भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 133
१००* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

( सङ्कल्पमय शरीर ) रूपी ब्रह्माको लोकमें समष्टिगत मन कहा गया है। अविद्या, संसार, चित्त, मन, बन्धन, मल और तम—इन्हें श्रेष्ठ विद्वानोंने दृश्यके पर्यायवाची नाम माना है। संकल्परूप दृश्यसे अतिरिक्त मनका कुछ भी स्वरूप नहीं है। यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तवमें उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह बात मैं आगे चलकर फिर बताऊँगा। जैसे प्रकाशका आलोक* स्वभाव है, जैसे चपलता वायुका स्वभाव है और जिस प्रकार द्रवीभूत होना जलका स्वभाव है, उसी प्रकार द्रष्टामें दृश्यत्व स्वभावसे ही विद्यमान है ( अर्थात् द्रष्टासे दृश्य भिन्न नहीं है ), जैसे सुवर्णमें बाजूबंद और कटक-कुण्डल आदिकी स्थिति है, जैसे मृगतृष्णाकी नदीमें जलकी स्थिति है और जैसे सपनेकी नगरीमें उठायी गयी दीवारकी स्थिति है, उसी प्रकार द्रष्टामें दृश्यकी स्थिति मानो गयी है। अर्थात् जैसे उपर्युक्त वस्तुएँ अपने अधिष्ठानसे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार द्रष्टासे दृश्यकी पृथक् सत्ता नहीं है।

द्रष्टासे दृश्यकी पृथक् सत्ता न होनेके कारण दृश्यका अभाव हो जानेपर जो द्रष्टामें बलात् द्रष्टापनका अभाव प्राप्त होता है, उसीको तुम असत् ( मिथ्या दृश्य ) के बाधित होनेसे सन्मात्र चिन्मयरूपमें अवशिष्ट हुए आत्माका केवलीभाव ( या कैवल्य ) समझो। जब चित्त आत्माके कैवल्य ( अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूपता ) के बोधसे तदाकार ( कैवल्यभावको प्राप्त ) हो जाता है, तब उसकी राग-द्वेष आदि वासनाएँ उसी तरह शान्त हो जाती हैं, जैसे हवाके न चलनेपर वृक्षोंमें कम्पन और जलाशय आदिमें लहरोंका उठना बंद हो जाता है। दिशा, भूमि और आकाशरूपी सभी प्रकाशनीय पदार्थोंके न रहनेपर जिस तरह प्रकाशका शुद्ध रूप ही अवशिष्ट रहता है, उसी प्रकार तीनों लोक, तू और मैं इत्यादि दृश्य प्रपञ्चकी सत्ता न होनेपर शुद्धरूपसे अवशिष्ट चिन्मय द्रष्टाका केवलीभाव ( कैवल्य ) ही रह जाता है।


* अन्धकारकी निवृत्तिपूर्वक समस्त पदार्थोंको नेत्रोंके समक्ष ला देना।


श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि दृश्य सत् है, तब तो यह शान्त या निवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि सद्‌का कभी अभाव नहीं होता और यदि यह दोष प्रदान करने-वाला दृश्य असत् है, तब यह बात हमारी समझमें आती नहीं। इसलिये यह दृश्यरूपिणी विषूचिका ( हैजा ), जो मनसे जन्म आदिके भ्रमको उत्पन्न करनेवाली और दुःखकी परम्पराको देनेवाली है, कैसे शान्त होगी ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस वस्तुकी सत्ता है, उसका कभी नाश नहीं होता। यह जो कुछ आकाश आदि भूत और अहंकारके रूपमें लक्षित होता है, वह सब व्यवहार-दशामें जगत् है, किंतु परमार्थ दशामें ब्रह्म है। ब्रह्मके सिवा 'जगत्' शब्दका दूसरा कोई वास्तविक अर्थ है ही नहीं। हमारे सामने यह जो कुछ दृश्य-प्रपञ्च दृष्टिगोचर होता है, वह सब अजर, अमर एवं अव्यय परब्रह्म ही है। सर्वत्र पूर्णका प्रसार हो रहा है। शान्त परब्रह्ममें शान्त जगत् स्थित है। आकाशमें ही आकाशका उदय हुआ है तथा ब्रह्ममें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है * । वास्तवमें न तो दृश्य सत्-रूप


* परब्रह्म परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका जो बोध है, वही पूर्णमें पूर्णका प्रसार या प्रवेश है। परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र व्यापक होनेके कारण पूर्ण है। जीवात्मा भी उससे अभिन्न होनेके कारण पूर्ण ही है। इनमें जो भेदका भ्रम था, उसका मिट जाना ही उनकी एकता है। इस एकताकी अनुभूति ही पूर्णमें पूर्णका प्रवेश है। वास्तवमें जीवात्मा न तो कभी ब्रह्मसे पृथक् होता है और न वह कहीं अन्यत्रसे आकर ब्रह्ममें प्रविष्ट ही होता है। ये प्रवेश और निर्गम औप-चारिक हैं, वह ( जीवात्मा ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है, जैसा कि श्रुतिका कथन है—'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' मूल ग्रन्थमें जो 'शान्ते शान्तं व्यवस्थितम्' कहा गया है, इसमें प्रथम 'शान्त' शब्द ब्रह्मके लिये प्रयुक्त हुआ है और दूसरा 'शान्त' शब्द जगत्‌के लिये। जहाँ तीनों अवस्थाओं तथा सब प्रकारकी भेद-भ्रान्तियोंका सदाके लिये शमन हो गया है, वह ब्रह्म शान्तस्वरूप कहा गया है। ब्रह्मदृष्टि प्राप्ति होनेपर जगत-दृष्टि शान्त हो जाती है, इसलिये जगत्‌को भी शान्त कहा गया