संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
द्वारा निर्मित पुर असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार ब्रह्माकाशरूपी परम व्योममय चिन्मय आत्मामें जीवाकाशत्व असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, अर्थात् उस ब्रह्ममय महाकाशसे अविभक्त होनेपर भी विभक्त-सा दीखता है । चिदात्मा परमेश्वरमें कल्पित समष्टि-जीवाकाश अत्यन्त विस्तृत होता हुआ भी 'मैं चिनगारीकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म तेजका कण हूँ' ऐसी भावना करनेसे वह अपनेको वैसा ही ( अणुरूप ही ) अनुभव करने लगता है । आकाशमें आत्मरूपसे जिस स्थूलताका चिन्तन करता है, भावनाद्वारा अपनेको वैसा ही स्थूल समझने लगता है । जैसे संकल्पसे कल्पित चन्द्रमा सत् नहीं है, वैसे ही भावनाद्वारा भावित वह रूप भी सत् नहीं है, तथापि सत्-सा प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न देखनेवाला मनुष्य सपनेमें अपनेको पथिकके रूपमें देखता है, उसी प्रकार वह चित्तकी कल्पनासे अपनेमें लिङ्ग देह और भावी स्थूल शरीरकी प्रतीतिको भी धारण करता है । जैसे पर्वत बाहर स्थित होनेपर भी दर्पणके भीतर स्थित हुआ-सा प्रतीत होता है, जैसे कुएँके जलमें प्रतिबिम्बित हुआ शरीर वही व्यवहारकर्ता-सा जान पड़ता है, जैसे दूरतक सुनायी देने योग्य शब्द भी सम्पुट ( गुफा आदि ) में अवरुद्ध होकर उसके भीतर ही रह जाता है, बाहर नहीं फैलने पाता तथा जैसे स्वप्न और मनोरथविषयक संवित् देहके भीतर ही स्वप्न आदि देखती है—वे विषय बाहर होनेपर भी अपने बाह्य रूपको त्यागकर ही शरीरके भीतर अन्तःकरणमें भासित होते हैं, उसी प्रकार आगकी चिनगारीके समान अणु उपाधिमें स्वरूपतः कल्पित जो सूक्ष्मशरीर है, उसके भीतर स्थित हुआ यह जीवात्मा वासनामय देहादि-व्यवहारका अनुभव करता है ।
मनोमय शरीरवाला जीव अपने मनोमय देहाकाशमें ही स्थूलताकी भावना करके स्थूल-देहधारी हो गया है । वह अपनी कल्पनाके भीतर ही स्थित हुए ब्रह्माण्डका दर्शन करता है । मनोमय शरीरधारी जीव मनको ही आत्मा समझता है । उस आत्मभूत चित्तसे अपने संकल्पके अनुसार अपने ही लिये गर्भरूपी गृह, देश, काल, कर्म तथा द्रव्य आदिकी कल्पनाओंकी भावना करता हुआ नाम आदिका निर्माता बनकर वह आतिवाहिक देहधारी जीव अपने द्वारा कल्पित विभिन्न नामोंसे उन-उन पदार्थोंको और अपनेको भी असत्य जगत्-रूपी भ्रममें बाँधता है । जैसे मिथ्याभूत स्वप्नमें झूठे ही अपना उड़ना प्रतीत होता है, उसी प्रकार असत्य जगत्-रूपी भ्रममें ही यह जीवात्मा मिथ्या विकासको प्राप्त होता जान पड़ता है । वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ है । इस ब्रह्माण्डरूपी भ्रमके उदित होनेपर भी इसमें कभी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ । उत्पन्न हुई कोई वस्तु दिखायी नहीं देती; केवल अनन्त, निर्मल ब्रह्माकाश ही सर्वत्र विद्यमान है । संकल्पद्वारा निर्मित नगरके समान यह दृश्य-प्रपञ्च सत्-सा प्रतीत होनेपर भी सत् नहीं है । स्वयं उदित हुआ यह प्रपञ्च उस चित्रके समान है, जिसका किसी चित्रकारने न तो निर्माण किया है और न उसमें रंग ही भरा है । यह बिना बनाये ही बनकर अनुभवमें आ रहा है और सत्य न होकर भी सत्य-सा स्थित है । महाकल्पके अन्तमें ब्रह्मा आदिके मुक्त हो जानेके कारण निश्चय ही वर्तमान कल्पके ब्रह्माको कोई पूर्वजन्मकी स्मृति नहीं रह जाती, अतः वह स्मृति इस जगत्की उत्पत्तिमें कारण नहीं हो सकती । इसलिये वर्तमान कल्पमें जैसे ब्रह्मा संकल्पमय हैं, वैसे ही उनसे उत्पन्न हुआ यह जगत् भी संकल्पजन्य ही माना गया है । इस पृथ्वी आदिकी सृष्टिके विषयमें जो इस तरह साक्षीका अनादिकालका अनुभव है, उसीको यदि कारण माना जाय तो साक्षिपेक्ष स्वप्नदृष्ट पृथ्वी आदि पदार्थ जैसे जागरण-अवस्थामें मिथ्या सिद्ध होते हैं उसी प्रकार अनादि साक्षीके संस्कारसे उत्पन्न जगत् भी मिथ्या ही सिद्ध होगा ।
जैसे जिस किसी भी देश या कालमें द्रवत्व जलसे