साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ५१
सर्वत्र सविता देवस्तनूभिर्नामभिश्च सः। नृक्षेषु चातिथौ वायौ व्योम्नि चाग्नौ च सर्वशः ॥५५॥
नक्षत्र, अतिथि, वायु, आकाश तथा अग्नि सर्वत्र—यह सविता देव विशेष तनु तथा विभिन्न नाम से विद्यमान हैं॥५५॥
एवंविधो ह्ययं सूर्यः सदा पूज्यो विजानता। आदित्यं वेत्ति यत्नेन स तस्मिन्नेव लीयते ॥५६॥
इस प्रकार से विज्ञजन के लिये सूर्य सदा पूज्य हैं। इन आदित्य को जो जानते हैं, वे इन्हीं में लीन हो जाते हैं॥५६॥
अप्येकं वेत्ति यो नाम धात्वर्थनिगमैः रवेः। स रागैर्वर्जितः सर्वैः सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥५७॥ नहि पापकृतः साम्ब भक्तिर्भवति भास्करे। तस्मात्त्वं परया भक्त्या प्रपद्यस्व दिवाकरम् ॥५८॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्य-निगमनं नाम नवमोऽध्यायः
रवि के नाम-धात्वर्थ तथा निगमों द्वारा जो एक सूर्य को भी जानते हैं, वे सभी रोगों से आरोग्य प्राप्त करके सद्यः पापमुक्त हो जाते हैं। हे साम्ब! पापकारी लोग कभी भी भास्कर की भक्ति नहीं पाते। अतएव तुम परम भक्ति के साथ दिवाकर के शरणागत हो जाओ॥५७-५८॥
श्रीसाम्ब पुराणान्तर्गत सूर्य के विभिन्न नामों का अर्थ-निरूपण नामक नवम अध्याय समाप्त