भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भी अप्राप्त ही है। ब्रह्मको ब्रह्म जान लेनेपर तत्क्षण ही ब्रह्म प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार सुवर्णको सुवर्ण जान लेनेपर तत्क्षण ही सुवर्ण प्राप्त हो जाता है। कर्म, कर्त्ता, करण, कारण और विकारोंसे रहित स्वयं समर्थ महान् आत्मा ही ब्रह्म है, यों ब्रह्मज्ञानीलोग कहते हैं।

'यह देह मै नहीं हूँ' इस प्रकार जब ज्ञान हो जाता है, तब ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है। इसीसे देहमें अहं-भाव मिथ्या सिद्ध हो जाता है। उस समय पुरुष देहसे विरक्त हो जाता है। 'मै एकमात्र ब्रह्मस्वरूप हूँ' इस प्रकार यथार्थ ज्ञान होनेपर ब्रह्मभावना प्रकट होती है। उस अपने वास्तविक रूपका यथार्थ ज्ञान होनेपर अज्ञान विलीन हो जाता है। मुझे न दुःख है न कर्म हैं, न मोह है न कुछ अभिलषित है। मै एकरूप, अपने स्वरूपमें स्थित, शोकशन्य तथा ब्रह्मस्वरूप हूँ—यह ध्रुव सत्य है। मैं कल्पनाओंसे शून्य हूँ, मैं सर्वविध विकारोंसे रहित और सर्वात्मक हूँ; मै न त्याग करता हूँ और न कुछ चाहता हूँ; मै परब्रह्मस्वरूप परमात्मा हूँ, यह ध्रुव सत्य है। जिसमें सब कुछ स्थित है, जिससे यह सब उत्पन्न हुआ है, जो यह सब है, जो सब ओर विद्यमान है एवं जो सबका अद्वितीय आत्मा है, वही परब्रह्म परमात्मा है। यह निश्चय है, वही चेतन आत्मा—वह व्यापक, दृश्यरहित सच्चिदानन्दघन ब्रह्मतत्त्व ही ब्रह्म, सत्, सत्य, ऋत, ज्ञ इत्यादि नामोंसे सर्वत्र कहा जाता है। विषय-संसर्गरहित, चेतनमात्रस्वरूप, विशुद्ध, समस्त भूत-प्राणियोंको जाननेवाला, सर्वव्यापक, परम शान्त, सच्चिदानन्द ब्रह्मका ब्रह्मज्ञानी अनुभव करते हैं। सुषुप्तिके सदृश समस्त विकल्पोंसे रहित, परम शान्तरूप, विशुद्ध प्रकाशस्वरूप, सांसारिक विषय-सुखोंसे अत्युत्तम तथा वासनाओंसे रहित सच्चिदानन्द ब्रह्म ही मै हूँ। सुख-दुःख आदि कल्पनाओसे रहित, निर्मल, सत्य अनुभवरूप जो शाश्वत सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप है, वही मै हूँ। पर्वत आदि पदार्थ-समुदायके बाहर एवं भीतर सर्वदा समान सत्तारूपसे व्यापक निर्लेप विज्ञानानन्दघन जो परमात्मा है, वही मै हूँ। जो सम्पूर्ण संकल्पोंका फल देनेवाला, अग्नि-सूर्य-चन्द्र आदि सम्पूर्ण तेजोंका प्रकाशक और प्राप्त करनेयोग्य सम्पूर्ण पदार्थोंकी अन्तिम सीमा है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्माकी हम उपासना करते हैं। वह चिन्मय परमात्मा बाहर-भीतर—सर्वत्र प्रकाशस्वरूपसे विद्यमान और अपने आपमें स्थित है; सबके हृदयमें स्थित होते हुए भी उसका अज्ञानके कारण अनुभव नहीं होता; अतः वह दूर न होते हुए भी दूर कहा गया है। उस परमात्माकी हम उपासना करते हैं। जो समस्त संकल्पों, कामनाओं तथा रोष आदिसे रहित है, उस चिन्मय परमात्माकी हम उपासना करते हैं। उस परमात्मामें यह सारा जगत् प्रतीत होता है, किंतु वास्तवमें इस जगत्का उसमें अत्यन्ताभाव है तथा वास्तवमें वह है, इसीलिये वह सद्रूप है; किंतु वह मन-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इसलिये असद्रूप है। ऐसे उस एक अद्वितीय निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्द परमात्माको मै प्राप्त हूँ। जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि सारे विषय-पदार्थोंका प्रकाशक है और वास्तवमें जो उन सब विषय-पदार्थोंसे रहित है, उस परम शान्त चिन्मय परमात्माको मै प्राप्त हूँ। जो समस्त विभूतियों और महिमाओंसे युक्त प्रतीत होता है, किंतु जो वास्तवमें समस्त विभूतियों एवं महिमाओंसे रहित है तथा जो मायाके सम्बन्धसे जगत्का कर्ता-सा प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें अकर्ता है, उस विज्ञानानन्दघन परमात्माको मै प्राप्त हूँ।

रघुनन्दन! पूर्वोक्त निश्चयवाले वे सद्रूप जीवन्मुक्त महात्मा सत्यस्वरूप परम शान्त परमपदमें स्थित हो गये थे। वे फूलोंसे पूर्ण, झूलेके-से आन्दोलनोंसे चञ्चल चित्र-विचित्र वनोंकी पंक्तियोंमें एवं मेरु पर्वतकी चोटियो-के ऊपर विचरण करते थे। वे अनेक प्रकारके सदाचारोंके रूपमें इन सभी धर्मोंका स्वयं अनुष्ठान