साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ श्रीसाम्बपुराणम्
क्षणा मुहूर्त्ता दिवसा निशाः पक्षास्तथैव च।
मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च ॥७॥
तदादित्यादृते ह्येषां कालसंख्या न विद्यते।
कालादृते न नियमो नाग्नेर्विहरणक्रिया ॥८॥
क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर, षड् ऋतु, चारो युग—इन सबकी आदित्य के अतिरिक्त कोई कालसंख्या नहीं हो सकती। काल के विना कोई नियम नहीं है। निर्दिष्ट काल में ही सभी अनुष्ठानादि सम्पन्न होते हैं। काल के अभाव में अग्नि की कोई विहरण क्रिया भी नहीं है अर्थात् निर्दिष्ट काल में ही अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है॥७-८॥
ऋतूनामभिभावाच्च पुष्पं मूलं फलं कुतः।
कुतश्च सस्यनिष्पत्तिः तृणौषधिगणाः कुतः ॥९॥
अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च।
जगत्प्रतानमृते भास्करे वारितस्करम् ॥१०॥
ऋतुओं का आविर्भाव हुये विना फूल, मूल, फल कैसे उत्पन्न होंगे? कैसे शस्यादि तृण, औषधिगण उत्पन्न होंगे? उसके अभाव से जगत् में प्राणीगण तथा स्वर्ग लोक में देवगण के खाद्य का अभाव परिलक्षित होने लगेगा। जगत् को ताप न देकर भास्कर अपनी रश्मि संहत कर लेंगे। (जब रश्मियाँ संहत हो जायेंगी तब पानी वाष्प होकर कैसे मेघरूप में सञ्चित होगा)॥९-१०॥
नावृष्ट्या तपते सूर्यो नावृष्ट्या परितुष्यति।
नावृष्ट्या परिषध्यन्ते वारिणा दीयते रविः ॥११॥
वृष्टिपात के विना सूर्य ताप नहीं देते, वृष्टिपात के विना उनकी तुष्टि नहीं होती, वृष्टिपात के विना उनकी सिद्धि नहीं होती, जल के द्वारा ही रवि दान करते हैं॥११॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मकाञ्चनसन्निभः।
श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः ॥१२॥
हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः।
इति वर्णा समाख्याताः सूर्यस्य ऋतुसम्भवाः।
ऋतुस्वभावजैर्वर्णैः सूर्यः क्षेमे सुभिक्षकृत् ॥१३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यनिगमनं नामाऽष्टमोऽध्यायः