संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू०]* देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर वसिष्ठजीका मेरुगिरिपर जाना * ३७१
बाँधनेके लिये) सँभालकर रखती थीं तथा जो स्कन्दद्वारा विस्तारित शिव-सम्बन्धी सम्पूर्ण विज्ञानोंके विशेष जानकार थे।
इस प्रकार ज्यों ही मेरी दृष्टि उस वृक्षकी दाहिनी शाखाके एकान्त कोटरपर पड़ी, त्यों ही मैने देखा कि वहाँ बहुत-से कौए बैठे हुए हैं और उनके बीचमें ऐश्वर्यशाली एवं अत्यन्त उन्नत शरीरवाला वायसराज भुशुण्ड विराजमान है। उसका मन आत्मज्ञानसे परिपूर्ण है। वह दूसरोंको मान देनेवाला, समदर्शी और सर्वाङ्गसुन्दर है। प्राण-क्रियाके निरोधसे वह सदा अन्तर्मुख वृत्तिवाला और सुखी है तथा चिरजीवी होनेके कारण वह 'चिरजीवी' नामसे विख्यात है। वह भूतकालीन सुर, असुर और महीपालोंके इतिहासका ज्ञाता, प्रसन्न एवं गम्भीर मनसे युक्त, चतुर तथा कोमल एवं मधुर वाणी बोलनेवाला है। वह परमात्माके सूक्ष्मतत्त्वका वक्ता तथा विज्ञाता है। वह ममता और अहंकारसे रहित, बुद्धिमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर, प्राणीमात्रका हितैषी, बन्धु एवं मित्र है। वह एक मनोरम सरोवरकी भाँति सौम्य, प्रसन्न, मधुर, ब्रह्म-रससे युक्त, महान् आनन्दरससे सम्पन्न और आन्तरिक अखण्ड शान्ति-समन्वित है। गम्भीरताका परित्याग न करनेके कारण उसके अन्तः-करणकी शोभा प्रकटित हो रही थी।
रघुनन्दन ! तदनन्तर मैं उस भुशुण्ड पक्षीके सामने उतर पड़ा, मानो पर्वतपर आकाशसे कोई नक्षत्र आ गिरा हो। मेरा शरीर कान्तिमान् तो था ही, अतः मेरे आनेसे वह सभा कुछ चञ्चल हो उठी। यद्यपि वहाँ मेरे जानेकी कोई सम्भावना नहीं थी, तथापि मुझे देखते ही भुशुण्डने पहचान लिया कि ये तो वसिष्ठजी पधारे हैं। फिर तो वह पर्वतसे उठे हुए छोटे-से मेघ-खण्डके समान अपने पत्र-पुञ्जके आसनसे उठ खड़ा हुआ और मधुर वाणीमें बोला—'मुनिवर ! आपका स्वागत है।' तत्पश्चात् उसने आसन, अर्घ्य और पाद्य आदि देकर मेरा सत्कार किया। उस समय उस महान् तेजस्वी भुशुण्डका मन परम प्रसन्न था। उसने सौहार्दवश मधुर वाणीमें मुझसे कहना आरम्भ किया।
भुशुण्ड बोला—मुने ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि चिरकालके पश्चात् आज आपने हमलोगोंपर महान् अनुग्रह किया है; क्योंकि आपके दर्शनामृतके सिञ्चनसे सिक्त होकर आज हमलोग पुण्यवृक्ष-सरीखे परम पवित्र हो गये। मुनिवर ! आप तो माननीयोंके भी मान्य हैं। इस समय जो आपने मुझे दर्शन दिया है, इसमें चिरकालसे सञ्चित मेरी पुण्यराशिकी प्रेरणा ही कारण जान पड़ती है। अच्छा, अब यह बताइये कि कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है तथा किसलिये आज आपने यहाँ पधारनेका कष्ट उठाया है। हमलोग सदा आपके आदेशपूर्ण वचन सुननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं, अतः आप हमें आज्ञा देनेकी कृपा कीजिये। मुनिराज ! आपके चरणोंके दर्शनसे ही मुझे सारी बातें ज्ञात हो गयी हैं। आपने अपने शुभागमनके पुण्यसे