संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परब्रह्म परमात्मा देवताओंके भी देवता हैं। उनके ज्ञानसे ही परम सिद्धि (मोक्ष) की प्राप्ति होती है, क्लेशयुक्त सकाम कर्मोंके अनुष्ठानसे नहीं। संसार-बन्धनकी निवृत्ति या मोक्षकी प्राप्तिके लिये ज्ञान ही साधन है, ज्ञानके अतिरिक्त सकाम कर्म आदिका इसमें कोई भी उपयोग नहीं है; क्योंकि मृगतृष्णामें होनेवाले जलके भ्रमका निवारण करनेके लिये ज्ञानका ही उपयोग देखा गया है—ज्ञानसे ही उस भ्रमकी निवृत्ति होती है, किसी कर्मसे नहीं। सत्सङ्ग तथा सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होना ही ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें हेतु है। वह स्वाभाविक साधन ही मोहजालका नाशक होता है। यह परमात्मा सत्स्वरूप ही है, ऐसे ज्ञानमात्रसे ही जीवके दुःखका निवारण होता है तथा वह जीवन्मुक्त अवस्थाको प्राप्त होता है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुदेव ! सबके आत्मस्वरूप इन परमात्माके ज्ञानमात्रसे कष्टप्रद जन्म-मरण आदि फिर कभी बाधा नहीं देते। अतः बताइये, ये महान् देवाधिदेव परब्रह्म परमात्मा किस उपायसे शीघ्र प्राप्त होते हैं ? किस तीव्र तपस्यासे अथवा कितने महान् क्लेश उठानेसे इनके ज्ञानकी उपलब्धि हो सकती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अपने पौरुषजनित प्रयत्नसे विकासको प्राप्त हुए विवेकके द्वारा उन परमात्म-देवका यथार्थ ज्ञान होता है। इसलिये पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा भवरोगके निवारणके लिये मुख्य औषधोंका संग्रह करना चाहिये। सत्-शास्त्रोंका अभ्यास और सत्पुरुषोंका सङ्ग—ये दो प्रधान औषधें संसाररूपी रोगका नाश करनेवाली हैं। इस जगत्में सम्पूर्ण दुःखोंके विनाशकी सिद्धिके लिये एकमात्र पुरुषप्रयत्न ही प्रधान साधन है। उसे छोड़कर दूसरी कोई गति या उपाय काम दे सके, यह सम्भव नहीं। रघुनन्दन ! आत्म-ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अपेक्षित उस पुरुषप्रयत्नका स्वरूप कैसा है, जिसका पूर्णतया पालन करनेसे राग-द्वेष-मयी महामारी शान्त हो जाती है—यह बताता हूँ, सुनो। मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि वह यथासम्भव ऐसी वृत्तिके द्वारा जो लोक और शास्त्रके विरुद्ध न हो, निष्कामभावसे जीवन-निर्वाह करता हुआ संतुष्टचित्त हो भोगवासनाका परित्याग करे। अपनी अनुद्विग्नता (उद्वेगशून्यता अथवा शान्तवृत्ति) के द्वारा यथासम्भव उद्योग करके सत्सङ्ग और सत्-शास्त्रोंका अभ्यास—इन दो साधनोंकी सबसे पहले शरण लेनी चाहिये। जो पुरुष प्रारब्धके अनुसार जो कुछ भी मिल जाय, उसीसे संतुष्ट रहता है, सत्पुरुषों अथवा शास्त्रोंद्वारा निन्दित वस्तुकी ओर आँख उठाकर नहीं देखता और सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके अभ्यासमें तत्पर रहता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। देशमें प्रायः सज्जन (शास्त्रोक्त सदाचारमें प्रतिष्ठित) पुरुष जिसे श्रेष्ठ महात्मा कहते हैं, वह यदि ज्ञान-वैराग्य आदि उत्तम गुणोंसे युक्त हो तो अवश्य ही श्रेष्ठ महात्मा है। ऐसे महात्माकी प्रयत्नपूर्वक शरण लेनी चाहिये। सम्पूर्ण विद्याओंमें अध्यात्मविद्या प्रधान है। उस अध्यात्मतत्त्वकी चर्चासे युक्त जो उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं गीता आदि सद्ग्रन्थ हैं, उन्हींको सत्-शास्त्र कहते हैं। उनका विवेकपूर्वक विचार करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जैसे निर्मलीके चूर्णके संसर्गसे जलकी मैल साफ हो जाती है तथा जिस प्रकार योगके अभ्याससे लोगोंकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है, उसी प्रकार सत्-शास्त्र और सत्सङ्गसे प्राप्त हुए विवेकके द्वारा अज्ञानका बलपूर्वक निवारण हो जाता है। (सर्ग ६)