संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अग्नि, ऋण, व्याधि, शत्रु, स्नेह, विरोध एवं विष—ये थोड़े-से भी शेष रहनेपर हानि पहुँचाते हैं । जिसका वासना-बीज ज्ञानाग्निसे दग्ध हो गया है और जिसने सत्त्वमें समान सत्तारूप परमात्माको प्राप्त कर लिया है, वह महात्मा पुरुष, चाहे सदेह हो या देहसे रहित पुनः कभी दुःखका भागी नहीं होता ।
श्रीराम ! आत्मदर्शनके विरोधी अज्ञानसे आवृत हुई यह चेतनशक्ति संसाररूप भ्रमको जन्म देती है और अज्ञानसे मुक्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश कर देती है । इस आत्मदृष्टिका जो अभाव है, उसीको विद्वान्लोग अविद्या कहते हैं । अविद्या जगत्की कारणभूत है, अतः उसीसे सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है । रूपरहित इस अविद्याका जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब तुरंत यह उसी प्रकार विनष्ट हो जाती है, जैसे घाममें तुषारके परमाणु गल जाते हैं । दीपकको प्रज्वलित करनेपर जिस प्रकार अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी तरह अच्छी प्रकार विचार करनेपर यह अविद्या नष्ट हो जाती है । वास्तवमें यह अविद्या कोई वस्तु न होनेसे असत् है और विचार न करनेसे ही दीख पड़ती है । रक्त, मांस तथा अस्थिमय इस देह-यन्त्रमें 'मैं स्वयं कौन हूँ ?' इस प्रकार जब विवेकपूर्वक विचार किया जाता है, तब देहके किसी भी पदार्थमें मैं-पन सिद्ध नहीं होता, वरं शरीरका अभाव हो जाता है । अपने अन्तःकरणके विवेक-विचारसे आदि-अन्तमें असद्रूप इस शरीर और संसारका परिहार कर देनेपर अविद्याका क्षय हो जाता है; फिर शेषमें एक परमात्मा ही रह जाता है । वही वास्तवमें शाश्वत ब्रह्म है । वही वास्तविक पदार्थ और उपादेय है; क्योंकि उसीसे अविद्या निवृत्त हो जाती है । 'अविद्या' इस अपने नामसे ही इसके अभावरूपका ज्ञान हो जाता है । वास्तवमें अविद्या नामकी कोई वस्तु कहीं भी नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् अखण्ड ब्रह्मस्वरूप ही है, जिस ब्रह्मने कार्य-कारणरूप इस सम्पूर्ण जगत्का निर्माण किया है । 'यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप नहीं है' इस प्रकारका निश्चय ही अविद्याका स्वरूप है और 'यह जगत् ब्रह्मरूप है' यह निश्चय ही उसका विनाश है । (सर्ग १०)
परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एवं महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण-निरोधरूप योगका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अज्ञान अत्यन्त बलवान् है । इसीका दूसरा नाम 'अविद्या' है । वह अन्य असंख्य जन्मोंसे चला आ रहा है, अतएव वह दृढ़ हो गया है । देहकी उत्पत्ति और विनाशमें, बाहर-भीतर—सर्वत्र समस्त इन्द्रियाँ उस अविद्याका ही निरन्तर अनुभव करती हैं, इसलिये वह अविद्या दृढ़ हो गयी है; क्योंकि परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान तो किसी भी इन्द्रियका विषय नहीं है । मनसहित छहों इन्द्रियोंका विनाश हो जानेपर वह सत्स्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही कायम रहता है । इन्द्रिय-वृत्तियोंसे अतीत होनेके कारण वह परमात्माका स्वरूप प्राणियोंको प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि प्राणी तो पदार्थोंका अनुभव मन-इन्द्रियोंके द्वारा ही करते हैं । रघुनन्दन ! जिस प्रकार परमात्मज्ञानके अभ्यासमें निरत राजा जनक परमात्मतत्त्वको यथार्थरूपमें जानकर भूमण्डलमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी विचरण करो । भगवान् नारायण जीवोंके कल्याणके लिये विभिन्न लीलाएँ करनेके जिस निश्चयसे पृथ्वी-पर नाना योनियोंमें अवतार लेते हैं, वही निश्चय वास्तविक यथार्थज्ञान है । रघुनन्दन ! जगदम्बा पार्वतीके साथ रहनेवाले त्रिनेत्र महादेवजीका या रागरहित ब्रह्माका जो