साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ४७
क्योंकि यह सूर्य परिभ्रमण करके लोकत्रय की रक्षा करते हैं। रक्षणार्थ ‘अव’ धातु होता है। रक्षा करने के कारण इनको सविता कहते हैं।।२५।।
देवैरभ्यर्चितो यस्मात्तस्मादर्कः स उच्यते।
अण्डे द्विधा कृते ह्यार्त्तं दृष्ट्वा स्नेहात्पिताऽब्रवीत्।
आर्त्तो मा भव देवेश मार्त्तण्डस्तेन स स्मृतः॥२६॥
देवगण उनकी अर्चना करते हैं, तभी वे अर्क हैं। अण्ड को दो भाग में विभक्त होने पर उन्हें आर्त देखकर पिता ने स्नेह से कहा—हे देवेश! तुम आर्त न हो। तभी उनको मार्तण्ड कहा जाने लगा।।२६।।
यस्माद् धारयते लोकान् भूमिं तेषां ददाति च।
डुधाञ् धारणे धातुस्तस्माद् धाता स उच्यते॥२७॥
क्योंकि लोकों को धारण करते हैं तथा उन्हें भूमिदान करते हैं। धा धातु (डुधाञ्) का अर्थ है—धारण करना। तभी उन्हें धाता कहा जाता है।।२७।।
अचि प्रत्ययपूर्वस्य ऋधातोर्यनिनिपात्यते।
गतौ यस्मात् परो नास्ति तेन सूर्योऽर्यमा स्मृतः॥२८॥
ऋ धातु के गमनार्थक य (ऋ + मन्—कनिन्) प्रत्यय के अर्थ में, जो गमन करते हैं अथवा जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। इस अर्थ में सूर्य को अर्यमा कहा गया है।।२८।।
स्नेहेन सर्वभूतानि यस्मात् त्रायति भास्करः।
ञिमिधा स्नेहने धातुस्तस्मान्मित्रः स उच्यते॥२९॥
भास्कर स्नेहवशात् सभी प्राणियों की विपत्ति से रक्षा, त्राण करते हैं। मिद् धातु का अर्थ है—स्नेह, इसलिये इन्हें मित्र कहा गया है।।२९।।
वरान् विवृणवतो देवान् वरदो हि वरार्थिनाम्।
धातुर्वृङ् वरणे प्रोक्तस्तेनासौ वरुणः स्मृतः॥३०॥
वरप्रार्थी देवगण सर्वदा जिनसे वर माँगते रहते हैं, जो उनके लिये वरद हैं, वृ (वृञ्) धातु का अर्थ है—वरण। इसलिये ये वरुण कहे गये हैं।।३०।।
ऐश्वर्यं परमं यस्य पन्नगाश्च सुरासुराः।
ईद्दिश्च परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततस्तु सः॥३१॥
सभी देवता, असुर तथा पन्नगगण जिनके परम ऐश्वर्य हैं, यहाँ इदि धातु का ऐश्वर्य अर्थ है, अतः ये इन्द्र नाम से ख्यात हैं।।३१।।
शक्तोऽयं जगतः कर्तुं सर्गानुग्रहसंग्रहान्।
शक्लृ शक्तौ स्मृतो धातुः शक्रस्तेन स उच्यते॥३२॥