संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर वसिष्ठजीका मेरुगिरिपर जाना * ३७२
करते थे । इसी प्रकार श्रुति-स्मृतिविहित कर्मोंका भी वे कर्त्तव्य-बुद्धिसे आचरण करते थे । उन तत्त्ववेत्ता महापुरुषोंका मन अत्यन्त कमनीय कञ्चन और कामिनीके प्राप्त होनेपर हर्ष और चञ्चलता आदि विकारोंको नहीं प्राप्त होता था । वे सुखकी प्राप्ति होनेपर हर्षित और दुःखकी प्राप्ति होनेपर खिन्न नहीं होते थे ।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अब कृपाकर मुझे यह बतलाइये कि प्राणवायुकी गतिके अवरोधसे वासनाका विनाश हो जानेपर जीवन्मुक्त-पदमें परम शान्ति कैसे मिलती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! संसार-सागरसे पार उतरनेके साधनका नाम ही 'योग' है । उस चित्तको शान्त करनेवाले साधनको तुम दो प्रकारका समझो । इसका प्रथम प्रकार परमात्माका यथार्थ ज्ञान है, जो संसारमें प्रसिद्ध है और द्वितीय प्रकार प्राण-निरोध है, जिसे मैं आगे बता रहा हूँ; सुनो ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुवर ! योगके इन दोनों प्रकारके साधनोंमें कौन-सा सरल और कष्टरहित उत्तम साधन है, जिसके जाननेसे विक्षेप फिर बाधा नहीं पहुँचाता ?
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यद्यपि शास्त्रोंमें 'योग' शब्दसे उपर्युक्त दोनों ही प्रकार (परमात्म-विषयक ज्ञान और प्राणनिरोध) कहे गये हैं, तथापि इस 'योग' शब्दकी प्राणनिरोधके अर्थमें ही अधिक प्रसिद्धि है । संसार-सागरसे पार उतरनेकी पद्धतिमें एक योग (प्राण-निरोध) और दूसरा ज्ञान—ये दोनों एक फल देनेवाले समान उपाय शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं । किसीके लिये योगका साधन असाध्य-सा है और किसीके लिये परमात्मविषयक ज्ञानका साधन असाध्य-सा है; परंतु मैं तो परमात्मविषयक ज्ञानके साधनको ही सुसाध्य मानता हूँ । यह प्राणनिरोधरूप योग देश, काल, आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान आदि उपायोंसे सिद्ध होता है; अतः वह सुसाध्य नहीं है । किंतु साधकको सुसाध्यता और दुःसाध्यताका विचार नहीं करना चाहिये । रघुकुलतिलक ! ज्ञान और योग—ये दोनों ही उपाय शास्त्रोक्त हैं । इन दोनोंमेंसे सब ज्ञानोंसे परे जाननेयोग्य विशुद्ध ज्ञान तुम्हें पहले बतलाया जा चुका है । अब तुम यह योग सुनो, जो प्राण और अपानके निरोधके नामसे प्रसिद्ध है, तथा देहरूपी गुहाका दृढ़ आश्रय करनेवाला, अणिमादि अनन्त सिद्धियोंको देनेवाला और परमार्थ-ज्ञान प्रदान करनेवाला है ।
(सर्ग ११-१३)
देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर महर्षि वसिष्ठका उसे देखनेके लिये मेरुगिरिपर जाना, मेरु-शिखर तथा 'चूत' नामक कल्पतरुका वर्णन, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे मिलना, भुशुण्डद्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे उनका वृत्तान्त पूछना और उनके गुणोंका वर्णन करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! पूर्ववर्णित उस अनन्त परमात्माके किसी एक अंशमें मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णाकी भाँति यह ब्रह्माण्ड वर्तमान है । उस ब्रह्माण्डमें सृष्टिकी उत्पत्तिके कारण तथा पूर्वकृत कर्मानुसार प्राणिसमूहकी रचनामें संलग्न कमलयोनि ब्रह्मा पितामहरूपसे स्थित हैं उन्हीं ब्रह्मदेवका मैं एक सदाचारसम्पन्न मानसपुत्र हूँ । मेरा नाम वसिष्ठ है । मैं ध्रुवद्वारा धारण किये गये सप्तर्षिमण्डलमें वैवस्वत मन्वन्तर-पर्यन्त निवास करता हूँ । एक समयकी बात है, मैं स्वर्गलोकमें देवराज इन्द्रकी सभामें बैठा हुआ था । वहाँ देवर्षि नारद आदि भी विराजमान थे । वे चिरजीवियोंकी कथा सुना रहे थे । मैंने भी यह कथा