भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 750 में से

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पृष्ठ 419

३७८ * अविच्छिन्नचिन्मात्रैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हमलोगोंको संयुक्त कर दिया । ( बात यह है कि इन्द्रसभामें चिरजीवियोंके विषयमें चर्चा हो रही थी, उसी प्रसङ्गमें आपको हमारा स्मरण हो आया । इसी कारण आपने अपने चरणोंसे इस स्थानको तथा मुझे भी पवित्र बनाया है । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार यद्यपि आपके आगमनका प्रयोजन मुझे ज्ञात हो गया है, फिर भी जो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, इसका कारण यह है कि आपके वचनामृतके रसास्वादकी वाञ्छा उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है। श्रीराम ! तीनो कालोंका निर्मल ज्ञान रखनेवाले उस चिरजीवी पक्षी भुशुण्डने जब इस प्रकार पूछा, तब मैंने उसे यों उत्तर दिया ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—पक्षियोंके सरदार ! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह बिल्कुल सत्य है । आज मैं तुम चिरजीवीको देखनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। सौभाग्य-की बात है कि तुम्हारा अन्तःकरण पूर्णतया शान्त है, तुम सकुशल हो और परमात्मज्ञान-सम्पन्न होनेके कारण इस भीषण जगज्जालमें भी नहीं फँसे हो । परंतु ऐश्वर्यशाली वायसराज ! मेरे मनमें एक संदेह है, उसे तुम अपने यथार्थ वचनोंद्वारा दूर करो । (वह संशय यह है कि) तुम किस कुलमें उत्पन्न हुए हो ? किस प्रकार तुम्हें ज्ञेय-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हुआ ? तुम्हारी आयु कितनी है ? तुम्हें अपना कौन-सा वृत्तान्त अर्थात् किस कल्पका चरित्र याद है ? किस महानुभावने तुम-जैसे दीर्घदर्शीके लिये यह निवासस्थान निश्चित किया है ?

श्रीराम ! वह भुशुण्ड न तो अभीष्ट-लाभसे प्रसन्न ही होता था, न तो उसकी बुद्धि ही क्रूर थी । उसके सभी अङ्ग सुन्दर थे तथा शरीरका वर्ण वर्षाकालीन मेघके सदृश श्याम था । उसके वचन स्नेहपूर्ण और गम्भीर होते थे । वह मुस्कुराकर ही बोलता था । तीनों लोकों-की इयत्ता उसके लिये हस्तामलकवत् थी । वह सम्पूर्ण भोगोंको तृण-सरीखे तुच्छ समझता था । वह परावर ब्रह्मका ज्ञाता था । उसकी बुद्धि पूर्णतया शान्त थी तथा वह शान्त और परमानन्दसे परिपूर्ण था । उसके वाक्य प्रिय और मधुर, अतएव सुनने योग्य तथा वीणाके गानकी भाँति मनोहर थे । उसका शरीर तो ऐसा लगता था मानो सम्पूर्ण भयोंका अपहरण करनेवाले स्वयं ब्रह्मने ही नवीन भुशुण्ड-शरीर धारण किया हो । वह स्वाभाविक प्रसन्नतासे युक्त था तथा प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये उत्सुक होनेके कारण उसके मुखकी अद्भुत शोभा हो रही थी । इस प्रकार उस वायसराज भुशुण्डने शुद्ध, अमृतमय तथा क्रमबद्ध रूपसे निर्मल वाणीद्वारा अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मुझसे कहना आरम्भ किया ।

(सर्ग १४-१७)

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