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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished750 pages

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Page 138

उत्पत्ति-प्रकरण] * जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्‌की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन * १०५

जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्‌की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन, परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिनके चित्त परमात्मचिन्तनमें लगे हुए हैं, जिनके प्राण उन्हींमें रम रहे हैं, जो परस्पर परमात्मतत्त्वका बोध कराते हुए सदा परमात्माकी ही चर्चा करते हैं, उसीसे ही संतुष्ट होते हैं और उसीमें निरन्तर रत रहते हैं, एकमात्र ज्ञानमें ही जिनकी निष्ठा है तथा जो सदा परमात्मज्ञानका ही विचार करते हैं, उन पुरुषोंको ही वह जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है, जो देह-त्यागके अनन्तर विशुद्ध मुक्ति ही है।

शास्त्रानुकूल व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी दृष्टिमें ज्यों-का-त्यों स्थित हुआ यह जगत् विलीन हो जाता है और आकाशके समान शून्य प्रतीत होने लगता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो व्यवहारमें लगा हुआ ही एकमात्र बोध-निष्ठाको प्राप्त हो, जाग्रत् अवस्थामें भी सुषुप्त-पुरुषकी भाँति राग-द्वेष एवं हर्ष-शोकादिसे शून्य हो जाता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं। जिसके मुखकी कान्ति सुखमें उदित (अथवा वृद्धिको प्राप्त) नहीं होती तथा दुःखम अस्त नहीं हो जाती और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे जो सन्तोषपूर्वक जीवननिर्वाह करता रहता है, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो निर्विकार आत्मामें सुषुप्तकी भाँति स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूपिणी निद्राका निवारण हो जानेसे सदा जागता रहता है, जिसकी जाग्रत् अवस्था नहीं है (अर्थात् देह, इन्द्रिय आदिका बाध हो जानेसे जो इन्द्रियोंद्वारा पदार्थोंका उपभोग नहीं करता) और जिसका ज्ञान सर्वथा वासना-रहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसमें अहंकारका भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म करते समय कर्तृत्वके और न करते समय अकर्तृत्त्वके अभिमानसे लिप्त नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप परमात्माके किञ्चित् उन्मेष और निमेषसे ही तीनों लोकोंकी प्रलय और उत्पत्ति देखता है तथा जिसका सबके प्रति अपने समान ही भाव है अर्थात् जो सबके प्रति आत्मभाव रखता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिससे लोगोंको उद्वेग नहीं होता और जिसको लोगोंसे उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे रहित है, वह पुरुष जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिसकी संसारके प्रति सत्यता-बुद्धि नष्ट हो गयी है, जो दूसरोंकी दृष्टिमें अवयवोंसे युक्त होनेपर भी वास्तवमें अवयवरहित है तथा जो चित्तयुक्त होकर भी वस्तुतः चित्तसे शून्य है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।

श्रीराम ! विदेहमुक्ति ही मुक्ति कहलाती है। इसीको ब्रह्म कहा गया है और इसीको निर्वाण कहते हैं। इसकी प्राप्ति कैसे होती है, यह बता रहा हूँ; सुनो। मैं, तुम, यह, वह इत्यादि रूपसे जो यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी देता है, यह यद्यपि सत्-रूपसे प्रतीत होता है, तथापि वन्ध्यापुत्रके समान इसकी कभी उत्पत्ति हुई ही नहीं—ऐसा निश्चय हो जानेपर यह मुक्ति प्राप्त होती है। जो अद्वितीय, शान्त, चिन्मय और आकाशके समान निर्मल है, वह ब्रह्म ही यह सम्पूर्ण जगत् है; क्योंकि सबमें सत्तामात्रका ही तो बोध होता है। रघुनन्दन ! मैंने सोनेके कड़ेमें बहुत विचार करनेपर भी विशुद्ध सुवर्णके सिवा कहीं कोई कड़ा नामकी वस्तु नहीं देखी। जलकी तरङ्गमें मैं जलके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं देखता; क्योंकि जहाँ वैसी तरङ्ग नहीं दिखायी देती, वहाँ भी जल ही है (अतः जहाँ तरङ्ग है, वहाँ भी जलके अतिरिक्त कुछ नहीं है) वायुके अतिरिक्त कभी कहीं भी स्पन्दन (गतिशीलता) नामकी कोई वस्तु नहीं है। स्पन्दन सदा वायुरूप ही है। अतः इन दृष्टान्तोंके अनुसार यह जगत् भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। जैसे आकाशमें शून्यता है, मरुभूमिमें ताप ही जल है और प्रकाशमें सदा तेज

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