भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३७६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सुनी थी। उस समय किसी कथा-प्रसङ्गके अवसरपर मुनिवर शातातप, जो मितभाषी, मानी और अगाध बुद्धिसम्पन्न थे, कहने लगे—"मेरुगिरिके ईशानकोणमें पद्मरागमणिसे युक्त एक बहुत ऊँचा शिखर है। उसकी चोटीपर एक अत्यन्त शोभाशाली कल्पतरु है, जो 'चूत' नामसे विख्यात है। उस कल्पतरुके उपरी भागकी दाहिनी शाखामें एक कोटर है, जो चाँदीके समान श्वेतवर्णकी लताओंसे आच्छादित है। उस कोटरमें एक घोंसला विद्यमान है। उस घोंसलेमें एक परम ऐश्वर्यशाली कौआ निवास करता है। उस वीतराग वायसका नाम भुशुण्ड है। देवगण ! वह वायसराज भुशुण्ड इस जगत्में जिस प्रकार चिरकालसे जी रहा है, वैसा चिरजीवी तो स्वर्गलोकमें न कोई हुआ है और न होगा ही। वह दीर्घायु तो है ही, साथ ही रागरहित, ऐश्वर्ययुक्त, शान्त और सुन्दर रूपवाला भी है। उसकी बुद्धि अगाध और स्थिर है। वह कालकी गतिका पूर्ण ज्ञाता है।"

राघव ! इस प्रकार जब कथाका समय समाप्त हुआ और सभी देवता अपने-अपने वासस्थानको चले गये, तब मैं कुतूहलवश उस भुशुण्ड पक्षीको देखनेके लिये चल पड़ा। फिर तो तुरंत ही मैं मेरुगिरिके उत्तम शिखरपर जा पहुँचा, जहाँ वह भुशुण्ड नामक कौआ रहता था। वह विशाल शिखर पद्मरागमणिसे निर्मित था। वहाँ झरते हुए गङ्गाजीके झरनोंके शब्द गूँज रहे थे। उसके लताकुञ्जोंमें देवता विराजित थे। गन्धर्वोंकी गीत-ध्वनिसे वह अत्यन्त रमणीय लग रहा था और वहाँ शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु बह रही थी। उसी शिखरपर मैंने 'चूत' नामक कल्पवृक्षको देखा। वह देवता, किन्नर, गन्धर्व एवं विद्याधरोंसे युक्त, ब्रह्माण्डकी तरह विस्तृत, असीम तथा दसों दिशाओं और आकाशको व्याप्त किये हुए था। वह सब ओरसे पुष्पों, फलों और कोमल पल्लवोंसे आच्छादित था। उसके पुष्पोंसे सबको आह्लाद प्रदान करनेवाले पराग झड़ रहे थे, जिनसे उसकी अत्यन्त विचित्र शोभा हो रही थी। वहाँ मैंने देखा, अनेक जातिके पक्षी उस वृक्षके तने और शाखाओंकी संधियोंमें, लताओंसे आवृत्त शाखाग्रभागोंमें, लता-पत्रोंमें, गाँठोंमें और पुष्पोंमें घोंसले बनाकर उनमें छिपे हुए बैठे थे। वहाँ मैंने ॐकार और वेदके मित्रभूत ब्रह्माके वाहन हंसोंके बच्चोंको भी देखा, जिन्हें ब्रह्मविद्याकी विधिवत् शिक्षा प्राप्त हो चुकी थी एवं जो सामवेदका गान करनेवाले थे। तत्पश्चात् मैंने अग्निदेवके वाहन शुकोंको देखा। उनके शरीरका रंग शङ्ख, विद्युत्पुञ्ज और नील मेघके समान था तथा कोई-कोई यज्ञवेदियोंपर बिछाये गये हरित वर्णके कुश-लताओंके दलोंकी भाँति हरे रंगके भी थे। देवगण सदा उनका दर्शन करते थे। वे मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे। उनकी बोली स्वाहाकारकी-सी जान पड़ती थी। वहाँ मयूरोंके बच्चे भी थे, जिनकी शिखाएँ अग्नि-शिखा-सी उद्दीप्त थीं, जिनके पर जगज्जननी पार्वती (अपने जूड़ेमें

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