भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१०८* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आदि-अन्त नहीं है। वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है, दूसरे किसी प्रकाशसे प्रकाशित होने योग्य नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! अनन्त चेतनस्वरूप उस परमात्मतत्त्वका कैसा रूप है—इस विषयको आप फिर मुझसे कहिये, जिससे उसका भलीभाँति बोध हो जाय।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! महाप्रलय होनेपर सम्पूर्ण कारणोंका भी कारण परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। उसका वर्णन किया जाता, है, सुनो। समाधिमें निरोधके द्वारा जब मनकी वृत्तियोंका क्षय हो जाता है, तब मनके अपने स्वरूपका नाश करके जो अनिर्वचनीय स्वप्रकाश सद्रूप अवशिष्ट रहता है, वही उस अनन्त चिन्मय परमार्थ-वस्तुका रूप है। जब दृश्य जगत् नहीं रहता और दृश्यके अभावसे द्रष्टा भी विलीन हुआ-सा प्रतीत होता है, उस समय जो द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—इस त्रिपुटीके लयका प्रकाशक साक्षीरूपसे अवशिष्ट रहता है, वह चिन्मय ब्रह्म ही उस परमार्थ-वस्तुका स्वरूप है। जीवरूपा चित्-सत्ताका जो अचिन्तनीय चिन्मय निर्मल एव शान्त स्वरूप है, वही उस परमार्थ वस्तु या परमा त्माका रूप है। आकाशका जो रहस्य (व्यापकत्व) है, शिलाका जो तात्त्विक रूप घनत्व है तथा वायुका जो गूढ़ रूप अन्तर-बाहरमें परिपूर्ण होना है, वही उस चेत्य-भिन्न (दृश्यरहित) चेतन आकाशस्वरूप परमात्माका स्वरूप है वेदन (बुद्धि-वृत्ति) का, प्रकाश (पदार्थोंकी स्फुरणा) का, दृश्य (विषय) का और तम (अज्ञान)-का साक्षीभूत जो अनादि-अनन्त वेदन (ज्ञान) है, वही उस परमात्माका रूप है। ज्ञेय, ज्ञान, और ज्ञाता—सामने प्रतीत होनेवाली यह त्रिपुटी जहाँ उदित होती है, जिसमें स्थित रहती है और जिसमें ही लीन हो जाती है, वही उस परमात्माका परम दुर्लभ रूप है।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो 'इदम्' रूपसे प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है और जिसका आप ब्रह्ममें अभाव कहते हैं, वह यह दृश्य-जगत् महाप्रलय होनेपर कहाँ स्थित होता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे वन्ध्याके पुत्र और आकाशमें वन कभी नहीं होते, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण दृश्यजगत् तीनों कालोंमें कभी अस्तित्वमें नहीं आता। जगत् न कभी उत्पन्न हुआ है और न उसका कभी नाश ही होता है। जिसकी पहले सत्ता ही नहीं है, उसकी उत्पत्ति कैसी, और उसके विनाशकी चर्चा कैसी !

श्रीरामजीने पूछा—वन्ध्यापुत्र और आकाश-वृक्षकी कल्पना तो की ही जाती है। वह कल्पना जैसे उत्पत्ति और विनाशसे युक्त है, उसी प्रकार यह जगत् भी जन्म और नाशसे युक्त क्यो नहीं होगा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे सोनेके कड़ेमें सुस्पष्ट दिखायी देनेवाला यह कटकत्व वास्तवमे हैं नहीं, सुवर्ण ही उसकेरूपमे भासित होता है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं है (जिसे हम जगत् कहते हैं, वह ब्रह्म ही है)। जैसे आकाशमें जो शून्यता है वह आकाशसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्ममें प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेपर भी यह जगत् उससे भिन्न नहीं है। जैसे कालिमा काजलसे भिन्न नहीं है और जैसे शीतलता बर्फसे पृथक् नहीं है, उसी तरह परमपद-परमात्मामें पृथक् प्रतीत होनेवाला जगत् नहीं है। जैसे शीतलता चन्द्रमासे और हिमसे अलग नही होती, उसी प्रकार यह सृष्टि भी ब्रह्मसे पृथक् नहीं है। जैसे मरुभूमिमें प्रतीत होनेवाली मृग-तृष्णाके नदीमें जल नहीं है तथा जैसे नेत्रदोषसे प्रतीत होनेवाले द्वितीय चन्द्रमामें चन्द्रत्व नहीं है, उसी प्रकार निर्मल परमात्मामें प्रत्यक्ष दीखनेपर भी जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं है। स्वप्नमें—स्वप्न देखनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें जो स्वाप्निक जगत्की भ्रान्ति होती है, वह जैसे संवित् (ज्ञान) का विकासमात्र है, उसी तरह सृष्टिके