भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 750 में से

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके स्वरूपका विवेचन तथा मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्‌की असत्ताका निरूपण * ९९

नहीं हैं। सुतरां उनसे उत्पन्न हुए जगत्‌के भी कोई सहकारी कारण नहीं हैं। अतः यहाँ कारणसे कार्यमें कोई विचित्रता या विलक्षणता नहीं है। इसलिये जैसे कारण शुद्ध है, वैसे कार्य भी शुद्ध ब्रह्म ही है—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ। इस जगत्‌के विषयमें कार्य-कारण-भावकी किंचिन्मात्र भी संगति नहीं है। जैसा परब्रह्म है वैसे ही तीनों लोक हैं। जल द्रवत्वसे अभिन्न ही है। उस अभिन्नरूप जलसे जिस तरह द्रवत्वका विस्तार होता है, उसी प्रकार मनोरूपताको प्राप्त हुए ब्रह्मा अपने शुद्ध आत्मा (स्वरूप) से ही जगत्‌का विस्तार करते हैं। वह जगत् उनके विशुद्ध आत्मस्वरूपसे भिन्न नहीं है जैसे ज्ञानियोंकी दृष्टिमें रस्सीमें सर्पभाव नहीं है, उसी प्रकार जगत्‌में आधिभौतिकता (जडता) नहीं है। फिर वे प्रबुद्ध ब्रह्मा आदि आधिभौतिक देहमें कैसे रह सकते हैं।

मन ही ब्रह्माके स्वरूपको प्राप्त हुआ है। वह मन संकल्परूप है। मन अपने ही स्वरूपको विकसित करके इस जगत्‌का निर्माण एवं विस्तार करता है! मनका रूप ब्रह्मा है और ब्रह्माका रूप मन। इसमें पृथ्वी आदिका प्रवेश नहीं है। मनने ही परमात्मामें पृथ्वी आदिकी कल्पना की है। जैसे कमलगट्टेके अंदर कमलिनी (भावी कमल-नाल) विद्यमान है उसी प्रकार मनके भीतर सम्पूर्ण दृश्यवर्ग स्थित है। मन, दृश्यवर्ग और इन दोनोंका द्रष्टा—इनका कभी किसीने विवेक नहीं किया। (जबतक द्रष्टा और दृश्यका विवेक न किया जाय, तबतक अज्ञानका उच्छेद न होनेसे मनमें दृश्यवर्गकी प्रतीति होती ही है।) यदि दृश्यरूप दुःख सत् हो तो उसकी कभी शान्ति नहीं हो सकती और दृश्यकी शान्ति न होनेपर ज्ञातामें कैवल्य (मोक्ष) की सिद्धि नहीं हो सकती। दृश्यका अभाव हो जानेपर ज्ञातामें ज्ञातृभाव स्थित हो, तो भी वह शान्त या निवृत्त हो जाता है। वही (ज्ञाताका कैवल्य ही) उसका मोक्ष कहा गया है। (सर्ग २-३)


मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्‌की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्‌को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! मनका स्वरूप कैसा है, यह मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि मन ही इस सम्पूर्ण लोकमञ्जरीका* विस्तार करता है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे शून्य तथा जड आकारवाले आकाशका नाममात्रके अतिरिक्त दूसरा कोई रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड रूप इस संकल्पात्मक मनका नामके सिवा कोई भी वास्तविक रूप नहीं दिखायी देता। यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मनसे उत्पन्न हुआ है। मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जल तथा चन्द्रमामें भ्रमसे दीखनेवाले द्वितीय चन्द्रमाके समान ही इस मनःकल्पित जगत्‌का स्वरूप है। रघुनन्दन ! संकल्पको ही मन समझो। जैसे द्रवत्व (द्रवरूपता) से जलका भेद नहीं है और जैसे वायुसे स्पन्दन (चेष्टा या गतिशीलता) भिन्न नहीं है, उसी प्रकार संकल्पसे मन भिन्न नहीं है। प्रियवर श्रीराम ! जिस विषयके लिये सङ्कल्प होता है, उसमें मन सङ्कल्परूपसे स्थित रहता है। तात्पर्य यह कि जो सङ्कल्प है वही मन है। सङ्कल्प और मनको कभी कोई पृथक् नहीं कर पाया है (इन दोनोंके पार्थक्यका अनुभव किसीको नहीं हुआ है)। मनको सङ्कल्पमात्र समझो।

वह समष्टिगत मन ही पितामह ब्रह्मा है। आतिवाहिक देह


* १. जगत्-रूपिणी लता ।

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