संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९५
रूपमें विस्तृत रूपसे शोभित होता है। वह विचार शरीर आदिमें दृश्यताभासको देखकर 'यही मेरा स्वरूप है' यों मोहवश धारणा करके स्थित है। उसको अपना रूप जहाँ, जैसे और जिस प्रकारका प्रतीत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। वह सर्वात्मा जहाँ जिस प्रकार आविर्भूत होता है, वहाँ वैसे ही तत्काल स्थिर हो जाता है और उसे अपना ही स्वरूप मानकर सुशोभित होता है। सर्वात्मकताके कारण द्रष्टा में दृश्यत्वका आरोप होता है। वह दृश्यत्व द्रष्टाकी उपस्थिति में ही सम्भव है, अन्यथा दृश्यता भी वास्तविक नहीं है। अतः प्रत्यक्ष ही कारणरहित अद्वितीय ब्रह्मरूपसे सिद्ध हुआ स्थित है। वही सभी प्रमाणोंका निर्माता है, क्योंकि अनुमान आदि प्रमाण प्रत्यक्षपूर्वक होनेके कारण उसीके अंश हैं। स.शुद्धभाव राम! अपने कर्ममात्रको दैव—प्रारब्ध मानकर उसकी उपासना करनेवाला इन्द्रियजयी पुरुष उस दैव-शब्दार्थ अर्थात् प्रारब्धको दूर हटाकर अपने पुरुषार्थ-द्वारा उस परम पदको अपने भीतर ही प्राप्त करता है।
रघुनन्दन ! पहले संत-समागमरूपी युक्तिके द्वारा बलपूर्वक अपनी बुद्धिको बढ़ाना उचित है। तत्पश्चात् महापुरुषोंके लक्षणोंके अनुकरणसे अपनेमें महापुरुषता लानी चाहिये। इस जगत्में जो-जो पुरुष जिस-जिस गुणसे विशेषरूपसे सम्पन्न है, वह उसी गुणके द्वारा विशिष्ट समझा जाता है; अतः शीघ्र ही उस पुरुषसे वह गुण प्राप्त करके अपनी बुद्धिकी वृद्धि करनी चाहिये। जैसे कमलसे सरोवर और सरोवरसे कमल परस्पर उन्नति-लाभ करते हैं, उसी तरह ज्ञानसे शम आदि गुण और शम आदि गुणोंसे ज्ञान—ये परस्पर वृद्धिगत होते रहते हैं। सत्पुरुषोंके सदाचरणसे ज्ञानकी और ज्ञानसे सत्पुरुषोंके आचरणकी वृद्धि होती है। यों ज्ञान और सत्पुरुषोंके आचरण परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे बढ़ते रहते हैं। तात ! जबतक इस संसारमें ज्ञान और सदाचारका समानरूपसे अभ्यास नहीं किया जाता, तबतक पुरुषको इन दोनोंमेंसे एककी भी सिद्धि नहीं होती। रघुनन्दन ! जिस प्रकार मैंने सदाचारके क्रमका वर्णन किया है, उसी तरह अब आगे ज्ञानक्रमका भलीभाँति उपदेश करूँगा। यह सद्-शास्त्र कीर्तिकारक, आयुवर्धक और परम पुरुषार्थरूप फल प्रदान करनेवाला है; अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस शास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न आप्त पुरुषसे इसका श्रवण करना चाहिये।
( सर्ग १७—२० )
॥ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण सम्पूर्ण ॥