भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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[निर्वाण-प्रकरण पू०] * परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन * ३७३

श्चय है, वही निश्चय वास्तविक है। तुम्हारा भी वही निश्चय होना चाहिये। देवगुरु बृहस्पति, शुक्राचार्य, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, महामुनि नारद, महर्षि अगस्त्य, अङ्गिरा, प्रचेता, भृगु, क्रतु, अत्रि, शुकदेव तथा अन्यान्य जीवन्मुक्त ब्रह्मर्षि और राजर्षि महात्माओंका तथा मेरा भी परमात्माके स्वरूपके विषयमें जो निश्चय है, वही निश्चय तुम्हारा होना चाहिये।

श्रीरामजी बोले—भगवन् ! ब्रह्मन् ! जिस निश्चयके कारण ये पूर्वोक्त महाबुद्धिमान् एवं धीर बृहस्पति आदि शोकरहित हुए स्थित हैं, उसका मुझसे तात्त्विक रूपसे वर्णन कीजिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—समस्त जाननेयोग्य पदार्थोंको यथार्थतः जाननेवाले महाबाहु श्रीराम ! जो तुमने पूछा है, उसका उत्तर स्पष्टरूपसे सुनो। उनका यही निश्चय है, जो मैं बतला रहा हूँ। श्रीराम ! जो कुछ भी यह भोगरूप संसार-जाल स्थित दिखायी पड़ता है, वह सब निर्मल ब्रह्म ही है। ब्रह्म ही जीवात्मा है, चौदह भुवन ब्रह्म ही हैं, आकाशादि भूत भी ब्रह्म ही हैं, मैं भी ब्रह्मस्वरूप हूँ, मेरा शत्रु भी ब्रह्मस्वरूप है; सन्मित्र, बन्धु-बान्धव आदि भी ब्रह्म-स्वरूप हैं। तीनों काल भी ब्रह्मस्वरूप हैं, क्योंकि वे ब्रह्ममें ही अवस्थित हैं। जैसे समुद्र अपने आपमें तरङ्गोंके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही यह सच्चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें सांसारिक पदार्थ-सम्पत्तिके रूपमें प्रकट होता है। नेत्र-दोषके कारण आकाशमें बिना हुए ही भ्रान्तिसे वृक्षकी प्रतीति होती है, किंतु वास्तवमें वृक्ष नहीं है; इसी तरह ब्रह्ममें जो राग-द्वेष आदि दोष भ्रमसे प्रतीत होते हैं, वे वास्तवमें हैं ही नहीं; क्योंकि ये सब कल्पनामात्र हैं, इसलिये संकल्पके अभावसे इनका अत्यन्त अभाव हो जाता है। गमनागमन आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ भी ब्रह्ममें ही होती हैं; क्योंकि ब्रह्म ही अपने संकल्पसे अद्वितीय सुखरूपमें स्फुरित होता है, तब उसमें दुःख और सुख कैसे ? ब्रह्म ही स्वयं ब्रह्ममें तृप्त है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्थित है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्फुरित होता

है; अतः मैं भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ। क्योंकि घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, मैं भी ब्रह्म हूँ, यह विस्तृत जगत् भी ब्रह्मस्वरूप ही है, इसलिये यहाँ ब्रह्मके अतिरिक्त मिथ्या राग-वैराग्य आदिकी कल्पना ही नहीं हो सकती।

जिस प्रकार सुवर्णसे आभूषण और जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं हैं, वैसे ही प्रकृति ब्रह्ममें बिना हुए ही प्रतीत होती है, किंतु ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। यह जीवात्मा चेतन है और यह पदार्थ जड़ है—इस प्रकारका मोह अज्ञानियोंको ही होता है, ज्ञानीको कभी नहीं होता। जिस प्रकार अंधे मनुष्यको जगत् अन्धकाररूप और सुदृष्टिवालेको प्रकाशरूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार अज्ञानीको यह जगत् दुःखमय और ज्ञानीको सच्चिदानन्दमय प्रतीत होता है। सदा-सर्वदा सब ओर एकरस स्थित विज्ञानानन्दघन ब्रह्ममें न कोई मरता है और न कोई जीता है। जिस प्रकार महान् सागरके उल्लसित होनेपर भी उसमें तरङ्ग आदि न जन्मते हैं और न मरते हैं, उसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्ममें प्राणी न जन्मते हैं और न मरते हैं। जैसे जलमें तरङ्गोंके रूपमें प्रचुर जल ही स्थित है, वैसे ही अपने आपमें जगत्‌की शक्तिके रूपमें ब्रह्म ही स्थित है। जैसे जलमें जो कण, कणिका, वीचि, तरङ्ग, फेन और लहरी हैं, वे सब जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्ममें जो देह, मनका व्यापार, दृश्य, क्षय, क्षयका अभाव, भाव-रचना और अर्थ हैं, वे सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जिस प्रकार सुवर्णसे बनी आभूषणकी विभिन्न आकृति-रचनाएँ सुवर्णसे पृथक् नहीं होतीं, उसी प्रकार ब्रह्मसे उत्पन्न हुई चित्र-विचित्र देहादिकी आकृति-रचनाएँ भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकतीं। अज्ञानियोंको वृथा ही उसमें द्वित्वभावना होती है। मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ आदि सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं; अतः ब्रह्मसे भिन्न सुख और दुःखकी भी सत्ता नहीं है। ब्रह्मको ब्रह्म न जाननेसे अज्ञानीके लिये वह प्राप्त होते हुए भी अप्राप्त है, जिस तरह, सुवर्णका ज्ञान हुए बिना सुवर्ण प्राप्त हुआ