कभी सूर्यवत् प्रतीत होता है। तभी राहु को ग्रह मानते हैं। केतु का स्थान नियत नहीं है॥५७॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकस्तदनन्तरम्।
महर्जनस्तपःसत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥५८॥
भूरूपं पार्थिवो लोको ह्यन्तरिक्षं भुवः स्मृतः।
स्वरित्येवं दिवं विद्याच्छेषास्तूर्ध्वं यथाक्रमम् ॥५९॥
भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपःलोक, सत्य लोक—ये सात लोक कहे गये हैं। भूलोक है—पार्थिव लोक, अन्तरिक्ष है—भुवर्लोक, स्वर्लोक है—द्युलोक। अन्य सबको यथाक्रम से ऊर्ध्वलोक जानना चाहिये॥५८-५९॥
भूतस्याधिपतिश्चाग्निस्ततो भूतपतिस्तु सः।
नभसोऽधिपतिर्वायुस्तेन वायुर्नभस्पतिः ॥६०॥